कहानी

आधा-अधूरा हक – कहानी

गिरिधर बाबू के यहाँ पँचायत बैठी थी। उनके और उनके भाइयों के बीच पैतृक संपत्ति के बँटवारे का फैसला होना था। दोनों छोटे भाई नृपेंद्र और जगतेश्वर आये हुए थे। सौतेला होने के बावजूद गिरिधर बाबू ने कभी अपने दोनों भाइयों को खुद से अलग नहीं समझा। सदा उनको अपने बेटे नवीन के बराबर मानते रहे लेकिन उन दोनों ने कभी उनकी भावना को नहीं समझा। वो दोनो हमेशा एक होकर गिरिधर बाबू के खिलाफ षडयंत्र करते रहे।

पँचायत शुरु हुई। नृपेंद्र काफी रोष में बोला “भैया, आपने अच्छा नहीं किया उस पीपल के पासवाली जमीन के आधे हिस्सेपर अपना मकान बनाकर। वो मुझे मिला था”

किसी के कुछ कहने से पहले उन तीनों के बेहद करीबी पारिवारिक मित्र रामरूप बाबू बोल उठे “नृपेंद्र, क्या तुमसे कुछ छिपा के हुआ है? किन हालातों में ये करना पड़ा क्या तुम नहीं जानते? तुम ठीक कह रहे हो, वो जमीन तुम्हें मिली थी लेकिन तुमने उस समझौते का मान रखा? आज जिस घर में हम बैठे हैं क्या तुम्हें उसकी स्थिति नहीं दिख रही? टूट-टूटकर गिरता ये मकान कब जमीदोज हो जाएगा कुछ कहा जा सकता है?”

नवीन ने भी नृपेन्द्र से कहा “चाचाजी, हमने तो इस छोटी सी जमीनपर बना अपना ये पुश्तैनी मकान लेकर आपको पीपल के पास की पूरी जमीन दे दी थी जो क्षेत्रफल में इसकी दुगुनी है। ये मकान अब रहने के लायक नहीं। इसे नये सिरे से बनाने को भी मैं तैयार था लेकिन इसके ऊपरी तलको आपने और छोटे चाचा जगतेश्वर ने अरसे से ताला लगा बंद कर रखा है। उसे खोले बिना मैं इसे तोड़ता कैसे?”

“तो क्या मैं चाबी लेकर तुम्हारे पास आया नहीं था?”

“आये थे, जरूर आये थे, लेकिन उस दिन जिसके अगले दिन मैं पीपल के पास की जमीनपर भूमिपूजन कराने जा रहा था तब। सारी तैयारियाँ हो चुकीं थी। आप शुरु से झूठ बोलते रहे कि चाबी जगतेश्वर के पास है जबकि एक आपके पास भी थी। घर की हालत लगातार बिगड़ रही थी। बरसात के दिनों में स्थिति नर्क से बदतर हो जाती है यहाँ। हमारे सब्र का बाँध तब टूटा जब एक रात इसकी बालकनी भरभरा के गिर पड़ी। थोड़ी देर पहलेतक मेरा बड़ा बेटा प्रीतम उसी के नीचे टहल रहा था। कुछ हो जाता तो आप आते जिम्मेदारी लेने? इसके अलावा यदि उस वक्त कोई गाँव का आदमी उसके नीचे होता तो क्या होता?
हमने कभी आपदोनों से कुछ नहीं माँगा। हमारे पुश्तैनी बर्तन, गहने इनका कभी कोई ख्याल नहीं किया हमने। अचल संपत्ति में भी आपदोनों को इच्छित जमीनें दे दी। ये जो छोटी सी जमीन हमें मिली थी, आप उसपर भी हमें काम नहीं करने दे रहे थे। आपलोग उतना कुछ लेने के बाद भी संतुष्ट नहीं थे। आपने फैसले का स्टाम्प पेपर बनवाने में भी कोई रुचि नहीं दिखाई। आपके दिमाग में क्या चल रहा था आप जानें लेकिन जब फैसला होने के एक माह बाद तक आपलोगों ने स्टाम्प तक नहीं बनवाया और अपनी-अपनी नौकरियों पर चले गये तब भी हम शांत थे किन्तु अब ये घर गिर रहा है। हम ही सदा बर्दाश्त क्यों करें? पीपल के पास की जमीन दादाजी ने ही आपके और बाबूजी के नाम की थी। उसका आधा हक उन्होंने ही हमको दिया था। हमने आपका हक तो नही मारा। हमने सिर्फ उसी आधे में अपना घर बनाया है”

