कविता

समय प्रबंधन (कविता)

हे! मित्र समय प्रबंधन सीखो , जीवन सुरभित हो जायेगा । नित-नव पल्लव महकेंगे और , जीव दीप-सा बन जायेगा ।। समय प्रबंधन सिखलाता है, सारे काम समय पर करना । एक-एक क्षण की प्रतिपल,प्रतिक्षण , सार्थकता संरक्षित करना ।। गाँधी बापू ने बतलाया, समय प्रबंधन कैसे हो । सभी कार्य मिल करें समय पर, […]

लघुकथा

सफाई

“ममा, मैं कितनी भी कोशिश करूं मेरा मन शांत नहीं रहता, मैं क्या करूं?” व्यथित मानसी बोली. “सफाई.” “मन शांत रखने से सफाई का क्या ताल्लुक है?” मानसी के स्वर में तनिक तलखी थी. “मन में कूड़ा-कचरा भरा होगा, तो मन बचैन ही रहेगा न, कैसे शांत रहेगा? और सबसे पहले मन की, बोलने की […]

कविता

मैं युवा हूँ

मैं युवा हूँ मैं भविष्य हूँ अपने देश का भावी नौजवान हूँ मैं अक्सर सोचता हूँ मैं कहाँ हूँ मैं युवा हूँ मैं शहरी हूँ मैं ग्रामीण हूँ मैं पढ़ा लिखा हूँ पर मैं जद्दोजहद में हूँ लगता है खंडहर में हूँ, मैं ऊँची जाति से हूँ विकट भेद -भाव में हूँ नौकरियों में आरक्षण […]

कविता

बंटवारा

ये मान रहे थे कि कुछ भी तयशुदा नहीं था .. जो घटा अनायास ही था यहाँ से भी और शायद वहाँ से भी। पर घटित का आभास कहीं छठी इंद्रिय को तो था। हुआ ये कि एक जड़ पर टिके दो शाखा अड़ गये आमने सामने एक शाखा छाये से हट कर कहीं अपना […]

बाल कविता

हाथी वाला

हाथी आया हाथी आया । हाथी वाला हाथी लाया । शोर मच गया चारो ओर । बबलू जी पर चले ना जोर ।             बोले करना मुझे सवारी ।             हाथी वाले करो तैयारी ।             हाथी को तुम नीचे […]

सामाजिक

दोगलेपन का शिकार समाज

ताज्जुब की बात है 21वीं सदी का पढ़ा लिखा, अंग्रेजी झाड़ने वाला, आधुनिक समाज एक औरत की खुशी बर्दाश्त नहीं कर सकता। क्या विधवा हो जाने के बाद, या डिवोर्स हो जाने के बाद स्त्री को खुश रहने का कोई हक नहीं, अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का अधिकार नहीं? समाज की घिनौनी और […]

सामाजिक

मैं का भाव मानवीय विकारों में से एक

आज वैश्विक स्तर पर अगर हम मनुष्य प्रवृत्ति देखें तो सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षणिक, आर्थिक, पारिवारिक इत्यादि अनेक क्षेत्रों में अधिकतर व्यक्तियों में मैं का भाव अधिक देखने को मिलता है। जो सोचते है कि अगर मै नहीं होता तो ये काम नहीं होता या होता भी तो मै ही कर सकता था और ये तो […]

कविता

कुबूल है

कुबूल है मुझे तेरी हर मन मर्ज़ियां कुबूल है चाहत की बौछार कर दूँ तेरी अदाओं पर निसार होते, या तमन्नाएं लूटा दूँ तुझे बेशुमार प्यार करते बस एक बार कह दे कि तू मेरा हुआ.. हर मौसम वार दूँ आसमान से चाँद का झूमर तोड़ कर दहलीज़ पर तेरी उतार दूँ, नखरों पर तेरे […]

कविता

जिंदगी कट रही है…

सुबह होती है शाम होती है दिन आता है रात जाती है धूप निकलती है फिर अस्त होती है… इस तरह ही…, हफ्ता महीना वर्ष आते हैं चले जाते हैं इस तरह ही…, दिन बीत रहा है उम्र बढ़ रही है मालूम नहीं मुझे…, जिंदगी जी रहा हूं या दिन काट रहा हूं परंतु मैं…, […]

कविता

बिछड़ने का दर्द

देश शहर है प्यारा अपने ही समाज से है प्यार । चारों धाम से सुखमय मुझको मेरा घर परिवार ।। घर परिवार का दर्द महसूस किया है । अपनों से बिछड़ने का दर्द महसूस किया है ।। मां ने गोद में बिठाकर बाल सहलाया भी नहीं सोलह सावन । पिता का उंगली पकड़कर चला भी […]