सामाजिक

खुनी खेल और फूटबॉल के गोल ! आप क्या देखना पसंद करेंगे ?

आज समाचारों में क्या है ?

खुनी खेल और फूटबॉल के गोल ! आप क्या देखना पसंद करेंगे ?

इसके जवाब में कोई कहेगा “हत्त, ईराक का क्या लेके बैठो ? फूटबॉल  की सुना ! ” तो कोई कहेगा “दुनिया में इतना कुछ हो रहा है इंसानों का वजूद खतरे में है और लोगों को फूटबॉल की पड़ी है ?

आज पूरी दुनिया का ध्यान ईराक और फूटबॉल पर केन्द्रित है ! भारत में भी अब चुनावपूर्व और पश्चात का भी ग्लैमर बढती महंगाई से ख़त्म हो चूका है ! और अभी कोई क्रिकेट मैच भी नहीं चल रहा तो लोगों का ध्यान भी इन्ही दो वैश्विक घटनाओं से आंदोलित हैं !

कोई ईराक के बहाने पुरे विश्व के इस्लाम की जड़ें खोदने में व्यस्त है तो तो कोई विश्व के सबसे ज्यादा लोकप्रिय खेल में भारत का नामोनिशान तक नहीं होने के लिए सरकार को कोसने में व्यस्त है ! कोई ईराक के आतंकवादियों का ठीकरा उनका सम्बन्ध अमेरिका से जोड़कर उसकी महासत्ता की नीती पर फोड़ धर्म को पाक दामन साबित करने में एडी चोटी का जोर लगा रहा है तो कोई भारत में फूटबॉल की जगह क्रिकेट की अधिक लोकप्रियता और व्यवसाईकरण की वजह से हौकी के ध्यानचंद को भारत रत्न न मिलने के बावजूद क्रिकेट के भगवान को भारत का दुनिया में रिकॉर्ड स्थापित करने का श्रेय देकर फूटबॉल में पीछे रहने की क्षतिपूर्ति हो गई मानने और मनवाने पर तुला हुवा है !

इस तरह ईराक और  फूटबॉल को हर कोई स्वतंत्र रूप से देख रहा है ! अपने अपने नजरिये से इन दोनों वैश्विक आन्दोलनो का संबंध कई बातो ,कारणों से जोड़ रहा है !

लेकिन क्या कोई भी ईराक और फूटबॉल को एकदूसरे से जोड़कर देखने का ख़याल तक अपने जेहन में ला पा रहा है ?

कैसा बेवकूफी भरा ख़याल है यह ?

शायद आपके मन में भी अभी अभी यही उपहास भरा सवाल आया होगा ! ईराक और फूटबॉल को एक दुसरे से जोड़कर देखना वास्तव में प्रथम दृष्टया कुछ ऐसा ही प्रतीत होगा ! बैठे बैठे लेखक के दिमाग में उपजी कोई खुराफात ही लगेगी !!

लेकिन …. जैसे आप ईराक की बगावत को किसी धर्म से जोड़ तुलना में अपने धर्म को दुनिया के लिए श्रेष्ठ साबित करने के लिए मजबूर हो ,या फिर किसी की नीति पर ठीकरा फोड़ धर्म को ऐसे आरोपों से मुक्त रखने के लिए मजबूर हो और फूटबॉल की लोकप्रियता के सेहरे से भारत के वंचित रहने से दुखी होने पर मजबूर हो या फिर वह कमी क्रिकेट जैसे किसी गैर राष्ट्रीय खेल से मिले भारत के सन्मान से संतुष्ट होने के लिए मजबूर हो …. वैसे ही मैं भी ईराक और फूटबॉल को एक दुसरे से जोड़कर दुनिया में कवल और केवल इंसानों से जुडी, एकसाथ घटने वाली ये दोनों घटनाएँ आखिर अपने अपने एक दुसरे से सम्पूर्णत: विरोधाभासी आगाज और अंजाम को लेकर ऐसा क्या सन्देश देना चाह रही है यह जानने के लिए मजबूर हूँ ! बेकरार हूँ !!

बताइये आज खेलों का हर 20-25 किलोमीटर पर मतभिन्नता रखने वाले लोगों द्वारा विश्व स्तर पर निरंतर सफल आयोजन किस बात का परिचायक है ?

और

यह भी बताइये की

इंसान की उत्पत्ति से चले आ रहे कबीलाई युद्धों से लेकर आज के निरंतर आतंकवाद की आत्मघाती हमलावर फ़ौज भी किस बात का परिचायक  है ?

गौर से देखें तो खेलों का विश्वस्तर का आयोजन और देशों की जमीनी सीमा से परे उसमे विश्ववासियों का वह उल्हासित आन्दोलन इंसान के सामजिक जीवन की सकारात्मकता का उच्चतम स्तर है !

और, इसी समाज में अलग अलग पहचान की सीमा में बंटे लोगों द्वारा किया जा रहा ईराक का एक बेख़ौफ़ वहशियत भरा नरसंहार जिसे कोई लड़ाई या युद्ध कहना भी इन शब्दों का अपमान होगा उसी इंसान के सामजिक जीवन की नकारात्मकता जा उच्चतम स्तर है !

