ग़ज़ल : प्यार की आस

बदले मौसम की तरह चल दिया वो किसी और की तलाश में

करता था दावा खुश्बू की तरह बसने की जो हर एक सांस मे

पहले कभी काली स्याह रात कटती थी बात बात में
अब कटती नहीं रातें बैठी रहती उस बेवफा की आस में

जो नहीं आता क्यूँ उसी का इंतजार करता है ये दिल
काश वो भी महसूस करता मेरे अहसास को अपने अहसास में

करती हूँ लाख कोशिश सोने की जब मै रातों को
ख़्वाबों में आकर हर रोज आंसू दे जाता है आँख मे

या तो अपना बना ले या बैगाना कर दे मेरे सनम
“गुंजन” तो बस जी रही हैं तेरे प्यार की आस में ।