हास्य व्यंग्य

कबीर के साथ एक सुबह!!

 

हमारे पुराण कहते हैं कि काशी गये बिना मुक्ति नहीं मिलती। किसे पता कि मरने के बाद बेटा अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित करता है या समय और धन के अभाव में बगल में बहनेवाली नाग नदी को ही मेरी मुक्ति का रास्ता बना देता है। नया ज़माना जो है। फिर भी लोग अंतिम सांस लेने के लिए काशी में डेरा डाले बैेठे रहते हैं। चुनाव के बहाने भूतपूर्व चायवाले से लेकर भावी प्रधानमंत्री तक कई हस्तियाँ इन दिनों काशी में तीर्थ-यात्रा का लाभ ले रही हैं। मैंने सोेचा चलो एक बार इस बहाने काशी-यात्रा कर ली जाए। आम के आम गुठलियों के दाम!

भोर होते ही मैं काशी के कबीर चौराहे पर पहुँचा। आश्चर्य! घोर आश्चर्य !! कबीर चौराहे पर कबीर बाबा से साक्षात मिल गये। उनका एक हाथ कमर पर था और दूसरे हाथ में चिलम थी। एक नवोदित व्यंग्यकार और ‘व्यंग्य की नींव’ का वह मिलन ऐतिहासिक था। ‘राम-राम दद्दा’ अपनी ‘लाईन’ के बुजुर्ग जानकर भारतीय संस्कृति का अनुसरण करते हुए मैंने चरण स्पर्श करने चाहे तो उन्होंने पैर खींच लिए और खामोश  रहे। कुछ डरे-डरे से। मैंने दोहराया-‘बाबा राम-राम। सुबह-सुबह मौन व्रत रखा है क्या? दादा, जुहार का जबाव तो दो।’ उन्होंने मुझे डाँट दिया-‘चुप रह मूर्ख। ये पता होना चाहिए कि ‘कबीर बहुरिया राम की’। बेटा, अपने देश में बहुरिया, पति का नाम नहीं लेतीं।’
अब मै खामोश हो गया। बनारस जैसे सांस्कृतिक नगर में इतना असांस्कृतिक कृत्य मुझ मूढ़ से हो गया। लानत है मेरी शिक्षा पर! विषय बदलने के लिए अगला प्रश्न पूछ लिया-‘अच्छा बाबा! एक बात बताइए। आजकल बिजनेस कैसा चल रहा है?’
वे चकराए। माथे पर ज़ोर देकर पूछा-‘बिजनेस? कैसा बिजनेस? उ का होत है बिटवा?’
‘अरे बाबा, वही आपकी खटर-पटर? आजकल चदरिया नहीं बुनते क्या? या फिर ये चिलम पीने का नया नषा आपको कोई काम करने नहीं देता।’ मैं बोला।
‘अच्छा। कपड़ा बुनने की बात कह रहे हो बेटा। अब कौन इस बूढ़े के हाथ की बनी ‘चदरिया’ ओढ़ता हैं बेटा। सबरी लुगाइयाँ तो कपड़ा उतार-उतार कर घूम रही हैं। दो-चार बनारसी साडि़याँ बना रखी है। सोचा था कि रोड-षो के लिए नेता लोेग अपनी लुगाइयन के संग आयेंगे तो उनको भेंट देने के काम आ जाएगी। पर यहाँ तो एक आया था जिसने कच्ची उमर में ही घरवाली को छोड़ दिया था। एक अधेड़ चेला आया था जो देष-विदेष भटकने के बाद भी अब तक कुँवारा है। उसके बाद उसके ‘रंडुवा’ गुरु के आने की उम्मीद थी, जो दूसरा ब्याह रचाने के चक्कर में है, पर वह अब तक आया नहीं। अब ऐसा कर तू ले जा ये सारी साडि़याँ। तेरी लुगाई के काम आ जाएगी।’ बाबा की पीड़ा मेरे फायदे की थी। सोचा घर लौट कर पत्नी पर रौब जमाऊँगा कि ‘देख तेरे लिए इतनी महँगाई में भी तीन-तीन बनारसी साडि़याँ ले आया।’
मैंने कहा-‘बाबा, बूढ़े हो गये हो। पर अब तक हँसी-ठिठोली और ताना मारने की आदत गई नहीं आपकी?’ बाबा अपना पोपला मुँह खोलकर ज़ोर से हँसे और बोले-‘बेटा, बंदर बूढ़ा हो जाता है, तो कुल्हाटी मारना छोड़ देता है क्या?’
‘अच्छा दद्दा एक बात बताइए। इतने रोड-षो हो गये आपके शहर में। आप किसके साथ हो? कौन-सी पार्टी का समर्थन किया आपने? वैसे तो बड़े संत बने फिरते हो। जिसकी जीप में चो। आपकी जाति के लाखों वोट जो हैं। जो भी जीतेगा। इसी साल गणतंत्र दिवस के पहले आपको ‘भारत-रत्न’ घोशित कर देगा। बताइए ना किसके साथ हो?’ मैें जिदियाया।
‘गदहे जैसी बातें करते हो लल्ला। हम किसी के साथ रोड-षो में क्यों जाएँगे भला? भाई अपना तो षुरु से सिद्धांत रहा है-‘कबीरा खड़ा बाज़ार में लिए लुकाटी हाथ। जो घर फूँके आपुना चले हमारे साथ।। इतने सालों से चिल्ला रहा हूँ पर किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई आज तक इस बूसे करें। भिखमंगे कहीं के। लाखों की भीड़ ले कर आते हैं रोड-षो करने पर मेेरे साथ चलकर घर फँुकवाने के लिए छप्पन इंच का सीना चाहिए जो किसी के पास नहीं है। सबकी अपनी-अपनी डफली और अपना-अपना राग है। मैं तो रोज़ जाता हूँ भोर होते ही गंगा जी का पूजन करने। ये देख कमंडल में गंगाजल भी है। पर गंगा-पूजन का ऐसा भीड़ भरा डिरामा करने की कभी ज़रुरत नहीं पड़ी। इ सब रोड-षो है कि राँड-षो पता नहीं।’ दद्दा अपनी वाली पर आ गये थे।
