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कब तक लटकती रहेंगी दलित बच्चियां यूँ ही पेड़ों पर?

अभी हरियाणा के भागणा में हुए दलित लड़कियों से सामूहिक बलात्कार की घटना के दोषियों को सजा मिली भी नहीं कि आज उत्तर प्रदेश में एक और दिल दहला देने वाली घटना हुई। दो नाबालिग दलित चचेरी बहनों का सवर्णों द्वारा सामूहिक बलात्कार कर के हत्या कर दी जाती है। हत्या भी ऐसी की अपनी सवर्ण होने की मानसिकता के तहत जन्म जात अपने को ताकतवर समझके , गाँव भर में अपनी ताकत दिखाने के लिए उन लड़कियों को दलित होने और कमजोर होने का अहसास दिलाने के लिए उनकी लाशो को बीच गाँव में खड़े पेड़ पर लटका दी जाती हैं। यह अहसास दिलाने के लिए की दलित की इज्जत आज भी सवर्णों के सामने गुलमो की इज्जत के समान है जिसको जब चाजे जैसे चाहे सवर्ण रोंद सकता है , सिर्फ रोंद ही नहीं सकता बल्कि पशु की तरह मार के जंहा चाहे फेंक सकता भी है।

यही वह देश था जब दिल्ली में एक सवर्ण लड़की के साथ हुए सामूहिक बलत्कार के कारण पुरे देश में आक्रोश फ़ैल गया था ।न जाने कितनी ही बड़ी हस्तियों के आँख से आंसू नहीं रुक रहे थे । लोग मोम्बतियाँ लेके सडको पर आ गए थे , जंतर मंतर पर तब तक टिके रहे जब तक निर्भया कानून न बना लिया था।

पर हाल में ही सवर्णों द्वारा दो अमानवीय घटनाये हुई दलित लड़कियों के साथ पर न किसी बड़ी हस्ती के आँख में आंसू आये और न ही मिडिया में इतनी कबरेज मिली । न ही लोग सडको पर आये और न किसी ने मोमबत्ती रैली निकली। यंहा तक की पुलिस भी अपराधियों को सजा दिलाने में और पकड़ने में नाकामयाब रही।

कारण? कारण है दलित होना।
दरअसल ‘ वसुधैव कुटुम्बकम’ का झूठा नारा देने वालो ने अपने ही समाज के एक वर्ग को कभी इंसान नहीं समझा , उनकी नजरो में दलित आज भी उनकी जागीर है , बिना ख़रीदा हुआ गुलाम है जिसकी जमीन और जोरू को वो जब चाहे , जैसे चाहे रोंद सकता है ।

दलित भाइयों , यह हमें स्मरण रहना चाहिए की अच्छे दिन किसी के लाने से नहीं आते और न ही हजारो सालो से जातिवाद की मानसिकता के दंभ में जी रहे समाज की ही मानसिकता बदलने की ज्यादा उम्मीद की
जा सकती है। इसलिए संघर्ष आप को ही करना है अपनी इज्जत के लिए , अपने सम्मान के लिये, अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए। आज जो दोगले नेता हैं जो अपने आप को दलितों का हितेषी कहते हैं वो लोग स्वयं ही उन्ही लोगो के दरवाजे पर पट्टे से बंध गए हैं जो जिम्मेदार हैं दलितों के इस हालत के। ऐसे दोगले नेताओं के भरोसे न रह के अपना संघर्ष स्वयं कीजिये , मिल के कीजिये ।

कानून बनाने से लोगो की मानसिकता नहीं बदली जा सकती, बाबा साहब ने कहा है की ‘ जब सामजिक स्वतंत्रता न हो तब तक क़ानूनी स्वतन्त्रता कोई मायने नहीं रखती’ हमें सामाजिक स्वतन्त्रता लेनी होगी, एक संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा, वर्ना आने वाली पीढियाँ यूँ ही बलत्कार के बाद हत्या कर के पेड़ से लटकाती जाती रहेंगी।

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परिचय - संजय कुमार (केशव)

नास्तिक .... क्या यह परिचय काफी नहीं है?

4 thoughts on “कब तक लटकती रहेंगी दलित बच्चियां यूँ ही पेड़ों पर?

  1. बहुत उम्मीद है मोदी जी से जिसने सभी जातियों को साधने की कोशिश की है …इस तरह की घटनाएँ निंदनीय, चिंतनीय और तुरंत समाधान की तरफ ध्यानाकृष्ट करती है. एक महिला जज के साथ, पुलिस कर्मी के साथ भी बलात्कार… पुरुष की कुत्सित मानसिकता को उजागर करता है. हमें इसके लिए सामाजिक, राजनीतिक और न्यायायिक समाधान की आवश्यकता है.

  2. केशव जी, आपका लेख अच्छा है, लेकिन यह घटना दलित ही नहीं किसी भी जाती धर्म की लड़कियों के साथ हो सकती है. बलात्कार करने वाले अपनी हवस में जाति नहीं देखते, बल्कि केवल शरीर देखते हैं. यह घटना हर तरह से निंदनीय है और दोषियों को कठोरतम दंड दिया जाना आवश्यक है. लेकिन यह कार्य उस व्यक्ति की पार्टी के राज में नहीं हो सकता जो न्बलात्कार को मात्र एक गलती मानता हो, और उसके लिए ‘सॉरी’ बोल देना पर्याप्त समझता हो. जब तक प्रदेश में मोदी जी जैसे किसी व्यक्ति की सरकार नहीं आएगी, तब तक दोषियों को दंड मिलना कठिन ही नहीं असंभव है.

  3. केशव भाई आप हमेशा अहर चीज को जाती के एंगल से देखते है , इंसानियत के नहीं … बालात्कारी कोई भी सवर्ण नहीं था . याद है आपने दामिनी केस में भी कहा था की लड़की aसवर्ण है तभी हो हल्ला हो रहा है , उसी समय मैंने आपको जानकारी दी थी की लड़की सवर्ण नहीं थी और उसका गाव बलिया है …… बात यहाँ दलित सवर्ण की नहीं, इंसानियत की है,.

    1. कमल जी,भारत के देहातो में अब भी बलात्कार की वजय जाती आधारित ही होता है।
      और थोडा और जानकारी बढाइये , यादव दलित नहीं होते।
      दूसरा बलिया की वह लड़की कुर्मी थी , नभाटा पर वह लेख और उसकी टिप्पणिय फिर से पढ़िए

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