कविता

शौकीन

दर्द में डूबी हुई
एक तस्वीर हूँ मैं !
टूटी हुई है हर एक कड़ी
वो ज़ंजीर हूँ मैं !
आशाओं की डाल से
टूटा एक पत्ता
तेरे प्यार के दर्द का
शौकीन हूँ मैं !
मंज़िल से भटका
ठोकरें खाता फिरता हूँ
परछाईयों के आगोश में
तुझे ढूढ़ने का
शौकीन हूँ मैं !
तुम्हारा साथ था, जब
अंदाज़ जुदा था, तब
अब तो रुसवाइयों के
आलम हैं मेरे साथी
प्यार में ठोकरें खाने का
शौकीन हूँ, मैं !

सुधांशु रंजन शुक्ल
मो0- 9454346855