शाँति, सबके लिए

आज इन्सान अपने सबसे कठिन दौर से गुज़र रहा है। विज्ञान की उन्नति ने जहां उसके पास सुविधा के साधनों का ढेर लगा दिया है वहीं उसके सामने एक मुश्किल भूल भुलैया भी बना दी है। आज इन्सान के सामने उसकी मंज़िल की साफ़ तस्वीर नहीं है। जिसके सहारे वह आगे बढ़ सके।
ऐसे में दुनिया की दौलत ही उसका एकमात्र मक़सद बनकर रह गई है। दौलत कमाने में भी मुठ्ठी भर लोग ही कामयाब हो पाए हैं बाक़ी लोग गुज़र बसर के लायक़ ही कमा पा रहे हैं और उनसे कहीं ज़्यादा वे लोग हैं जिनकी आमदनी उनकी गुज़र बसर के लिए भी पूरी नहीं पड़ती। तीनों ग्रुप के लोगों की आमदनी कितनी ही ज़्यादा या कितनी भी कम क्यों न हो लेकिन सबके जीवन में शाँति का अभाव है।
रूहानियत के लिए मशहूर भारत के लोगों के जीवन में शाँति का अभाव एक बहुत बड़ी त्रासदी है। इस पर जितनी गम्भीरता से विचार किया जाना चाहिए, वैसे किया नहीं जा रहा है। यह उससे भी बड़ी त्रासदी है।
आज लोग बहुत तरह के मनोवैज्ञानिक दबावों में जी रहे हैं। स्कूल के बच्चे, दफ़्तर के बाबू, घर की मां-बहनें, गांव के किसान और सरकार के मंत्री, सभी बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। सबके मन पर भारी दबाव है। इस दबाव में असल इन्सान कहीं दबकर रह गया है।
आप अपने आस पास से गुज़रते हुए लोगों के चेहरों को ग़ौर से देखेंगे तो आपको उनके होंठों पर मुस्कुराहट, आंखों में सपने और क़दमों में उमंग दिखाई न देगी। आपको सभी चिंता के मारे हुए दिखाई देंगे। चिंता की चिता पर सब जल रहे हैं। समाज मनोरोगियों से भर गया है। सभी के व्यवहार में विकार आ गया है। किसी का मन आक्रोशित है तो किसी का स्वर विद्रोही है। लोग ग़म, ग़ुस्से और प्रतिशोध की भावना से भरे हुए फिर रहे हैं। उनकी नकारात्मकता सबसे पहले ख़ुद उन्हीं को घुन की तरह खाए जा रही है।
समाज की यह तस्वीर खुली आंखों देखने के बाद हमें हमारा फ़र्ज़ बहुत आसानी से समझ में आ सकता है। जीवन का सम्मान हमारा पहला फ़र्ज़ है। हम पर उनका सहयोग अनिवार्य है जो कि सकारात्क सोच के साथ समाज में शाँति के विचार का प्रसार कर रहे हैं।
शाँति का प्रेम और आनंद से सीधा संबंध है और इन गुणों से बाक़ी गुणों का, जैसे कि सत्य, ज्ञान, क्षमा, दया और परोपकार आदि का, विकास ख़ुद ब ख़ुद होने लगता है। हमें इसी चक्र की शुरूआत करनी है। कल्याण के लिए यह अनिवार्य प्रक्रिया है।
शाँति इन्सान के अंदर उपलब्ध होती है। इसकी प्रक्रिया की शुरूआत भी अंदर से होती है। शाँति हमें सुरक्षित होने का अहसास कराती है। अशाँति और असुरक्षा का कोई वास्तविक कारण यहां सिरे से ही नहीं है। यह बात आज सब जानते हैं कि सभी इन्सान एक रचयिता की रचना, एक परमात्मा (अर्रूह) के अंश और एक माता-पिता की संतान हैं। हम सब एक बहुत बड़े परिवार का हिस्सा हैं। यह जानने के बाद भी कोई परिवार के दूसरे सदस्यों को नुक्सान पहुंचाने की भावना रखता है तो केवल इसलिए कि उसके विचार उलझ गए हैं और ऐसा इसलिए हुआ कि ज़िन्दगी को मौत से अलग करके देखना आज का रिवाज बन गया है।
यहां हरेक को मर जाना है। सभी धर्म-मतों में मौत के बाद भी ज़िन्दगी होने की बात कही गई है और उस ज़िन्दगी का सुख-दुख उसके इस जन्म के कर्मों पर निर्भर होना बताया गया है। आज यह तथ्य भुलाया जा चुका है। मौत को याद रखा जाए तो हमारे जीवन की गुणवत्ता सुधर सकती है। यह दुनिया इन्सान के लिए है लेकिन इन्सान इस दुनिया के लिए नहीं है।
इन्सान एक महान रचयिता की रचना है और उसकी रचनाओं में सबसे बड़ी रचना है। उसके सपनों और अरमानों को पूरा होने के लिए इस दुनिया से बड़ी दुनिया की ज़रूरत है और अमर जीवन की भी। वही दुनिया इन्सान की असली मन्ज़िल है। यह दुनिया तो कर्म की दुनिया है। कर्म से तात्पर्य सत्कर्म से है। यह दुनिया इम्तेहान की दुनिया है।
यहां इन्सान जाहिलों, नादानों और शैतानों के बीच ज़िन्दगी बसर कर रहा है। इनके लिए इन्सान की भावनाओं की कोई क़द्र नहीं है। ये किसी पर भी वार कर देते हैं। किसी पर हथियार दे मारते हैं और किसी पर विचार दे मारते हैं। असभ्यता और फूहड़पन की किसी भी हद को ये लांघ जाते हैं। ये किसी धर्म-मत की नैतिकता को नहीं मानते। ये लोग जितने आज हैं, उतने पहले कभी न थे। ये भी जीवन की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इन्हें भी शाँति की सख्त ज़रूरत है।
हमारा फ़र्ज़ है कि हम सबको शाँति के विचार उपलब्ध करा दें। जिसे जो विचार भा जाए, वह उसी तरीक़े से शाँति को पा ले। हमारे चेहरों से शाँति झलके, हमारी बातों से शाँति टपके। हम स्वभाव से शाँत हों। हमारे घरों में शाँति हो। हमारा समाज और हमारा देश शाँति के लिए जाना जाए। इसके लिए हम सबको मिलकर प्रयास करना है।
हम शाँत होंगे तो हम समृद्ध भी होंगे। इस तरह हम आने वाली नस्लों के लिए सबसे बड़ा तोहफ़ा छोड़ कर जाएंगे। हथियार बेचने वाले देशों को भी शाँति की ज़रूरत है और यह हम उन्हें सप्लाई कर सकते हैं। विश्व शाँति आज एक प्रमुख मुद्दा है। शाँति के उपायों को सबसे ज़्यादा जानने वाले हम हैं। हमारे सामूहिक जीवन में शाँति आ जाए तो यही एक बात भारत को विश्व का नेता बनाने के लिए काफ़ी है।
रूहानियत हमारी बुनियादी पहचान है और यह हमारी शक्ति भी है। दुनिया इसे मानती है तो हमारा सामूहिक जीवन इससे ख़ाली क्यों रहे?