राष्ट्रीय पक्षी उल्लू

किसी भी देश की एक पहचान होती है, उसके नागरिकों से। और नागरिकों की उनके गुणों से। इस आधार पर कह रहा हूँँ कि हमारा राष्ट्रीय पक्षी उल्लू होना चाहिए, मोर नहीं। माता लक्ष्मी की सवारी। और यहाँ के बेईमानों को तो देखो। लक्ष्मी जी के पीछे सारी जिंदगी भागते रहते है, क्या राजा क्या रंक! पर कमबख्तों ने जब सम्मान देने की बारी आयी तो चुना संुदर मोर को। माता सरस्वती का प्रिय! उस उल्लू को बिल्कुल भूला दिया जो अपने पर लक्ष्मी जी को लादे दिन-रात घूमता है। कभी डाॅलर के चक्कर में तो कभी पौण्ड और सेंट के चक्कर में। कभी रूपयों के चक्कर में तो कभी लीरा और दीनार के चक्कर में। संसार को छलनेवाली लक्ष्मी को ही लक्ष्मी-पुत्रों ने छल लिया। और इधर लक्ष्मी जी प्रसन्न है कि दीपावली में उनके नाम के दीप जलाए जाते हैं। हे माता! इन लोगो ने तुम्हारे सम्मान का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा। जबकि आज तो इस देश संसार में आप ही सबकुछ हैं। कंगाल, कंगाल क्यों है? और अमीर, अमीर क्यों है? सब लक्ष्मी जी की माया है-
टका धर्मः टका कर्मः टका ही परमो तपः।
यस्य हस्ते टका न असते दर-दर टकायते।।

और लक्ष्मी भी कौन-सी? वह जो उल्लू पर सवार होकर आए। वैसे, लक्ष्मी सवारी हाथी पर भी करती है। पर हाथी की चाल भी कोई चाल है- धीमी-धीमी। धीमी चाल इस देश के धनपतियों को पसंद नहीं। पतियों को वैसे भी पत्नी की देरी किसी भी कार्य में पसंद नहीं आती। फिर यह तो लक्ष्मी का मामला है। उल्लू की गति देखिए- तेज। फुर्र से उड़ता है। और उसकी निगाह उससे भी तेज। रात के अंधेरे में वह सब ढूँढ़ ले जो हाथी दिन के उजाले में भी न देख सके। चींटी तक तो नहीं देख पाता। छोटी-छोटी आँखें भी भला कितना देखेंगी? क्या देखेंगी? उल्लुओं की आँखें, गोल-मटोल, बड़ी-बड़ी। हाथी को पीछे क्या हो रहा है, पता नहीं चलता। और एक उल्लू है कि बैठा तो रहेगा एक स्थान पर और दसों दिशाओं की खबर रहेगी। जो लक्ष्मीपति होने के लिए सबसे आवश्यक है। इस देश में सबको लक्ष्मीपति बनना है। इसलिए उल्लू ही राष्ट्रीय पक्षी होना चाहिए। समझे?

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यदि हमारे नेता मेरी इस सलाह को मान लें और अपना चुनावी मुद्दा बना लें तो सरकार बना सकते हैं। पर देखिये तो हम मोर को माने बैठे हैं राष्ट्रीय पक्षी। मैं पूछता हूँ ऐसी कौन-सी समानता देखी आपने मोर और भारतवासियों में? किसी के सिर पर सफेद टोपी के अलावा आपने कलगी देखी है? नहीं न! मैं यह नहीं कहता कि उल्लुओं के सिर पर बाल होते हैं। पर यह कहने में मुझे कोई आपत्ति नहीं कि बहुतों के सिर पर उल्लुओं की तरह बाल नहीं होते। और रंग-बिरंगे पंखोंवाली, छल्लेदार दुम का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। इस मामले में कुत्ता, मोर से बाजी मार ले गया। कम-से-कम नेताओं के दुम तो होती है, इस देश में।

