कहानी : दोस्ती

रुकसाना और हेमा दोनों बहुत अच्छी दोस्त थी | दोनों की उम्र ही क्या थी, रुकसाना,दस साल की ,हेमा आठ साल की,पर दोनों मे गहरी दोस्ती थी | पिछले दो साल से, रुखसाना हेमा को ‘ईद, पर सेवइया खिलाती रही है | आज हेमा के घर पर ‘सत्यनारायण भगवान ‘ की कथा रखवाई है | सब को बुलाया गया है | हेमा ने रुकसाना को कहा ”कल हमारे घर सत्यनारायण भगवान की कथा है तुम, जरुर आना |’

दोनों बच्चिया मासूम ,धर्म के बारे मे क्या जाने | उनको धर्म की परिभाषा भी पता नहीं थी | हिन्दू -मुसलमान का धर्म भे, वो क्या जाने | दोनों धर्मो मे कोई भेद नहीं है | दोनों  धर्म मे बल्कि दुनिया के तमाम धर्मो मे ,इंसानियत, का ही पाठ पढाया जाता है | इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है | प्रेम,भाईचारा और सम- भाव से जीना ही धर्म का मूल मन्त्र है |

हेमा के घर मे कथा की तमाम तैयारिया लगभग पूर्ण हो चुकी थी | पंडित जी आसन पर विराज मान हो गये | सभी आगन्तुक अपने- अपने आसन पर बैठ गये थे | हेमा भी बैठ गयी मम्मी के पास,पर उसका पूरा ध्यान ,दरवाजे की और था | रुकसाना अभी तक नहीं आयी थी |

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पंडित जी ने कथा आरम्भ कर दी | हेमा का ध्यान कथा मे नहीं ,ये देख कर उसकी ममी ने कहा, ”वो नहीं आएगी , तुम कथा मे ध्यान दो | हेमा चुप-चाप बैठ गयी | सोचने लगी कहा, तो भी रुकसाना अभी तक क्यों नहीं आयी |’

तभी पंडित जी ने कथा की पूर्णाहुति की घोषणा की | और कहा, ”सब लोग प्रसाद लेकर ही घर जाये , प्रसाद नहीं लेने से भगवान का अपमान होता है | हेमा ने एक प्लेट मे प्रसाद लिया और दरवाजे की तरफ जाने लगी | उसकी दादी ने उसे रोक कर कहा ”कहाँ जा रही है ?’

‘रुकसाना को प्रसाद देने जा रही हूँ |’ हेमा ने कहा |

‘नहीं जाना है प्रसाद देने,वो मुस्लिम है, भगवान नाराज हो जायेंगे |’

हेमा सोच मे पड गयी, कि पंडित जी ने कहा,वो सही है, या दादी कह रही है वो सही है | उसने तय किया कि वो रुकसाना को प्रसाद जरुर से देकर आएगी |

हेमा ने दादी से छुप कर रुकसाना को प्रसाद खिलाया और वो इंतजार करने लगी कि देखती हूँ ,भगवान्  क्या करते है | रुकसाना मुझे सेवइया खिलाती है तब तो भगवान नाराज नहीं होते | बाल मन मे फिर शंका उभरी | दस दिन हो गये कुछ नहीं हुआ | हेमा ने सोचा, दादी कुछ नहीं जानती है | भगवान कुछ बुरा नहीं करते है | हमारी दोस्ती ही भगवान् को अच्छी लगी है, तभी कुछ बुरा नहीं हुआ है |

परिचय - शान्ति पुरोहित

निज आनंद के लिए लिखती हूँ जो भी शब्द गढ़ लेती हूँ कागज पर उतार कर आपके समक्ष रख देती हूँ