अबतक शांत बैठे गिरिधर बाबू बोल उठे “नृपेंद्र, जगतेश्वर, तुम दोनों मेरे बेटे के जैसे हो। मैंने सदा तुमको इसी नजर से देखा है। कभी तुमको अपना हिस्सेदार नहीं माना और नृपेंद्र, मुझे पता चला है कि तुम अब पीपल के पास की जमीन का बचा आधा हिस्सा और इस मकान में भी आधा हक चाहते हो, मैंने तुम्हारी दोनों बातें मानते हुए ये नया स्टाम्प तुम्हारी इच्छा के अनुसार लिखवाया है। बची तीसरी जमीन जो शंकरचौरा के पास है जिसका क्षेत्रफल हमारी इनदोनों जमीनों के आधे-आधे हिस्से से थोड़ा ज्यादा ही है, वो मैं जगतेश्वर को देता हूँ। बचा हमारा १० कठ्ठा खेत हम तीनों भाइयों में बराबर-बराबर बँटेगा। जगतेश्वर, तुम्हें ये फैसला मंजूर है?

शुरु से ही सारे पुश्तैनी कीमती गहनों, बर्तनों को धोखे से हथियाकर नृपेंद्र के साथ बाँटनेवाला तथा गलत इरादे से सारी जमीनों के कागज अपने पास दबाये रखनेवाला जगतेश्वर समाज के सामने जलील होने के डर से चुपचाप बैठा सब सुन रहा था। एकबार फिर अपने फायदे का सौदा होता देख उसने झट हामी भर दी।

रामरूप बाबू ने नये फैसले के स्टाम्प नृपेंद्र और जगतेश्वर की ओर बढ़ाये। दोनों ने बिना देरी लगाये दस्तखत कर दिया। गिरिधर बाबू ने भी अपने हस्ताक्षर किए। गवाहों के सिग्नेचर हो जाने के बाद फैसले ने अंतिम कानूनी रूप ले लिया। फैसला हो जाने की खुशी में कातिब (जमीन की लिखा-पढ़ी का काम करानेवाला) ने मिठाई मँगवाने को कहा। लोग मिठाइयाँ खाते हुए गिरिधर बाबू के शुरु से किए गए त्याग की चर्चा कर रहे थे तो नृपेंद्र और जगतेश्वर अपने नफे-नुकसान का आकलन में लगे थे लेकिन गिरिधर बाबू के यहाँ एक संतोष था कि उन्होंने देर से ही सही, आधा-अधूरा ही सही, लेकिन अपना हक पा लिया।

*कुमार गौरव अजीतेन्दु

शिक्षा - स्नातक, कार्यक्षेत्र - स्वतंत्र लेखन, साहित्य लिखने-पढने में रुचि, एक एकल हाइकु संकलन "मुक्त उड़ान", चार संयुक्त कविता संकलन "पावनी, त्रिसुगंधि, काव्यशाला व काव्यसुगंध" तथा एक संयुक्त लघुकथा संकलन "सृजन सागर" प्रकाशित, इसके अलावा नियमित रूप से विभिन्न प्रिंट और अंतरजाल पत्र-पत्रिकाओंपर रचनाओं का प्रकाशन

One thought on “आधा-अधूरा हक – कहानी

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छी कहानी. एक परिवार में एक ओर स्वार्थ और दूसरी ओर कर्तव्य के द्वंद्व का अच्छा दिग्दर्शन किया गया है. बधाई.

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