कविता

पुरुष प्रधान समाज में पतियों की मानसिकता

नोट: इसमें समुचित ग्राफिक्स आपने डालने होंगे,

मैं पति हूं ना!
अपने आप गधा कह लूंगा, किन्तु तुम्हें घोड़ा कहना है।
मैं चाहे जितना भी बोलूं, किन्तु तुम्हें थोड़ा कहना है।।
खेल समझ मैं जो भी खेलूं, तुम्हें मूक दर्शक रहना है।
लाभ हानि कुछ भी हो जाये, तुमने अच्छा ही कहना है।।

अपने आप गधा कह लूंगा, किन्तु तुम्हें घोड़ा कहना है।
मैं चाहे जितना भी बोलूं, किन्तु तुम्हें थोड़ा कहना है।।
खेल समझ मैं जो भी खेलूं, तुम्हें मूक दर्षक रहना है।
लाभ हानि कुछ भी हो जाये, तुमने अच्छा ही कहना है।।

जब भी चाहूं सोऊं जागूं, सेवा बस तुमने करना है।
जब भी चाहूं मारूं पीटूं, वाह चाह ही बस करना है।।
मेरे हाथों की कठपुतली, बनकर ही तुमको जीना है।
हाला भी बस मेरे ही संग, जब भी मैं चाहूु पीना है।।

बिन दहेज के आई हो, तो बिन पानी ही रहना होगा।
मेरी माँ जितने भी मारे, तुमको तो बस सहना होगा।।
बंगला गाड़ी भी लाई हो, तो इसमें इतराना कैसर।
मेरे लिये अभी भी काफी, है मेरे सालों का पैसा।।

मैं तुमसे जब भी कुछ पूछूं, कभी नहीं कहना मत ना जी।
मेरी सारी बातों पर तुम, सदा कहोगी हां-जी हां-जी।।
मैं चाहे दस-दस से खेलूं, तुमने पतिव्रत ही रहना है।
साली को घरवाली कर लूं, मूँदे आँख् तुम्हें रहना है।।

मैं तुमसे बोलूं ना बोलूँ, तुमने मुझे रिझाना ही है।
आलस मै जितना भी कर लूं, तुमको खटते जाना ही है।।
कागज-कपड़े जैसे फेंकूँ, तुमको उन्हें उठाना ही है।
जो भी चाहे जहों फेंक दूं, घर को तुम्हें सजाना ही है।।

मैं चाहे जितना भी खा लूं, तुम्हें सदा थोड़ा खाना है।
मेरे हलवा और पूड़ी को सदा बचा कर ही रखना है।।
मैं दिन रात जुआ भी खेलूं, यह मेरा अधिकार सिद्ध है।
तुम पिक्चर जाने की सोचो, यह तो बिलकुल ही निषिद्ध है।।

बच्चे तो बच्चे होते हैं, बच्चों की तुम दो ना दुहाई।
दाल भात स्कूल फीस में, मुझसे करो ना तुम चतुराई।।
जितना चाहूं जिसे लुटा दूं, तुमको इससे मतलब कैसा।
तुमको जब भी पडऋे जरूरत, मिल ही जाता है ना पैसा।।

नम्बर अच्छे आये हैं, तो मत मारो ऐसे किलकारी।
मर्द रहूंगा फिर भी आखिर, सदा रहूंगा तुम पर भारी।।
चूल्हा चक्की ही करना है, फिर काहे की मारा मारी।
पढ़ तुम क्या कर लोगी बोलो, पा लोगी क्या बंगला गाड़ी।।

मैं तो हूं सर्वज्ञ गियानी, केवल तुम ही हो अज्ञानी।
कहता रहता हूं मैं अक्सर, तुमने मेरी बात ना मानी।।
कह गये तुलसी संत महात्मा, नारी समझाना नादानी।
नारी सदा सुखी रहती है, करने देती जब मनमानी।।

कन्या जनम लिया है तुमने, पत्नी बन है सेवा करना।
माँ बन जाने पर भी तुमको, पुरुष अधीन सदा है रहना।।
कितने ही कानून बन गये, क्या आया है उनसे अन्तर।
मुझको ही भगवान समझ लों, समझा दूंगा सारा मन्तर।।

अपने आप गधा कह लूंगा, किन्तु तुम्हें घोड़ा कहना है।
किन्तु तुम्हें घोड़ा कहना है, किन्तु तुम्हें घोड़ा कहना है।।

3 thoughts on “पुरुष प्रधान समाज में पतियों की मानसिकता

  • कन्या जनम लिया है तुमने, पत्नी बन है सेवा करना।
    माँ बन जाने पर भी तुमको, पुरुष अधीन सदा है रहना।।
    कितने ही कानून बन गये, क्या आया है उनसे अन्तर।
    मुझको ही भगवान समझ लों, समझा दूंगा सारा मन्तर।।

    अपने आप गधा कह लूंगा, किन्तु तुम्हें घोड़ा कहना है।
    किन्तु तुम्हें घोड़ा कहना है, किन्तु तुम्हें घोड़ा कहना है।। sahi kahaa aapne …achchi rachna wah

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    बुरे और नीची सोच वाले पुरषों के मुंह पर करारा तमाचा है. तभी तो अब इस्त्रिआन भी रीबैलियन करने लगीं हैं .

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छी और करारी कविता. ऐसे पुरुषों की मानसिकता को आपने बहुत खूबसूरती से बयान किया है. चित्रों के बिना भी कविता बहुत प्रभावशाली है.

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