कैसे ? कैसे संभव है ये की इंसान की अच्छाई और बुराई के उच्चतम स्तर को एकसाथ ,एक ही समय में होते हुवे देख भी हम केवल एक घटना को देख इंसान के सकारात्मक भविष्य के प्रति अपने उच्चतम स्तर की संतुष्टि के साथ आश्वस्त हो जाएँ ? या फिर केवल दूसरी घटना को देख हमारे सम्पूर्ण अंधकारमय भविष्य को लेकर सम्पूर्ण निराश हो जाएँ ?

लेकिन इन दोनों घटनाओं की गंभीरता से परे आज हममे से जो फूटबॉल या खेल प्रेमी हैं उनके लिए ईराक मात्र एक रूटीन खबर है जिसकी गंभीरता किसी फूटबॉल खिलाड़ी के एक गोल करते ही फुर्र हो जाती है ! और ईराक जैसी घटनाओं को अंजाम देने या फिर उनको गंभीरता से लेने वालों द्वारा तो दुनिया में (दुश्मन) देशों के बीच खेल, कला आदि के आयोजन को ऐसे भी  useless और होपलेस माना जाता है !  लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है ? दोनों घटनाओं को अलग अलग नजर से देखनेवालों के लिए दूसरी घटना भले ही बेमतलब हो लेकिन क्या इंसान के सामजिक जीवन के दोनों पहलुओं का समाज के जन्म से ही एकसाथ चलते रहना और एकसाथ प्रगति कर अपने उच्चतम और निर्णायक स्तर पर पहुँचाना क्या वास्तव में बेमतलब है ? नहीं न ?

 

तो फिर समय की यह निर्णायक दस्तक सुनाई देने के लिए क्या आतंकवादियों के हाथ परमाणु बम लगने का इंतज़ार हो रहा है ? जो जमीनी सीमा से भी ज्यादा खतरनाक धर्म की सीमा को हम अब भी नहीं पहचान रहे हैं और  ऐसी घटनाओं का फिर से धर्म से जुड़ा विश्लेषण कर रहे हैं ! क्यूँ हम तो आतंकवादी नहीं हैं न ? फिर जो बात अंत में  आतंकवाद की जड़ साबित होती है उससे हमारा गला कटने के बावजूद हम उसे गले से क्यूँ लगाए हुवे हैं ?

जमीन की वास्तविक सीमाओं में बटकर भी खुश रहने वाला इंसान धर्म की काल्पनिक और अदृश्य सीमा में खुश रहने के लिए क्यूँ तैयार नहीं ?

जब की ऐसे ही खूनखराबे पर उतर आनेवाले इंसान की जाती के ही लोगों द्वारा सदा सर्वदा विभिन्न और अपने अपने भौगोलिक, सामजिक कारणों की वजह से भविष्य में भी कभी एकमत न हो सकने वालों के बीच विश्वस्तर पर  खेलों आदि के सफल आयोजन के पीछे की खेल भावना, प्रतियोगिता के बावजूद भ्रातृभावना  क्या बिना धर्म के संभव थी ? तो कोई भी हो ,किसी का भी हो धर्म की इस उच्चतम उपलब्धि को हम क्यूँ अनदेखा कर असल में धर्म के नाम पर हो रही बातों के लिए धर्म के नाम पर अंत में इंसान को ही कटघरे में खड़ा करते हैं ? क्यूँ की अगर देख सको तो इसमे कोई भी confusion नहीं है ! धर्म भी अपने उच्चतम स्तर पर सबके सामने है और धर्म के नाम पर हो रहा अधर्म भी ! यही ईराक और फूटबॉल  का आपस में सम्बन्ध है !! जो इंसान के जन्म से चलता आया है, लेकिन अब दोनों के अपने अपने अंतिंम स्तर पर पहुँचने के बाद अब यह हम पर है की हम इन दोनों में से आगे क्या जारी रखना चाहते हैं ? जो नहीं चाहते उसके लिए विश्वस्तर पर एकमत होना होगा ! और हाँ ,ध्यान रहे ! बिना किसी नए ,पुराने या तीसरे विकल्प के !! क्यूँ  की अच्छे ,बुरे दोनों के सिद्ध विकल्प दुनिया के सामने पहले से हैं ! आपके विकल्प की जिद को त्यागना ही इस नए सफ़र का पहला सफल कदम होगा ! ईराक में भी एक ही धर्म के होने के बावजूद अपने आप को ही अपने देश और धर्म के लिए श्रेष्ठ विकल्प समझ कर नरसंहार करने वालों में कल एक और तबका खड़ा हो जाएगा जो अपने ही कुनबे को श्रेष्ठ मानकर फिर उन्ही लोगों को मारेगा काटेगा आज जिनके साथ कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ रहा है ! तो सोचिये जरुर ……! धन्यवाद !

परिचय - सचिन परदेशी

संगीत शिक्षक के रूप में कार्यरत. संगीत रचनाओं के साथ में कविताएं एवं गीत लिखता हूं. बच्चों की छुपी प्रतिभा को पहचान कर उसे बाहर लाने में माहिर हूं.बच्चों की मासूमियत से जुड़ा हूं इसीलिए ... समाज के लोगों की विचारधारा की पार्श्वभूमि को जानकार उससे हमारे आनेवाली पीढ़ी के लिए वे क्या परोसने जा रहे हैं यही जानने की कोशिश में हूं.

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