हाँ मुझे दर्द होता है.

हाँ मुझे दर्द होता है.

मैं जब भी खुद से तेरे बारे में कुछ जिक्र करता हूँ

हाँ मुझे दर्द होता है.

हाँ मुझे दर्द होता है मैं जब भी सांस लेता हूँ

हाँ मुझे दर्द होता है.

वो छत भी याद है मुझको, पतंगे उड़ती हुईं

खतों में जब तेरे, मैं खुद को ढूंढता हूँ

हाँ मुझे दर्द होता है.

हाँ मुझे दर्द होता है मैं जब भी सांस लेता हूँ

हाँ मुझे दर्द होता है.

वो तारे देखना और ढूंढना चेहरा तेरा उनमें

वो रातें याद आयें तो

हां मुझे दर्द होता है.

हाँ मुझे दर्द होता है मैं जब भी सांस लेता हूँ

हाँ मुझे दर्द होता है.

तेरा वो तांकना खिड़की से, गली में खोजना मुझको

वो लम्हा गुजरे जब फिरसे

हां मुझे दर्द होता है.

हाँ मुझे दर्द होता है मैं जब भी सांस लेता हूँ

हाँ मुझे दर्द होता है.

सुबह उठना वो जल्दी से, वो सजना संवरना

जब भी तड़प वो उठती है

हाँ मुझे दर्द होता है.

हाँ मुझे दर्द होता है मैं जब भी सांस लेता हूँ

हाँ मुझे दर्द होता है.

हाँ दोस्त भी जुदा होने लगे थे मुझसे उस दौरां

खुदी में फिर से खौऊँ तो हाँ मुझे दर्द होता है.

हाँ मुझे दर्द होता है.

हाँ मुझे दर्द होता है मैं जब भी सांस लेता हूँ

हाँ मुझे दर्द होता है.

To be continued…

 -अश्वनी कुमार

परिचय - अश्वनी कुमार

अश्वनी कुमार, एक युवा लेखक हैं, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत मासिक पत्रिका साधना पथ से की, इसी के साथ आपने दिल्ली के क्राइम ओब्सेर्वर नामक पाक्षिक समाचार पत्र में सहायक सम्पादक के तौर पर कुछ समय के लिए कार्य भी किया. लेखन के क्षेत्र में एक आयाम हासिल करने के इच्छुक हैं और अपनी लेखनी से समाज को बदलता देखने की चाह आँखों में लिए विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सक्रीय रूप से लेखन कर रहे हैं, इसी के साथ एक निजी फ़र्म से कंटेंट राइटर के रूप में कार्य भी कर रहे है. राजनीति और क्राइम से जुडी घटनाओं पर लिखना बेहद पसंद करते हैं. कवितायें और ग़ज़लों का जितना रूचि से अध्ययन करते हैं उतना ही रुचि से लिखते भी हैं, आपकी रचना कई बड़े हिंदी पोर्टलों पर प्रकाशित भी हो चुकी हैं. अपनी ग़ज़लों और कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए एक ब्लॉग भी लिख रहे हैं. जरूर देखें :- samay-antraal.blogspot.com