Monthly Archives: August 2014

  • ॥ स्त्री और समुद्र॥

    वह हर शाम आती है अकेली और उदाससुनने मेरा कोलाहलकहने अपने मन की बात हम घंटों बतियाते हैं, पागलों की तरह वह मानती है मुझे अपना दोस्त! उसकी जेब में होता है एक पुराना रूमाल जिससे चिपकी...

  • दो कवितायेँ

    दो कवितायेँ

    १. आश्वासनों के गरजते बादलों की हो रही है बरसात चकोर की भांति निहार निहारकर टूट चुकी है आस भ्रष्टाचार के गंदे नालों के साथ मिलकर बहने लगी है गंगा यमुना और सरस्वती नभ जल थल...



  • आंसूओं की ‘कद्र’

    आंसूओं की ‘कद्र’

    इन आंसूओं की अब इस जमाने में ‘कद्र’ नहीं होती, पर इन आँखों को भी छलके बिना, ‘सब्र’ नहीं होती,    रो रो गुज़र रही है, हर सच्चे इंसान की ज़िन्दगी, क्यों सुख चैन से उसकी...