गीत/नवगीत पद्य साहित्य

क्यों खोजे महल दुमहले

क्यों खोजे महल दुमहले तू, क्या जाने कब तक डेरा है। इस आनी जानी दुनिया में, है जितना भी बहुतेरा है। चहुँ ओर लिए पिंजरे पिंजरे, सैयाद फिरे बिखरे बिखरे, पंखों में भर विश्वास तू उड़, ये नील गगन बहुतेरा है। कोई क्यों साथ भला देगा, जितना देगा दुगना लेगा, क्यों जोहे बाट तू औरों […]

गीत/नवगीत पद्य साहित्य

मन के दर्पण

अधरों को अपने खोल ज़रा। मन के दर्पण कुछ बोल ज़रा। चुप्पी ज्यादा बढ़ जाए न, ज़िद्द के ताले जड़ जाएँ न, जींवन छोटा पड़ जाए न, तू खुद ही खुद को तोल ज़रा। मन के दर्पण कुछ बोल ज़रा। दूजों से हँस कर मिलता है, हर कहे पे उनके चलता है, पर तुझे ज़हर […]

गीत/नवगीत पद्य साहित्य

कंठ तब होता मुखर है

कंठ तब होता मुखर है। भाव जब होता प्रखर है। भीतर बवंडर डोलता है, और हृदय ये बोलता है, टीस हर अपनी छुपा ले, सिसकियां गहरी दबा ले, वेदना आँखों से बहती, बांध तोड़ तोड़ कहती, उंगलियों के बीच अब तू, ले कलम यूँ खींच अब तू, अश्रुओं को दे के वाणी, अब सुना भी […]

कविता

दो जून की रोटी

सारा खेल है दो जून की रोटी का कोई दिन भर रहता परेशान है तोड़ता है हाड़ अपने इसको पाने की जुगत में कोई होटलों में जाकर बचा छोड़ देता है तश्तरी में इन्हें फैंकने को कूड़ेदान में देखो कैसा मुक्कदर है आदमी का कोई तरसता है इसे पाने को कोई खाके दो कौर छोड़ […]

कविता

शमशान घाट

मैं होकर निराश एक दिन पहुँच गया जिंदा ही शमशान घाट मैंने देखा – मुर्दे को जलते चिता पर चिता से निकलते धुँए को एक मानवीय देह को धीरे-धीरे राख में परिवर्तित होते हुए… जाति भेद, ऊँच नीच छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब पद-प्रतिष्ठा सब कुछ खत्म वाकी बची एक मुट्ठी राख वो भी उढ़ गई एक हवा […]

स्वास्थ्य

कोरोना संक्रमण की आपदा इंसानों पर 

पृथ्वी के रहवासी संक्रमण से जूझ रहे है.ये संक्रमण को समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित अभी तक सुनने पढ़ने में नहीं आया.संक्रमण की चेन तोड़ने की बात सभी करते मगर संक्रमण के आँकड़े घटते बढ़ते हर जगह दिखाई देते है। अनलॉक प्रक्रिया भी इसी कारण से बढ़ाई जाती होगी।भोजन की बात करें तो शाकाहारी और […]

कहानी

कहानी : छत

“मां, आखिर अब इस घर में बचा ही क्या है?पापा के जाने के बाद तुम भी बिल्कुल अकेली हो गई हो।मुझे रोज रोज छुट्टी नहीं मिलने वाली।सामान बांधो और चलो मेरे साथ”,रोहन ने लगभग चीखते हुए कहा सावित्री ने लम्बी सांस भरी और शांत भाव से बोली,”बेटा, मैं इस छत को छोड़कर कैसे चली जाऊं?इसमें […]

कविता

चंचल मन

ये   मन,  कितना    चंचल    है   यह    मन इसकी क्या बात करें, बड़ा  अनोखा है मन मीलों का  सफ़र पल  में तय  करता है मन जागती  आंखों  में  ख्वाब  सजाता  है  मन इस  पल  जो  पहुंचा  चांद   सितारों   तक तो   दूसरे   पल   वसुंधरा   के   गर्भ   तक डुबकियां लगाता है सागर की गहराइयों में […]

इतिहास

🌻व्यंग्यबाण 🌻

🌻व्यंग्यबाण 🌻 मुख पर सुरीले गीत ह्रिदय रसहीन वाणी झरे मेह मन करुणा विहीन सुहाता जिन्हें निज स्वार्थ ही केवल करें श्रृंगार किन्तु मुखड़ा श्री हीन आत्म मुग्ध ऐसे कोई भाता ना आप अपनी महिमा बताते प्रवीन दूजे को गिराते  अपनी जमाते आत्म प्रशंसा नित ही गढ़ते नवीन मिले यदि स्वयं से बली चुप लगाते […]