कहानी : लौट आओ दिशा !

“प्रभात….. प्रभात………….”
माँ की आवाज तेज होती जा रही थी और प्रभात के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही थी। आज इस लड़के से बात करके रहूंगी, पता नहीं क्या समझता है अपने आप को । इधर प्रभात अपने स्मार्टफोन पर चिपका, सुन तो सब रहा है लेकिन ऊँची आवाज तो उसे बिल्कुल ही नागवार गुजरती है।
“प्रभात ! तू अब मुझे जवाब देना भी मुफीद नहीं समझता ?”
“अरे माँ ! थोड़ा काम में व्यस्त था, और जवाब देता हूँ तो कहती हो कि माँ को जवाब देता हूँ ।” माँ को प्रभात के चेहरे पर चिरपरिचित बेफिक्री दिखाई दे रही थी ।
“प्रभात इनमें से कोई लड़की पसन्द कर लो ।” माँ कुछ तस्वीरें प्रभात के सामने पटक देती है ।
“देखो माँ तुम मुझे बाँधने की कोशिश मत करो. मैं बँधना नहीं चाहता, मैं जीना चाहता हूँ ।”
“हर चीज़ का एक कायदा होता है ,” माँ का स्वर तेज़ हो जाता है , “प्रभात! जीवन में अनुशासन और आत्मनियन्त्रण बहुत आवश्यक है, यूँ कटी पतंग की तरह कब तक भटकते रहोगे?”
“जिसे तुम भटकना कहती हो उसे मैं जीना कहता हूँ” और प्रभात उठ कर चला जाता है ।
प्रभात एक नामी कंपनी में एक अच्छे ओहदे पर कार्यरत है,कंपनी के काम से नैनीताल आया है वहीं उसकी मुलाकात दिशा से होती है, दिशा अपने बच्चों के साथ छुट्टियों में आई हुई है दोनों एक ही होटल में ठहरे हुऐ हैं दिशा बेहद खूबसूरत और समझदार है, प्रभात को दिशा की बातें बहुत अच्छी लगती हैं ।बातें क्या पूरी दिशा ही बहुत अच्छी लगती है । कुछ दिनों बाद दिशा वापस मथुरा लौट जाती है, प्रभात जाते जाते उसका नंबर ले ही लेता है ,और प्रभात भी काम खत्म करके घर वापस आगरा आ जाता है ,लेकिन इस बार वह अकेला नहीं आया है, इस बार प्रभात के साथ दिशा आई है उसके दिमाग में !
प्रभात किसी न किसी बहाने दिशा को फोन करता रहता है और दिशा की रूचि भी प्रभात में बढने लगती है धीरे धीरे प्रभात को पता चलता है कि दिशा अपनी शादी से खुश नहीं है अचानक एक दिन दिशा की बेटी का फोन प्रभात के पास आता है कि अंकल मम्मी हास्पिटल में है बहुत बीमार है आप आ जाओ ।
प्रभात भागता है …… आखिर दिशा ने सुसाइड की कोशिश की थी ??
प्रभात का अपने से काबू ही खो जाता है “क्यों दिशा ? क्यो ???? तुम इतनी स्वार्थी हो ,तुम्हें अपने बच्चे भी नहीं दिखाई दिऐ ,तुम कैसे कर सकती हो? ”
“हाँ प्रभात मैं कर सकती हूँ, क्यों नहीं कर सकती ? क्यों?? मैं तंग आ गई हूँ सुन सुन के! मैं एक अच्छी बहू नहीं हूँ ? एक अच्छी बीबी नहीं हूँ? और शायद एक अच्छी माँ भी न बन पाऊँ ?? मेरी जिन्दगी के इतने साल बेकार चले गये हैं, जिसका जैसा मन आता है मेरा इस्तेमाल करता है और फेंक देता है! मैंने ऐसी ज़िन्दगी का ख्वाब नहीं देखा था, मैं अब और समझौते नहीं कर सकती” और प्रभात को जाने क्या सूझी! वह दिशा से कह देता है कि वो उससे शादी करेगा वो उसे खुश रखेगा उसे अब वापस अपने पति के पास जाने की जरूरत नहीं है और प्रभात लौट आता है ।
प्रभात के वापस आते ही माँ सख्ती से कह देती है कि वो जो भी कर रहा है उसे उसकी खबर है और वो ऐसा नहीं होने देगी प्रभात गुस्से में बाहर निकल जाता है ।
प्रभात काफी दिनों से दिशा को फोन लगा रहा है लेकिन दिशा का कोई नंबर नहीं लग रहा है आखिर प्रभात मथुरा जाता है ,देखता है दिशा घर खाली कर चुकी है आसपास पूछता है कि शायद कोई मैसेज छोड़ा हो पर दिशा का कोई मैसेज नहीँ है !
