लघुकथा

जलती हुई मोमबत्ती

शरीर जल (ख़त्म हो) रहा हैलेकिन आत्मा तो अमर है | मोमबत्ती की तरह मैं भले काल कवलित हो गया हूँपर इस लौ की भांति तुम सब की आत्माओं में बसा हूँ |” जब सरकारी स्कूल में गाँधी जयंती पर हिंदी के प्राध्यापक महोदय ने मोमबत्ती की ओर इशारा करके कहा तो रूचि भयभीत हो गयी |
दादी से आत्माओं की कहानी खूब सुन रखी थी उसने | दादी ने कहा था अच्छी आत्मायेंबुरी आत्माओं को खूब सताती है | उसे लगा सत्यअहिंसा के पुजारी बापू आज उसकी खूब खबर लेंगे | कक्षा क्यापूरे स्कूल की दादा जो थी वह | सुबह प्रार्थना से पहले ही उसने अपनी दोनों सहपाठियों की पिटाई भी कर दी थीछोटी-बड़ी मोमबत्ती के लेने को लेकर | बच्चों से मारपीट-गाली गलौज के बादशिक्षक से मार खाना तो रोज की आदत-सी थी उसकी |
सहसा उसने बापू के चित्र की ओर देखा – बापू के चित्र पर लौ चमक रही थीबापू की आँखे भी बंद थी | उसे लगा बापू बच्चों में बसी अच्छी आत्माओं से सम्पर्क करउन सब को अपनी तरह बनने की सीख दे रहे हैं |
अगले ही पल वह अपने सहपाठियों से क्षमा मांगउनके गले लग गयी | उसकी इस अप्रत्यासित हरकत से उनकी आँखों में आँसू आ गये जिनसे रोज ही लड़ती थी वह | और कुछ छात्राएं हतप्रभ-सी थी – ‘कौवे को हंस रूप में देख‘ |
प्रधानाचार्य महोदय भी ख़ुश होकर बोले – “ आज भले ही लोग सफाई कर ख्याति अर्जित कर रहे हैंपर असली सफाई तो तुमने की है |आज हमारे स्कूल द्वारा दिया जाने वाला ‘गांधी सम्मान‘ मैं सर्वसम्मति से तुम्हें सौंपता हूँ |”

सविता मिश्रा ‘अक्षजा
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*सविता मिश्रा

श्रीमती हीरा देवी और पिता श्री शेषमणि तिवारी की चार बेटो में अकेली बिटिया हैं हम | पिता की पुलिस की नौकरी के कारन बंजारों की तरह भटकना पड़ा | अंत में इलाहाबाद में स्थायी निवास बना | अब वर्तमान में आगरा में अपना पड़ाव हैं क्योकि पति देवेन्द्र नाथ मिश्र भी उसी विभाग से सम्बध्द हैं | हम साधारण गृहणी हैं जो मन में भाव घुमड़ते है उन्हें कलम बद्द्ध कर लेते है| क्योकि वह विचार जब तक बोले, लिखे ना दिमाग में उथलपुथल मचाते रहते हैं | बस कह लीजिये लिखना हमारा शौक है| जहाँ तक याद है कक्षा ६-७ से लिखना आरम्भ हुआ ...पर शादी के बाद पति के कहने पर सारे ढूढ कर एक डायरी में लिखे | बीच में दस साल लगभग लिखना छोड़ भी दिए थे क्योकि बच्चे और पति में ही समय खो सा गया था | पहली कविता पति जहाँ नौकरी करते थे वहीं की पत्रिका में छपी| छपने पर लगा सच में कलम चलती है तो थोड़ा और लिखने के प्रति सचेत हो गये थे| दूबारा लेखनी पकड़ने में सबसे बड़ा योगदान फेसबुक का हैं| फिर यहाँ कई पत्रिका -बेब पत्रिका अंजुम, करुणावती, युवा सुघोष, इण्डिया हेल्पलाइन, मनमीत, रचनाकार और अवधि समाचार में छपा....|

One thought on “जलती हुई मोमबत्ती

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छी लघुकथा.

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