नवीनतम लेख/रचना

  • रोजगार

    रोजगार

    शहर के बस अड्डे के समीप ही झुग्गियों में से एक झुग्गी में लाली और उसके कुछ साथी तीन पत्ती की बाजी खेल रहे थे । कुल चार मित्र खेल रहे थे और बाकी कई उन्हें...

  • “पिरामिड”

    “पिरामिड”

    (1) वे खड़े पहाड़ भीग रहे दरक गए बरखा बौछार बह रहा गुमार॥ (2) ये बाढ़ बहाव पानी पानी टपके नैन छत न छप्पर नदी तलाव घर॥ महातम मिश्र ‘गौतम’ गोरखपुरी



  • अपनी अपनी छुट्टियाँ

    अपनी अपनी छुट्टियाँ

    वैसे तो परीक्षा खत्म हुए लगभग महीना हो गया था, किन्तु रिजल्ट आने तक पता नहीं क्यों बच्चे इन दिनों को छुट्टियों के दिन मानने को तैयार ही नहीं थे। ऐसा लगता था मानों रिजल्ट का...

  • साया

    साया

    पिछले कितने ही समय से तान्या की उदासी विपिन से देखी ही नहीं जा रही थी पिता को खोने के सदमें के कारण वो अपने आपको भी दर्द में डूबा चुकी थी कई बार विपिन ने...

  • खुशबू

    खुशबू

    कैसे कैद कर पाओगी खुश्बू को तुम वो फूलों की हो या तुम्हारे कर्मों की अच्छा लगता है तुम्हारा मौन हमेशा लोगों से सुनता गाथा तुम्हारे कर्मों कीज़िंदगी के जंग में सदा तुम्हें देखता रहा लड़कर...

  • फ़कीरों की बस्ती

    फ़कीरों की बस्ती

    मैं फ़कीरों की बस्ती में कहीं जा पहुंचा न जाने फिर क्यूं हंगामा खड़ा हो गया मंदिर की घंटी बजते ही लोग मुड़ जाते ईश्वर से हटकर वो मेरी ओर देखने लगा नफ़रत की दीवारों में...

  • चंद पंक्तियाँ

    चंद पंक्तियाँ

    हर शाम का इंतज़ार करती हो तुम इस कदर जैसे पंछी की उड़ान होती है घोंसले की तरफ़ तुम्हारी हर बात नासिका में गंध भर देती है लगता है कि तुमने पुरानी शराब चढ़ा रखी है...

  • मौजूदगी

    मौजूदगी

    न जाने कितनों दिनों से बारिश का कहर, बाढ़ का पानी अंदर बाहर बाढ़ ! तुम्हारा भीतर से यूँ बह जाना अनिवार्य लगता है कभी कभी ! अच्छा है तुम औरत हो ! मगर मेरी आँखें...

कविता