भाई सच कहूँ तो इस देश में मैंने किसी को मोर की तरह नाचता भी देेखा है। हमारे फिल्म जगत की कुछ बाइयाँ भी मोर जैसी वेशभूषा धारण कर नाचती थीं पहले। लेकिन अब इसकी आवश्यकता नहीं। मोर को नाचने के लिए चाहिए मानसूनी बादल। हमारी ममता-उर्मिला, मल्लिका-राखी कपड़े उतार कर झरने के नीचे फुदकने लगती हैं। वे मोर जैसे नाचे न नाचे, पर दर्शकों के मन का मयूर अवश्य भरतनाट्टयम करने लगता है।

अच्छा छोड़िए इसे। यह बताइए आपने कभी यह सुना है कि मैंने अमुक को उल्लू बना दिया? नहीं न। पर हमारे देश में उल्लू बना जाता है ओर बनाया भी जाता है। यह एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है। लाखों लोग उल्लू बनते हैं और बनाते हैं-एक दूसरे को। शायद ही इस भरत-खण्ड में ऐसा कोई होगा जो जीवन में एक बार उल्लू न बना हो। और कोई बनाए या न बनाए हमारे नेता सामूहिक रूप से उल्लू बनाते हैं। उल्लू बनना और बनाना हमारा राष्ट्रीय खेल भी होना चाहिए। ओलंपिक में पदक हमको ही मिलेगा। इसलिए मैं कहता हूँँ, हमारा राष्ट्रीय पक्षी उल्लू ही होना चाहिए।

वैसे एक बात जरूर है कि उल्लू बनानेवाला हमेशा इस विश्वास में जीता है कि उसने उल्लू बना दिया। और उल्लू बननेवाले को यह पक्का भरोसा होता है कि वह उल्लू नहीं बना। बड़ा अजीब दर्शन है। एक शायर महोदय को तो सारा देश ही उल्लू नजर आता है। जनाब कहते हैं-
‘एक ही उल्लू काफी था बर्बादे गुलिस्तां करने को,
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?’

बेचारे डा..इकबाल सारी जिंदगी यह समझाने में रह गये कि हम बुलबुले हैं उल्लू नहीं। पर लोगों को उल्लू से ही ज्यादा मोहब्बत थी। इसलिए उल्लू बनते और बनाते रहे।
मुझे तो बड़ा दुःख होता है, जब कोई उल्लू को भला-बुरा कहता है। बेचारा शांत, सुखी जीव जो दिनभर सोता है। शांतिप्रिय प्राणी। हम यहाँ भी उसके साथ न्याय न कर सके। कबूतर को शांतिदूत बना बैठे जो दिनरात अटरिया पर गुटर-गंू करता रहता है। और इधर यह सदा शांत रहनेवाला। शांति का पुजारी। दूर वीराने में, खंडहर में, शोरगुल से दूर रहनेवाला। रात में निकलता भी है तो वातावरण शांत हो जाने के बाद। उसके बाद भी मनहूस। वाह रे जमाना! इंसान तो इंसान जानवरों के साथ भी इंसाफ न कर सका।

एक बात कहूँ आपसे। बुरा मत मानिएगा। आज मेरे देश को उल्लुओं की ही जरूरत है। जो रात के अंधेरे में अपनी चारो ओर घूरनेवाली निगाहों से देश की चैकसी कर सके, क्योंकि कुत्ते रात में अब सिर्फ मौत को पहचानते हैं, दुश्मन को नहीं। अब देशी नस्ल के कुत्ते अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं। देशी कुत्तों को अब आवारा समझा जाने लगा है। विदेशी नस्ल के कुत्ते संुदर होते हैं बंगलोें की सुंदरता बढ़ाते हैं। पता नहीं वफादार होते है या नहीं। पर उल्लू सिर्फ देशी होते हैं। रात में जागकर चैकसी करनेवाला। चारो तरफ मुस्तैदी से नजर रखनेवाला- उल्लू।