गीतिका/ग़ज़ल

अपनी ही अंजुमन में…

अपनी ही अंजुमन में मैं अंजाना सा लगूं

बिता हुआ इस दुनिया में फ़साना सा लगूं.

 

गाया है मुझको सबने, सबने भुला दिया

ऐसा ही इक गुजरा हुआ तराना सा लगूं.

 

अपने ही हमनशीनों ने भुला दिया मुझे

तो कैसे अब मैं गैरों को खजाना सा लगूं.

 

कई बार डूबा हूँ वहां मंजिल जहां पे थी

आज इक डूबा हुआ किनारा सा लगूं.

 

एक दिन निकल गया मैं खोज में उनकी

वो तो मिली नहीं, खुद को ही बेगाना सा लगूं.

 

‘आशू’ की आंसू थम न पाए आज तक

ऐसे गई के बिता हुआ ज़माना सा लगूं.

-अश्वनी कुमार 

अश्वनी कुमार

अश्वनी कुमार, एक युवा लेखक हैं, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत मासिक पत्रिका साधना पथ से की, इसी के साथ आपने दिल्ली के क्राइम ओब्सेर्वर नामक पाक्षिक समाचार पत्र में सहायक सम्पादक के तौर पर कुछ समय के लिए कार्य भी किया. लेखन के क्षेत्र में एक आयाम हासिल करने के इच्छुक हैं और अपनी लेखनी से समाज को बदलता देखने की चाह आँखों में लिए विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सक्रीय रूप से लेखन कर रहे हैं, इसी के साथ एक निजी फ़र्म से कंटेंट राइटर के रूप में कार्य भी कर रहे है. राजनीति और क्राइम से जुडी घटनाओं पर लिखना बेहद पसंद करते हैं. कवितायें और ग़ज़लों का जितना रूचि से अध्ययन करते हैं उतना ही रुचि से लिखते भी हैं, आपकी रचना कई बड़े हिंदी पोर्टलों पर प्रकाशित भी हो चुकी हैं. अपनी ग़ज़लों और कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए एक ब्लॉग भी लिख रहे हैं. जरूर देखें :- samay-antraal.blogspot.com

2 thoughts on “अपनी ही अंजुमन में…

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत सुन्दर ग़ज़ल.

    • अश्वनी कुमार

      धन्यवाद सर

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