गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

तेरी चाह में कुछ कर जाऊं तो अच्छा
यूं तनहा जीने से मर जाऊं तो अच्छा

जब माली ही न रहा इस गुलशन का
टूट शाख से बिखर जाऊं तो अच्छा

प्यार तेरा न पा सका, कोई बात नहीं
तेरी यादों संग ही तर जाऊं तो अच्छा

बदल सकी न जो लकीर इन हाथों की
उस मेहंदी को बिसर जाऊं तो अच्छा

जिस राह से मिल सके न मंज़िल कोई
उसमें खा ठोकर गिर जाऊं तो अच्छा

रास नहीं आ रही है आबोहवा शहर की
लौट फिर से गाँव घर जाऊं तो अच्छा

परिचय - सुधीर मलिक

भाषा अध्यापक, शिक्षा विभाग हरियाणा पिता का नाम :- श्री राजेन्द्र सिंह मलिक माता का नाम :- श्रीमती निर्मला देवी निवास स्थान :- सोनीपत ( हरियाणा ) लेखन विधा - हायकु, मुक्तक, कविता, गीतिका, गज़ल, कहानी समय-समय पर साहित्यिक पत्रिकाओं जैसे - शिक्षा सारथी, समाज कल्याण पत्रिका, युवा सुघोष, आगमन- एक खूबसूरत शुरूआत, ट्रू मीडिया,जय विजय इत्यादि में रचनायें प्रकाशित

4 thoughts on “गीतिका

  1. बहुत अच्छी ग़ज़ल है , बार बार पड़ने को दिल करता है . आगे भी इंतज़ार रहेगा .

    1. आदरणीय गुरमेल सिंह भमरा लंदन जी आपकी स्नेहिल उपस्थिति एवं प्रेरक टिप्पणी करने के लिये हार्दिक धन्यवाद

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