‘और इ का भारत-रतन, भारत रतन लगा रखी है। हमको मूरख समझते हो?। उ तो जिंदा लोगन को मिलता है या मरे लोगन हो। हम तो अमर हैं। और ऊपर से हिंदू-मुस्लिम दोनों ही को गरियाते रहते हैं। हमसे इ भारत रतन के लिए होनेवाली चापलूसी नहीं बनेगी। समझे?’ वे गुर्राए।
‘अरे बाबा, आप तो नाहक नाराज़ हो गये। भारत-रत्न तो गायक, वादक, कलाकार सबको मिलता है। चुनाव सिर पर रहे तो आजकल सरकार खिलाडि़यों को भी यह सम्मान दे देती हैै। क्या पता इस साल से आपके कारण साहित्यकारों को भी सरकार इस जमात में षामिल कर दें। कल को आपके साथ-साथ अपना भी भला हो सकता है। आखिर हम भी तो आपकी ‘लाईन’ के हैं।’ हें-हें-हें मैं खिसियाया।
‘अरे बचुवा, काहे के साहितकार? हमने तो पहले ही कह रखी है- मसि कागद छुयो नहिं, कलम गहि नहिं हाथ। इ सब हमारी बकबक हमारे चेला लोगन अपनी जोड-तोड़कर हमारे नाम से छपवा दिए हैं। इस चोरी के माल पर भारत रतन मिल जाएगा का?’ वे भड़के।
‘बाबा जी आप भले ही अंगूठा छाप होंगे पर आप पर कितने लोगों को पी.एच.डी और डी.लिट जैसी उपाधि मिल गईं तो क्या आपको भारत रत्न नहीं मिल सकता। और हिन्दुस्तान में वैसे भी इसके पहले अनेक बार मरे हुओं को अमर बनाकर भारत-रत्न दिया जा चुका है। अगर मिलेगा तो मना मत करना। चुपचाप धर लेना। दोनों मिलकर बाँट लेंगे। वरना जि़ंदगी भर आप चदरिया बुनते रह जाओगे मैं कलम घीसते।’ मैंने समझाने की कोषिष की।
बाबा ने मेरी तरफ घूर कर देखा और बोले-‘रे मूर्ख! माया के फेर में खुद पड़ा है और मुझे भी लपेट रहा है। मैं तुझे कोई समोसे-छोले खिलाकर आषीर्वाद बरसानेवाला बाबा दिख रहा हूँ जो लखपति या करोड़पति बना दूँगा। मैं संत हूँ। संत कबीर। गुरु रामानंद जी के चरण स्पर्ष सेे मुझे ज्ञान मिल गया था। तू मुझे रतन-फतन के मोह-माया में बाँधना चाहता है। सुना नहीं- माया महा ठगिनी हम जानी।’
‘हाँ बाबा, सच बात है। पर इस बार आपका षहर पूरे संसार में चर्चा में है। अमेरिका से लेकर यूरोप तक सब तरफ चर्चा है कि इस बार काषी में भारत का प्रधानमंत्री पैदा होेने वाला है। फिर आपकी तो पौ बारह समझो। बस एक बार वो प्रधानमंत्री बन जाए। उसके पास विकास की ऐसी चाबी है कि आपकी पाँचों उँगलियाँ घी में और सिर को। अमेरिका और यूरोप की गोरी-गोरी लौंडियाँ भी आपकी बुनी हुई बनारसी साडि़याँ पहनकर डिस्कों डांस करेंगी। आप अपने को पिछड़ी जाति का बताते हो ना वह भी अपने को पिछड़ी जाति का ही कहता है। सब बड़े नाराज़ हैं उससे। उसकी तो नहीं पता पर आपकी जाति ….? मेरा प्रष्न अधूरा रोक ही वे बिफर पडे़-‘तू फूहड़ पैदा हुआ और फूहड़ ही मरेगा। मैंने कहा है ना कि- जाति न पूछो साधू की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान।।’
अबकी बार मैं षांत न रह सका। फूट पड़ा-‘कौन ज़माने में जी रहे हो बाबा जी? ये हजार साल पहले वाली काषी नहीं है जब रामानंद जी आपको चेता गये थे। ये इंडिया है बाबा इंडिया। अब गुरु दक्षिणा नहीं दी जाती। चेला गुरु को अंगूठा दिखा जाता है। ये आपकी काषी नहीं आज का बनारस है जहाँ पोली में रखिए। ‘ज्ञान’ कम होगा या ना होगा तो भी चलेगा। पर इधर जाति का होना बहुत जरूरी है। ये आपके ज़माने का रुढि़वादी, जातिवादी पिछड़ा देश भारत नहीं, आज का इंडिया है-धर्म निरपेक्ष, जाति निरपेक्ष। यहाँ अब ज्ञान और प्रतिभा की नहीं जाति की आवश्यकता है क्योंकि-यहाँ घोड़ों को नहीं मिलती घास और गधे खाते हैं च्यवनप्राश।
बाबा जी निरुत्तर होकर कहीं विलीन हो गये। शायद उन्हें यह उलटबासी पसंद नहीं आयी थी।

____________शरद सुनेरी

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