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आस्तिको द्वारा ईश्वर के विषय में बोला गया झूठ

यदि ईश्वर का अस्तित्व वास्तव में होता तो लोगो में उसको लेके भिन्न भिन्न धारणाये क्यूँ हैं? अलग अलग मतों के लोगो की ईश्वर को लेके मान्यताये मान्यताये अलग और विपरीत क्यों हैं? यंहा तक की हिन्दुओ में ही ईश्वर को लेके सैकड़ो मत प्रचलित हैं । कोई कहता है इश्वर सगुन है तो कोई कहता है निर्गुण है। कोई साकार कहता है तो कोई निराकार कहता है । कंही इश्वर को एक बताया गया है तो कंही उसका अंश हर स्थान / जीव में बताया गया है।

कंही उसे घट घट में व्याप्त माना गया है तो कंही उसे हिमालय पर्वत या बैकुंठ में विराजमान माना गया है।

इस्लाम में भी अल्लाह को सातवे आसमान में विराजमान बताया गया है जबकि इस्लाम में ही अल्लाह को निराकार बताया गया। यानि इन विश्वासों में परस्पर कोई तालमेल नहीं ।

हम जो भी तथ्य अनुभव करते हैं , उनके बारे में मतभेद की गुंजाईश नहीं होती , जैसे सूर्य से प्रकाश मिलते हुए सभी अनुभव करते हैं। आग से सभी को गर्मी और जलन मिलती है।
वैज्ञानिक तरीके से जांच परख के किये गए निष्कर्षो में कोई अंतर नहीं होता।
अब यदि वास्तव में ईश्वर का अस्तित्व है जैसा की आस्तिक दावा करते हैं और उन्होंने वास्तव में ईश्वर को अनुभव किया है तो ईश्वर से सम्बंधित विश्वासों में इतनी भिन्नताए क्यों? एक मान्यता दूसरी मान्यता को क्यों काटती है। इनके परस्पर विरोधी विश्वासों से यह सिद्ध होता है की ईश्वर का अनुभव करने वाले सत्य नहीं थे बल्कि एक सफ़ेद झूठ है । इस झूठ का इस्तेमाल धर्म के धंधेबाजो ने लोगो ईश्वर सम्बन्धी व्यर्थ की बातो में उलझा के अपना उल्लू सीधा किया है ।

परिचय - संजय कुमार (केशव)

नास्तिक .... क्या यह परिचय काफी नहीं है?

5 thoughts on “आस्तिको द्वारा ईश्वर के विषय में बोला गया झूठ

  1. केशव जी आप के और आपके विचार के वारे में भी विभिन्न २ धारणाएँ हैं । आप भी आज या इस पल जैसे हैं वैसे नहीं रहेंगे । द्रश्य सृष्टि पट पर अभिनय वत हैं, द्रष्टा भी अपेक्षिक हैं । सब कुछ परिवर्तनशील है । अास्तिक नास्तिक अवस्थाएँ भी मन की हैं । मन का स्रोत है आत्मा । बिना उसमें प्रवेश किये स्वयं को या इस द्रष्ट जगत (ज = य= जो, गत= चलायमान) को नहीं जाना जा सकता । तर्क से तर्कातीत को समझ पाना आसान नहीं है । तर्क का उद्गम व अन्त भाव में है । भाव भावातीत से आते हैं । भावातीत ही भाव, मन, शरीरों व जगत के संचालक, उत्प्रेरक, पालक, विनाशक व सृजनकर्त्ता हैं । सृष्टि चक्र का स्रोत सृष्टि के प्रति कण, प्रति मन व प्रति भाव में/ द्वारा परिलक्षित किया जा सकता है । सब अपनी २ अवस्थानुसार उसे देखते चलते हैं । निर्गुण सगुण उसी की आवश्यकता या परिस्थितिनुसार आयीं या परिलक्षित अवस्थाएँ हैं । अास्तिकता अनास्तिकता आपकी या किसी की अवस्था है, उसको, किसी और को या जगत को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता । आपकी द्रष्टि, विचार, भावना या अवधारणा कभी भी बदल सकती है । बस देखते चलिये, द्रष्टा बने रहिये, बदलते द्रश्य देखते चलिये । समय के सरोवर में अपना चेहरा कभी दीख जाएगा । वह क्या है, क्या नहीं, कोंन क्या समझ रहा है, नहीं समझ पा रहा है, समझ आ जाएगा । पूछना नहीं पड़ेगा, बताना नहीं पड़ेगा, सब सहज ही आप में यह प्रकट हो जाएगा । शुभमस्तु ।

    1. प्रणाम गोपाल जी,
      परिवर्तन तो प्रकर्ति का नियम है इससे इंकार नहीं।
      पर अभी आपसे सिर्फ एक प्रश्न क्या आत्मा नाम की चीज होती है?

  2. केशव जी आप के विचारों में दम है , मैं एक तर्कशील हूँ और धर्मों के चक्रों में कभी नहीं पड़ा , मैं किया मेरे खानदान का कोई भी सदस्या धर्म के अंध विश्वासों नहीं पड़ता लेकिन कोई इश्वर है या नहीं कोई अल्ला है या नहीं मैं कभी ऐसे चक्रों में नहीं पड़ा किओंकि यह एक ऐसी बात है जिस को कोई समझ नहीं पाया लेकिन मेरी बात को गलत ना मानना मैं सोचता जरुर हूँ कि यह हमारा शरीर के एक एक अंग का अपना अपना function है जो मिल कर इस शारीर को चलाते हैं . किया है मुझे पता नहीं .

    1. सही कहते हैं आप. ईश्वर एक निराकार शक्ति है, जिसे सब अपनी-अपनी सीमाओं में अनुभव करते हैं. कुछ नहीं कर पाते, तो यह उनकी कमजोरी है, ईश्वर की नहीं.

  3. आपके तर्कों में दम है, लेकिन ईश्वर को घाट-घाट में व्याप्त माना गया है, यह सत्य है. जिसको कैलाश पर्वत या हिमालय या क्षीरसागर में माना गया है वह ईश्वर नहीं बल्कि कोई देवता है.
    हालाँकि इस मान्यता का भी कोई ठोस आधार नहीं है. लेकिन इसके कारण ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न नहीं लग जाता.

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