गीतिका/ग़ज़ल

मेरी माँ ने

मेरी माँ ने झूठ बोल के आंसू छिपा लिया

भूखी रह के भी, भरे पेट का बहाना बना लिया.

सर पे उठा के बोझा जब थक गई थी वो

इक घूंट पानी पीके अपना ग़म दबा लिया.

दिन सारा कि थी मेहनत पर कुछ नहीं मिला

इस दर्द को ही अपना मुकद्दर बना लिया.

 

फटे हुए कपड़ों को सीं सींकर है पहनती

ग़मों को फिर आँखों में अपनी छिपा लिया.

 

कब से अकेली जी रही है खुद ही के सहारे

उसने था तन्हाई को अपना बना लिया.

 

पता था उसे आज भी आया नहीं बापू

तो डाकिया से फिर पुराना ख़त पढ़ा लिया.

 

‘आशू’ अगर इस माँ का अब इक आंसू निकल गया

तो मान लेना तुमने अपना सब गवां दिया.

-अश्वनी कुमार 

परिचय - अश्वनी कुमार

अश्वनी कुमार, एक युवा लेखक हैं, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत मासिक पत्रिका साधना पथ से की, इसी के साथ आपने दिल्ली के क्राइम ओब्सेर्वर नामक पाक्षिक समाचार पत्र में सहायक सम्पादक के तौर पर कुछ समय के लिए कार्य भी किया. लेखन के क्षेत्र में एक आयाम हासिल करने के इच्छुक हैं और अपनी लेखनी से समाज को बदलता देखने की चाह आँखों में लिए विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सक्रीय रूप से लेखन कर रहे हैं, इसी के साथ एक निजी फ़र्म से कंटेंट राइटर के रूप में कार्य भी कर रहे है. राजनीति और क्राइम से जुडी घटनाओं पर लिखना बेहद पसंद करते हैं. कवितायें और ग़ज़लों का जितना रूचि से अध्ययन करते हैं उतना ही रुचि से लिखते भी हैं, आपकी रचना कई बड़े हिंदी पोर्टलों पर प्रकाशित भी हो चुकी हैं. अपनी ग़ज़लों और कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए एक ब्लॉग भी लिख रहे हैं. जरूर देखें :- samay-antraal.blogspot.com

5 thoughts on “मेरी माँ ने

  1. बहुत खूब ! माँ की ममता की तुलना किसी से नहीं की जा सकती. बढ़िया ग़ज़ल.

  2. माँ की ममता को नापने का कोई पैमाना नहीं है . कविता दिल को छु लेने वाली है.

    1. आप दोनों महानुभावों का आभारी हूँ…
      धन्यवाद!!!

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