कविता

****पाखंड का नाश करें****

आओ पाखंड का नाश करें जड़ से इसे विनाश करें भवजल में फंसे हुए साथी जो आगे बढ़ ना पाये हैं उन्होंने कपोल कल्पना के भगवान सदा बिठाये हैं हर ठौर ठौर पर कोई इंसान  लूट रहा है भक्ति को चुरा रहा सामर्थ्य हमारा ह्रदय विराजित शक्ति को धर्मपथ धुंधलाता जाता आओ इसे प्रकाश करें […]

सामाजिक

यौन शिक्षा कलंक है

यौन शिक्षा पर इधर कई दिनों से टी बी चैनलों पर बहस चल रही है जिसमें कई संभ्रांत महिलाएं भी यौन शिक्षा के पक्ष में अपने तर्क देते हुए देखी जाती हैं। प्रश्न यह उठता  है कि अनादि काल से भारत में रहने वाले लोग जो चार पुरुषार्थों की कामना करते  आये हैं जिसमें से […]

कविता

कविता 2

कविता केवल शब्दों का कुञ्ज नहीं है क्रांति का पुंज है भ्रान्ति का अंत है शांति फिर अनंत है कविता केवल शब्दों का कुञ्ज नहीं है!ये प्राणो की भाषा है हर मन की जिज्ञासा है आशा है अभिलाषा है कविता केवल शब्दों का कुञ्ज नहीं है!शब्दों का भंडार  कुरीतियों पर वार कविता की रीत हो सत्य की जीत मन से मन का […]

कविता

कविता 1

मन का घट भावना का जल शब्द समूह हो उठा जब विकल तब कविता गूंजी बजे कर्तलध्वनि चहुंओर फैली अविरल सूरज की कविता है प्रकाश जल की कविता केवल प्यासवन की कविता है अंधकार बागों की कविता है विहार पुष्पों की कविता है सुगंध वायु की कविता मंद मंद ये मन कविता ये तन कविता शब्दकोश का जीवन कविता […]

कविता

निर्वात

सुनो !!तुम्हारी अनुपस्थिति को मैंने महसूस किया बिल्कुल इस तरह जैसे मेरा जीवन “निर्वात” हो,.. कभी कहीं पढ़ा था जब अंतरिक्ष (स्पेस) के किसी आयतन में कोई पदार्थ नहीं होता तो कहा जाता है कि वह आयतन “निर्वात” (वैक्युम) है। निर्वात की स्थिति में गैसीय दाब, वायुमण्डलीय दाब की तुलना में बहुत कम होता है। जैसे तुम्हारे […]

उपन्यास अंश

उपन्यास : शान्तिदूत (तीसरी कड़ी)

विराट नगर में अपने कक्ष में लेटे हुए कृष्ण की विचार श्रृंखला आगे बढ़ी। जब राजमाता सत्यवती ने समझ लिया कि उनको भीष्म की ओर से कोई उत्तराधिकारी मिलने वाला नहीं है, तो उन्हें प्राचीन नियोग प्रथा का स्मरण हुआ। यह प्रथा असाधारण संकट काल में संतानोत्पत्ति के लिए प्रयोग की जाती थी और अब […]

लघुकथा

पुण्यात्मा

उसने पहले दिन ही बता दिया था अपनी सौतेली माँ को कि ये शादी बाप ने ऐय्याशी के लिए की है, उनके बच्चे पूर्णतः बालिग़ हैं और अपना ख्याल रख सकते हैं। धनेसर वाकई सठिया गया था , बेटी का वर ढूंढते-ढूंढते अपने लिए बीवी ढूंढ लाया। बीवी एकदम उम्र में कच्ची, बीस-इक्कीस से ज्यादा […]

कविता

इतिहास के बेदखल पन्ने

मेरी कुछ पुरानी किताबें सन्दर्भ विहीन निर्वासित हो चुके हैं .. उन्हें कभी नहीं झांकना है , कहकर मोटे गत्तों के डब्बे में डाला था मगर इनके पैर निकल आते हैं बाहर अँधेरी कोठरी के फर्श पर पटकते हैं ये माथा सैकड़ों अदृश्य पृष्ठ फरफराने लगते हैं मैं चुपके से झांकता हूँ अन्दर इतिहास के […]

कविता

संवेदना

गहरे सिंधु सा गहराता जीवन मन की नौका खाए हिलोरभावुकता की भीषण लहरों में दिखता नहीं आशा का छोर पथ पर जिसने देखें हैं फूल कैसे जाने क्या होते शूल रंग उड़ गया जिसके जीवन का  उसके हाथों रह जाती धूल सब संवेदना मेरे मन की रह गयी वेदना इस जीवन की कपोल कल्पना झूठी थी सब सुधि न रही […]

कविता

मन की कविता

क्या कहें कभी लहरें जैसे उमड़ती हैं सागर में कभी बादल जैसे बिखरते हैं अम्बर में ऐसे ही कोई सैलाब सा उठता है विचारो का मन में कभी आंधी कभी तूफ़ान से शब्द फूट पड़ते हैं कभी विचारो के घट यकायक टूट पड़ते हैं मन तो मन है मन का क्या है इसकी अपनी उलझन […]