इतिहास

त्याग व सादगी के प्रतीकः- लाल बहादुर शास्त्री

भारत के लोकप्रिय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। शास्त्री जी की प्रारम्भिक शिक्षा वाराणसी के हरिश्चंद्र स्कूल में हुई साथ ही उनका प्रारम्भिक जीवन बेहद कठिनाईयों में बीता । 1921 में जब गांधीजी ने देश के युवकों के सहयोग से आंदोलन मे भाग लेने का आहावन किया। तब शास्त्री जी आयु मात्र 16 वर्ष की थी। देश की पुकार सुनकर उन्होने पढ़ाई छोड़ दी और असहयोग आंदोलन में शामिल हो गये तथा अंग्रेज सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिये गये। कुछ समय जेल में रहने के बाद जब वें रिहा हुए तब उन्होनें काशी विद्यापीठ मे प्रवेश लिया जहां आचार्य नरेंद्रदेव तथा डा. भगवान दास के विचारोंके प्रभावो में आये। वे एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी थे अतः शीघ्र ही शास्त्रीष्की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।

1925 में लालालाजपत राय के सम्पर्क में आने के बाद वे 1926 में पीपुल सोसाइटी के सदस्य बने। इसके बाद इलाहाबाद आकर बसने पर उनकी राजनैतिक यात्रा प्रारम्भ हुई।1935 में जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें उप्र कांग्रेस कमेटी का जनरल सेक्रेटरी बनाया। 1937 में उप्र विधानमंडल के सदस्स चुने गये और 1946 में वे देश की स्वतंत्रता के लिए वे पुनः जेल गये। उन्होनें अपने जीवन के के कुल नौ वर्ष जेल में बिताये। जेल मे रहने के समय का लाभ उठाकर उन्हानें कई किताबें लिखी। जिसमें मैडम क्यूरी की जीवनकथा सबसे प्रसिद्ध है।

उप्र के मुख्यमंत्री गोविंदवल्लभ पंत ने उन्हें गृह तथा परिवहन मंत्रालय का भार सौंपा। 1951 में जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें कांग्रेस महासचिव नियुक्त किया। 1951 में शास्त्री जी लोकसभा पहंुचे। वे पहले परिवहन तथा यातायात मंत्री नियुक्त किये गये। कुछ समय बाद उन्हें व्यापार तथा उद्योग मंत्री नियुक्त किया गया। 4 अप्रैल 1961 को देश के गृहमंत्री बने। 1963 में उन्हें नेंपाल की सद्भावना यात्रा में भेजागया क्योंकि वहां पर भारत नेपाल मैत्री को लेकर कई भ्रातियां पैदा हो गयी थी। नेहरू जी की अस्वस्थता के चलते उन्हें पुन: बिना विभाग का मंत्री नियुक्त किया गया। नेहरू जी के स्वर्गवास के बाद कांग्रेस संसदीय दल ने उन्हें अपना नेता चुन लिया। नौ जून 19864 को भारत के प्रधानमंत्री बने।

प्रधानमंत्री बनने के बाद उनको कई समस्याओं से जूझना पड़ा। महंगाई और खाद्य संकट के चलते उन्हें कई निर्णय लेने पड़े। उनका सबसे महत्वपूर्ण निर्णय शेख अब्दुल्ला को विदेश भेजने का रहा जहां अब्दुल्ला ने भारत विरोधी भाषण दिये। स्वदेश वापस लौटने पर शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया गया। प्रधानमंत्री के पद पर उन्होनें कई महत्वपूर्ण विदेश यात्रायें भी कीं। उन्होनें अपनी सादगी, अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के ज्ञान, सत्यता, मैत्रीभाव तथा दूरदर्शिता से विदेशी नेताओं को प्रभावित किया। उनके कार्यकाल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना 1965 में पाकिस्तान द्वारा कच्छ की सीमाओं पर हमले की रही। भारतीय सेना की कमी का लाभ उठाकर पाक सेना ने 10 अप्रैल 1965 को कंजरकोट और सरदार पोस्ट पर कब्जा कर लिया।

इस प्रकरण में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विल्सन के प्रयत्नों से कच्छ समझौता हुआ। अगस्त 1965 में पाक ने कश्मीर में घुसपैठिये भेजे तथा सितम्बर 1965 में कश्मीर में हमला बोल दिया। भारतीय सेनाओं व सरकार ने आक्रमण का जमकर मुकाबला किया। इसी बीच पाक ने अमृतसर पर हमला बोल दिया। भारत व पाकिस्तान के मध्य घमासान युद्ध छिड़ गया। भारतीय सेनाओं की बहादुरी के चलते पाकिस्तानी घमंड चकनाचूर हो गया। उस समय चीन ने भी धमकी दी किन्तु शास्त्री जी ने बिलकुल ध्यान नहीं दिया भारकत विजयी हुआ तथा शास्त्री जी की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुयी। संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रयत्नों के चलते युद्ध बंद हो गया लेकिन तनाव बरकार रहा।

भारत- पाक के मध्य सम्बंधों को सामान्य बनाने के उददेश्य से तत्कालीन रूस के प्रधानमंत्री कोसिविन ने भारत और पाक को आमंत्रित किया । जनवरी 1966 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर ष्शास्त्री तथा पाक के राष्ट्रपति अयूब खां के मध्य ताशंकद समझौता हुआ। इस समझौते से उन्हें मन ही मन बहुत ही पीड़ा हुई और 11 जनवरी 1966 को प्रातःकाल ह्नदयाघात से निधन हो गया। उनके निधन का समाचार फैलते ही पूरे भारत ही नहीं अपितु विश्व में शोक छा गया। लाल बहादुरष्शास्त्री एक दृढ़ प्रतिज्ञ राष्ट्रवादी थे और ताशकंद में भारत तथा पाकिस्तान का विवाद समाप्त करने के बाद तथा अपनी अपमानजनक परिस्थितियों के चलते उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। एक प्रकार से उन्होनें देश के स्वाभिमान के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

2 thoughts on “त्याग व सादगी के प्रतीकः- लाल बहादुर शास्त्री

  1. लाल बहादुर शास्त्री जी के जीवन पर रौशनी डाली जो बहुत अच्छा लगा , साथ ही उनके जनम दिन पर उस को शर्धान्जली अर्पण करते हैं .

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