गीतिका/ग़ज़ल

जब होके आस-पास भी खला होगा

जब होके आस-पास भी खला होगा

तभी तो रोने में फिर इक मज़ा होगा.

 

आँखें तेरी देखेंगी जब तड़पता मुझे

मैं सोचता हूँ वो कैसा सिलसिला होगा.

 

हो सामने हर वक़्त ऐसी बात नहीं

वो अक्स उसका मुझसे है बंधा होगा.

 

चलता तो हूँ पर न पता है राह मुझे

सही राह जो मिल जाए तो, क्या समां होगा.

 

उसके खतों के टुकड़ों में जब ढूंढूंगा खुद को

अब तो तभी ये हाल-ए-दिल बयां होगा.

-अश्वनी कुमार 

अश्वनी कुमार

अश्वनी कुमार, एक युवा लेखक हैं, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत मासिक पत्रिका साधना पथ से की, इसी के साथ आपने दिल्ली के क्राइम ओब्सेर्वर नामक पाक्षिक समाचार पत्र में सहायक सम्पादक के तौर पर कुछ समय के लिए कार्य भी किया. लेखन के क्षेत्र में एक आयाम हासिल करने के इच्छुक हैं और अपनी लेखनी से समाज को बदलता देखने की चाह आँखों में लिए विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सक्रीय रूप से लेखन कर रहे हैं, इसी के साथ एक निजी फ़र्म से कंटेंट राइटर के रूप में कार्य भी कर रहे है. राजनीति और क्राइम से जुडी घटनाओं पर लिखना बेहद पसंद करते हैं. कवितायें और ग़ज़लों का जितना रूचि से अध्ययन करते हैं उतना ही रुचि से लिखते भी हैं, आपकी रचना कई बड़े हिंदी पोर्टलों पर प्रकाशित भी हो चुकी हैं. अपनी ग़ज़लों और कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए एक ब्लॉग भी लिख रहे हैं. जरूर देखें :- samay-antraal.blogspot.com

2 thoughts on “जब होके आस-पास भी खला होगा

  • विजय कुमार सिंघल

    वाह ! वाह ! बहत खूब !!

    • अश्वनी कुमार

      सर मैं धन्यवाद देता हूँ आपका…

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