उपन्यास अंश

लघु उपन्यास – षड्यंत्र (कड़ी 13)

पांडवों की कीर्ति से दुर्योधन आदि कौरव राजकुमारों को बहुत ईर्ष्या होती थी। यों तो प्रत्यक्ष में उनको कोई कष्ट नहीं था, लेकिन पांडवों का बढता प्रभुत्व उनकी आँखों में दिन-रात खटकता था। धृतराष्ट्र के अति महत्वाकांक्षी पुत्र दुर्योधन ने शकुनि की सहायता से अपना गुप्तचर तंत्र विकसित कर रखा था, जो जनमानस में व्याप्त […]

कहानी

बिम्ब प्रतिबिम्ब (भाग 4)

प्रयोग की सफलता को लेकर हमारी शंका के बीच, उम्मीद की सिर्फ एक किरण थी कि जिन चूहों पर प्रयोग किया गया था, वे शीघ्र अपना संतुलन बनाना सीख लेते, भोजन की गंध पहचान लेते, टेढ़े मेढ़े रास्तों से गुजरने में फिर से दक्षता प्राप्त कर लेते, और सबसे बड़ी बात ध्वनि पहचानने में उन्हें […]

कविता

नमो नमो

शांत सौम्य दृढ़ निश्चयी समुद्र सा गहरा हिमालय सा ऊँचा, गरीब परिवार का बालक अपनी जिजीविषा के दम पर सत्ता के शीर्ष पर विराजित अनेकों कुचक्रों का का विषपान कर जैसे शिवत्व को पा गया। अपनी जिद को अवसर बनाया जितना पीछे ढकेला गया उतना और आगे बढ़ता गया। सबके दिलों मे उतरता गया आज […]

कविता

मेरी बेटियां

जीने के बस यही बहाने ये मेरे अनमोल नगीने। इनकी खुशियों में सब कुछ है बेटे से न ये कम हैं, गौरव का अहसास कराती बेटी बेटे का भेद मिटाती उम्मीदों से आगे बढ़कर गर्व के पल ये हैं लातीं। बेटी बेटे का भेद न मुझको इन पर ही अभिमान है मुझको रहे सशंकित माँ […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

अपने हिस्से का नया सूरज उगाने के लिए हौसला भी चाहिए कुछ कर दिखाने के लिए क्या छिपाने के लिए है क्या बताने के लिए एक चिंगारी है काफी घर जलाने के लिए करके वादा तोड़ देना है बहुत आसान पर चाहिए हिम्मत बहुत वादा निभाने के लिए .. ज़िंदगी में कब तलक भटकेगा राही […]

कविता

तय है

तय है शाम का आना तय है फिर उदासी में डूब जाना बुहार के रखते हैं तेरी यादों की ज़मीं तय है किसी गुस्ताख़ हवा का फिर से धूल उड़ा जाना। एहसास खत्म करके सोचा सुकून से रह लें मेरे भरम को तोड़ने के लिए फिर, तय है तेरे किसी हमशक्ल का मेरे सामने आ […]

लघुकथा

तीसरा हाथ

रोज रोज की कलह से उकता चुकी थी नीरू। सास के तानों से उसके कान पकने लगे थे। हर झार मंगरैले पर की तर्ज पर किसी भी बात को वह नीरू को बदजात कह उसकी ओर ठेल देती थी। अपने बेटे की मौत का कारण भी नीरू को ही मानते हुए कहती रहती थी कि […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – रे हरजाई पितृ-पक्ष !

पितृपक्ष प्रारंभ हुए कई दिन बीत गए थे पर स्व. बनवारी लाल को नर्क में पितरों वाली खीर-पूड़ी नहीं मिल रही थी। पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ था। पहले पितृ-पक्ष शुरू होते ही बिला नागा स्वादिष्ट भोजन आने लगता था और बनवारी लाल की आत्मा तृप्त होती रहती थी। लेकिन अबकी बार दूर दूर […]

कहानी

कहानी – चिरकुंवारी नदी

इसे कहानी कहूं भी तो कैसे ? कहीं नदी भी कभी कहानी बनती है क्या ? नदी को तो सिर्फ़ बहते रहना होता है–उद्गम से लेकर सागर तक निरंतर, बिना रुके बिना थके। यही तो नियति है नदी की–कभी न मिल पाने वाले दो किनारों का बंधन और आदि से अनंत की ओर नदी का […]

लघुकथा

आज जो बीता

हरिशंकर नायक में वर्मा जी और सुमंत जी मिले. BD भी साथ थे. वर्मा जी और सुमंत जी का रिस्पांस ठीक नहीं था. सुमंत तो बगैर किसी अभिवादन के टोक दिया कि श्वेता जी के मार्फत आपको ड्राफ़्ट के लिए कहा था, परंतु आपने नहीं किया. पहली मुलाकात में सुमंत जी के इस व्यवहार को […]