मन वृंदावन मेँ छूट गया।।

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मतवाला बनकर चलने वाला अपनी मनमानी करता था।
रमने वाला जो विषयोँ मेँ, सुख की खीँचातानी करता था।।
कभी एक हो नहीँ बैठता अपनी शाखाएँ फैलाया करता था।
मन तो आखिर मन है समझ मिठाई, चूना खाया करता था।।
बडा नटखट था ,चंचल था, बडी चपलता करता था।
पास न संयम, न संकोच और नही सरलता धरता था।।
भरा पाप का घट था जैसे श्री चरणोँ मेँ फूट गया।
तन हो आया मंदिर पर ,मन वृंदावन मेँ छूट गया।।

राधे राधे लगा है गाने हरे कृष्ण अब जपता है।
जाने कैसी करे तपस्या जाने किस आग मेँ तपता है।।
माधव तेरी मूरत आँखोँ से कभी ना जाती है।
हाय कैसे कहूँ विरह की घडी सही ना जाती है।।
पत्थर हृदय था मेरा द्वारे तेरे आते ही टूट गया।
तन तो हो आया मंदिर पर मन वृंदावन मेँ छूट गया।।

____सौरभ कुमार दुबे

परिचय - सौरभ कुमार दुबे

मैं, स्वयं का परिचय कैसे दूँ? संसार में स्वयं को जान लेना ही जीवन की सबसे बड़ी क्रांति है, किन्तु भौतिक जगत में मुझे सौरभ कुमार दुबे के नाम से जाना जाता है, कवितायें लिखता हूँ, बचपन की खट्टी मीठी यादों के साथ शब्दों का सफ़र शुरू हुआ जो अबतक निरंतर जारी है, भावना के आँचल में संवेदना की ठंडी हवाओं के बीच शब्दों के पंखों को समेटे से कविता के घोसले में रहना मेरे लिए स्वार्गिक आनंद है, जय विजय पत्रिका वह घरौंदा है जिसने मुझ जैसे चूजे को एक आयाम दिया, लोगों से जुड़ने का, जीवन को और गहराई से समझने का, न केवल साहित्य बल्कि जीवन के हर पहलु पर अपार कोष है जय विजय पत्रिका! मैं एल एल बी का छात्र हूँ, वक्ता हूँ, वाद विवाद प्रतियोगिताओं में स्वयम को परख चुका हूँ, राजनीति विज्ञान की भी पढाई कर रहा हूँ, इसके अतिरिक्त योग पर शोध कर एक "सरल योग दिनचर्या" ई बुक का विमोचन करवा चुका हूँ, साथ ही साथ मेरा ई बुक कविता संग्रह "कांपते अक्षर" भी वर्ष २०१३ में आ चुका है! इसके अतिरिक्त एक शून्य हूँ, शून्य के ही ध्यान में लगा हुआ, रमा हुआ और जीवन के अनुभवों को शब्दों में समेटने का साहस करता मैं... सौरभ कुमार! कविता मेरा जीवन सार मेरी भावना का विस्तार छंद छंद में नयी कल्पना नयी क्रांति हेतु उदगार