ज़िंदगी

                                                                            कैसे-कैसे रूप, हमें दिखाती है ज़िंदगी ,
कभी छाव कभी धूप, बन जाती है ज़िंदगी |
    देती है कभी घाव ऐसा, जो भर पाए न उम्र भर ,
   और मरहम कभी घाव पे,  लगाती है ज़िंदगी |
 खुशियों से कभी, दामन भर दे इंसान का ,
और कभी खून के, आंसू रुलाती है ज़िंदगी |
 सच्चाई की राह, बहुत कठिन है मेरे दोस्त ,
         कांटों की नोक पे, चलवा के आज़माती है ज़िंदगी |
 मुश्किलों का दौर, जब इंसान पे आये ,
    नंगे पांव कड़कती धूप में चलवाती है ज़िंदगी |
समय कभी एक सा, रहता नहीं इंसान पे ,
    कभी हमें, हंसाती और कभी रुलाती है ज़िंदगी |
 जब तक समझ पाएं, ज़िंदगी की अहमियत ,
  पकड़ में न आने पाये, गुज़र जाती है ज़िंदगी |