लघुकथा

गाय के आँसू

गौशाला का कर्मचारी थान के पास बैठी गाय को बड़े प्यार से उठाने लगा| गाय का मालिक उम्मीद भरे कदमो से चलकर कर्मचारी के पास आ गया था| इस अवस्था में अपना घर छोड़ कर गौशाला के कर्मचारी के साथ गौशाला जाने का सोच गाय की आँखों में  टप -टप आँसू टपकने लगे| पर साथ ही ये संतोष भी था कि चलो घर ही से ही निकाल रहा है कसाई को तो नहीं बेच रहा है|  अगर ऐसा करता तो मेरे शारीर के टुकड़े-टुकड़े कर के मुझे कच्चा ही खा जाते मांसाहारी लोग| इंसानो को गाय का मांस कुछ ज्यादा ही पसंद जो है| हर रोज हजारो की संख्या में कटती है गाय पर … इस हैवानियत के युग में किसी से भी कुछ उम्मीद नहीं है|

मालिक के बदले व्यवहार पर हैरानी हो रही थी| एक वक्त था जब इसके घर में फाकाकशी थी| मेरे आने के बाद इसके दिन फिरे|मैंने एक-एक कर चार बछडी जन्म कर इसे दी| यहाँ तक मेरे बच्चो ने भी बछडी- बछडे जन्म के दिए| देखते- ही -देखते ये अमीर हो गया| कच्चा घर पक्के मकान में बदल गया| मेरे ही दूध से इसका व्यापर फल-फूल रहा है| पर इंसान की सोच का क्या …वो तो जन्म देने वाले माता- पिता तक को उनके बुढ़ापे के कारण बोझ समझ कर उनके साथ भी अवांछित वयव्हार कर सकता है तो …मै तो फिर भी अनबोल जानवर ही हूँ उसकी नजर में ; आज मेरी समझ में आया कि इंसान के जितना स्वार्थी तो कोई हो ही नहीं सकता है|

गाय की आँखों से निरंतर आश्रू ढलक रहे थे| थोडा पास जाकर वो अपने मालिक का पैर चाटने लगी| मानो याद दिला रही हो कि तुम तो मुझसे बहुत प्यार करते थे| रोज मेरे भाल पर चंदन का टीका लगते थे|अपने मस्तक पर मेरे खुरो की माटी लगते थे|और मुझे कितना शुभ मानते थे| पर्व पर तो मेरी विशेष पूजा करते थे| कई बार तुम्हे बात करते हुए सुना है कि ” सुरभि गाय, यानि की मैं, मेरे लिए बहुत शुभ है| अंतिम साँस तक इसकी सेवा करूँगा” ये सब सुनकर तो मै बहुत ही गद – गद हो जाया करती थी|

आज मेरी हड्डिया बूढी हो गयी है तो मुझे घर से निकाल फेंक रहा है कैसा स्वार्थी इंसान है| तभी गौशाला के कर्मचारी के हाथ पर मालिक ने कुछ रुपया दान के लिए रखा| शायद मेरे रखने के एवज में दिये| और मुझे आँखों में आँसू लिये,मन में उसके प्रति रोष का भाव लिए अपने नये ठिकाने के लिए निकलना पड़ा|

 

शान्ति पुरोहित

निज आनंद के लिए लिखती हूँ जो भी शब्द गढ़ लेती हूँ कागज पर उतार कर आपके समक्ष रख देती हूँ

2 thoughts on “गाय के आँसू

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    शांति बहन , इस के बारे में मैं यह ही कह सकता हूँ कि इंसान बहुत खुदगर्ज़ हो गिया है . गाए विचारी तो रोएगी ही , इंसान भी जब बूड़े हो जाते हैं तो उनकी कीमत कम हो जाती है . इसी लिए बजुर्ग लोग धक्के खाते फिरते हैं जो बहुत दुख्दाएक है .

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत मार्मिक लघु कथा.

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