प्रभात के पैरों से तो जमीन ही निकल गई मानों वो कहाँ ढूँढे दिशा को!! उसके सारे सपने टूट गए थे, लेकिन हार मानने वालों में प्रभात कहाँ था!!! उसका पागलपन बढ़ता ही जा रहा था । दिशा उससे दूर होती जा रही थी इधर माँ अपनी जिद पर अङी थी परेशान हाल प्रभात ने माँ से कह दिया कि वो जैसा करना चाहे कर ले।
माँ ने मृदुला को पसंद किया था प्रभात के लिए, लेकिन प्रभात अपने होश में ही कहां था? मृदुला उसकी पत्नी बन के घर आ चुकी थी, लेकिन प्रभात दिशा को ही ढूँढ रहा था ।माँ उसके पागलपन से तंग आ चुकी थी और आज प्रभात गुस्से में घर छोड़ कर निकल गया था।
“तुम्हें बहू चाहिए थी; बहू ला दी ; अब रहो बहू के साथ और मुझे छोङ दो ।”
इधर माँ को ये गम बरदाश्त नहीं होता और चल बसती है और उधर मृदुला भी तलाक लेके अपने घर!!!!
आखिर दिशा मिल ही जाती है और साफ साफ कह देती है कि वो किसी की बीबी है वो अपने घर की इज्जत से खिलवाड़ नहीं करेगी ? प्रभात अकेला रह जाता है …………
प्रभात की ज़िन्दगी में अब हर वक्त शराब और सिगरेट दो ही चीजें रह गई हैं । धनंजय कितनी बार उसे कहता है प्रभात ये जहर तुम्हें मार देगा। प्रभात हँसता है….. मरना ही तो चाहता हूँ लेकिन कायर हूँ सोच रहा हूँ ये शराब ही मेरे ऊपर तरस खा जाऐ । धनंजय गुस्से में चला जाता है ।
आज खिङकी पे तेज़ रोशनी है प्रभात की आँख खुलती है देखता है…. मृदुला खङी है सामने!! प्रभात हैरान रह जाता है !!!
मृदुला समझ जाती है, “आप को अटैक आया था ???”
आज काफ़ी दिन बाद….. ….
मृदुला कम बोलने बाली लङकी है अपना काम करती रहती है सुबह आती है काम करके चली जाती है। प्रभात की जरूरतों का ध्यान रखती है फिर शाम को आती है चली जाती है। इसी बीच धनंजय आता है। प्रभात तूने जैसा चाहा किया, लेकिन ज़िन्दगी तेरे सामने खड़ी है। धनंजय का इशारा मृदुला की तरफ है । आज प्रभात को भी लगने लगा है, माँ सही कहती थी…. जीवन में अनुशासन और आत्मनियन्त्रण बहुत जरूरी है !!!!
आज मृदुला जल्दी जल्दी जाने की तैयारी में है।प्रभात कुछ कहना चाहता है मृदुला से, लेकिन मृदुला का ध्यान काम की तरफ है। अक्सर कम बोलने वाला इन्सान व्यस्त और खामोश तो दिखाई देता है लेकिन उसका ध्यान हर छोटी छोटी चीज़ पर होता है और मृदुला भी इस से अलग कहाँ थी।
प्रभात की ज़ुबान पे मृदुला का नाम बार बार आके अटक जाता है आखिर बड़ी हिम्मत करके बोलता है…. वो अपनी गलती सुधारना चाहता है. मृदुला समझ जाती है और इससे पहले कि प्रभात कुछ भी और कहे अपना बैग उठाती है, और तेज़ कदमों से भाग जाती है, पलटती है…….. “कल दस बजे कोर्ट आ जाना !!”

प्रभात पीछा करता है लेकिन लिफ्ट जा चुकी होती है , प्रभात दौड़ कर खिड़की से देखता है और देखता रहता है जब तक मृदुला आँख से ओझल नहीं हो जाती …….