कविता

मन आज फिर डूब गया!!

मन आज फिर डूब गया
यादों के अंधियारे जंगल में
फिर उतरा है बीती के दलदल में
आँखों में नीर भर आया
शिथिल अंग पड गए
फिर कोई घाव उभर आया
भावना के भीषण आवेग में
बाँध दुखो का टूट गया
पथ में फिर अँधियारा छाया
फिर मेरा मन कोई लूट गया
बिखरी बिखरी जैसे
सूखे पीपल की सूखी डालें
ऐसे सूखे शब्द मेरे और
स्मृतियों के उधड़ी उधड़ी छालें
जैसे कोई तोड़ रहा हो
पेड़ो पर लगे मीठे फल
मैं भी छाँट रहा हूँ ऐसे ही
जीवन से कुछ मीठे पल
सुस्ताया सा हार सा मन
कुंठाओं से ऊब गया
मन आज फिर डूब गया!!

________सौरभ कुमार दुबे

सौरभ कुमार दुबे

सह सम्पादक- जय विजय!!! मैं, स्वयं का परिचय कैसे दूँ? संसार में स्वयं को जान लेना ही जीवन की सबसे बड़ी क्रांति है, किन्तु भौतिक जगत में मुझे सौरभ कुमार दुबे के नाम से जाना जाता है, कवितायें लिखता हूँ, बचपन की खट्टी मीठी यादों के साथ शब्दों का सफ़र शुरू हुआ जो अबतक निरंतर जारी है, भावना के आँचल में संवेदना की ठंडी हवाओं के बीच शब्दों के पंखों को समेटे से कविता के घोसले में रहना मेरे लिए स्वार्गिक आनंद है, जय विजय पत्रिका वह घरौंदा है जिसने मुझ जैसे चूजे को एक आयाम दिया, लोगों से जुड़ने का, जीवन को और गहराई से समझने का, न केवल साहित्य बल्कि जीवन के हर पहलु पर अपार कोष है जय विजय पत्रिका! मैं एल एल बी का छात्र हूँ, वक्ता हूँ, वाद विवाद प्रतियोगिताओं में स्वयम को परख चुका हूँ, राजनीति विज्ञान की भी पढाई कर रहा हूँ, इसके अतिरिक्त योग पर शोध कर एक "सरल योग दिनचर्या" ई बुक का विमोचन करवा चुका हूँ, साथ ही साथ मेरा ई बुक कविता संग्रह "कांपते अक्षर" भी वर्ष २०१३ में आ चुका है! इसके अतिरिक्त एक शून्य हूँ, शून्य के ही ध्यान में लगा हुआ, रमा हुआ और जीवन के अनुभवों को शब्दों में समेटने का साहस करता मैं... सौरभ कुमार!

3 thoughts on “मन आज फिर डूब गया!!

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    सौरव जी , मन की वेदना को उजागर किया है , मुआफ करना पंजाबी हूँ और सही लफ्ज़ मिल नहीं रहे . फिर भी कहूँगा , आप की इस आयु में ऐसा हो ही जाता है , जरा optimist बनिए , बहारें फिर भी आएँगी .

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छी कविता ! मन की भावनाओं को आपने सच्चाई से प्रकट किया है !

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