फुटाला के तीर

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चलिए, आज आपके सामान्य ज्ञान की जाँच करते हैं। यह बताइए- फुटाला तालाब किसे कहते हैं? -तालाब को। गलत जवाब!! फुटाला तालाब शहर का सबसे धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल है। और इस तरह के स्थल हर छोटे-बडे़ शहर में होते हैं। यहाँ धर्म और संस्कृति के नये-नये कैक्टस पनपते हैं। वास्तव में फुटाला तालाब, उस धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल को कहते हैं, जहाँ प्रेमी-प्रेमिका दीन-दुनिया से बेखबर बाँहों में बाँहें डाले, एक-दूसरे की आँखों के समुन्दर मे डूबे रहते हैं, और आसपास के बूढ़े-बच्चे उन्हें देखते रहते हैं। यहाँ जाने पर सैकड़ों समुन्दर एक साथ मिलते हुए दिखाई देते हैं, इसलिए बाकी लोगो को यहाँ महासागर जैसा लगने लगता है, और अपने डूबने का भय भी!

मेरे शहर में भी एक तालाब है-‘फुटाला तालाब।’ शहर के इतिहास में इसका बड़ा सांस्कृृतिक महत्त्व है। मेरे विद्यालयीन जीवन में यह असफल विद्यार्थियों के लिए मोक्ष प्राप्ति का केन्द्र हुआ करता था। यहाँ कूदकर आत्महत्या करनेवाले असफल विद्यार्थी को इस बात की पूरी गारंटी रहती कि अब उसे परीक्षा जैसे कुकर्म से जन्म-जन्मान्तर तक मुक्ति मिल जाएगी। आजकल आत्महत्या जैसे सांस्कृतिक-कर्म के इच्छुक उम्मीदवार यहाँ पर, संभवतः यह लाभ लेने से वंचित रह जाते है। जिसका कारण हमारे शहर के पुलिसवालों का कर्तव्यबोध है। किंतु विगत वर्षों में जबसे इसका सौंदर्यीकरण हुआ है, यह बात साफ नज़र आती है कि इसका धार्मिक महत्व भी बढ़ा है।

यह तालाब सर्वधर्म समभाव का आदर्श उदाहरण है। जो पुण्य मुसलमानों को काबा और हिन्दुओं को काशी, सौ बार जाने पर भी नहीं मिलता, वह यहाँ मात्र एक बार आने से मिल जाता है। ऐसा मैं नहीं कहता, कुरआन और वेदों में लिखा है। जींस और छोटे-छोटे कपड़ों में राधाएँ, जब अपने-अपने कृष्ण के साथ दिखती हैं तो सच मानिए यमुना का तट सजीव हो जाता है। आधुनिकतम परिधानों में आलिंगनबद्ध ‘राधा-कृष्ण’ यत्र-तत्र-सर्वत्र दृष्टिगोचर होते है। उन्हें इस रूप में देखकर वहाँ उपस्थित तीर्थयात्रियों का और बूढ़े-बच्चों का इहलोक और परलोक दोनों सँवर जाता है। उन्हें लगता है, प्रभु भले ही जींस और पेण्ट और कम कपड़ेवाली राधा के साथ मिले, पर मिले तो सही!

जैसा कि प्रायः होता है यहाँ भी बजरंगबली का मंदिर और उद्यान है। इससे यहाँ का धार्मिक प्रभाव और बढ़ जाता है. कोई मुझसे हिन्दी में बात करता तो मैं अंग्रेजी में। बचपन से एक कहावत मेरी समझ नहीं आती थी। कहावत है-एक गंदी मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। पर उस दिन जब मैं अपने पाँच वर्षीय बेटे के साथ इस तीर्थ का भ्रमण करने गया तो सहज ही बोध हो गया। उसने एक ओर एक उंगली से इशारा कर पूछा-”पापा, वो भैया, दीदी के साथ इतना चिपककर क्या कर रहे हैं?“

मैंने उसे समझाने की कोशिश की-”बेटा, वह मछली फाँस रहा है।“

उसने मुझे फिर समझाया-”पर पापा, मछली तो वो वाले अंकल पकड़ रहे है। देखिए वो उनके हाथों में छड़ी भी है।“

मैंने कहा-”हाँ बेटा!मछली अंकल भी फाँस रहे हैं, और भैया भी। बस थोड़ा सा अंतर है-एक पानी के भीतर फाँस रहा है, दूसरा पानी के बाहर की।“

शहर का यह तालाब-फुटाला तालाब-हमारी संस्कृति की धरोहर है! दुष्यंत जी की पंक्तियाँ याद आ रही है-

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कमल के फूल मुरझाने लगे हैं।