नवीनतम लेख/रचना


  • कविता : औरत

    कविता : औरत

    औरत ! जिंदगी भर भट्टीखाने में धुएं में रोटियां सेंकती हुई बच्चों की परवरिश में गंवा देती है जिंदगी मर्द की डांट सहकर जुल्म बर्दास्त कर खामोशी – सी अख्तियार कर खड़ी रहती है बूत के...

  • कविता : सपना

    कविता : सपना

    आदमी जब अपने सपनों को तिलांजलि देकर किसी औरत के लिए बुनता है एक नया सपना तब वह बन जाता है पति और जब पति पत्नी के ख्वाबों की दुनिया छोड़ देखने लगता है अपनी संतान...

  • कविता : हिलोर

    कविता : हिलोर

    इक हिलोर तेरी यादों की सुने अंतस के सुप्त कणों में रह-रह कर उठती है इक हिलोर अतीत के कब्र में दफन आदमी की परत दर परत को उखेड़ती है इक हिलोर स्वार्थ की दुनिया के...



  • निरुत्तर

    निरुत्तर

    उस घुमावदार गुफानुमा बाजार से तगड़ी खरीदारी करने के बाद पसीने से लथपथ होतीं सुधा और सुरुचि बेहद थक चुकी थीं. प्यास से बेहाल होकर बाहर आकर इधर उधर नज़र दौड़ाई तो आसपास कोई होटल नज़र...

  • वर्षा

    वर्षा

    सावन आया वर्षा संग लाया है खुशियाँ छाईं देखो सावन सुहावना मौसम प्रकृति मस्त है उमड़े मेघ फिर वर्षा हो गई आया सावन बरसात में मेघ उमड़ें वर्षें प्रेम उमड़े माटी महकी है प्रकृति चहकी बरसात...


  • मेरे पापा

    मेरे पापा

    साध पाऊँ लक्ष्य मैं अपना, जगाया मुझमें ये आत्मविश्वास ! बीते पल हैं सुखद स्मृतियाँ, समेटे हैं खुद में खूबसूरत अहसास ! ! स्नेह से मुझको बड़ा किया, खुशियों से दामन मेरा भरा ! सही –...

राजनीति

कविता