कविता

ओस

क्यूँ पहचाने
अपने व पराये
स्व दर्द पाये।

जीवी का रोला
वल्ली खिली कलासी
पंक में पद्म ।
रोला = घमासान युद्ध
कलासी = दो पत्थर या दो लकड़ी के जोड़ के बीच का स्थान

हिम का झब्बा
काढ़े शीत कशीदा
भू शादी जोड़ा।
रेशम ,कलाबत्तू के तारों का गुच्छा = झब्बा =silk and silver or gold thread twisted together

दिखा चण्डांशु
खोह में चन्द्र छिपा
निशा हो संग।

भय से पीला
सूर्य-तल्खी है झेले
नीलाभ सिन्धु ।

कांच भी साक्ष्य
स्वप्न दुर्वाक्षि टंगा
नभ के आँसू।

चिप्पी ज्यूँ जोड़े
उधेड़ ही जायेंगे
दिया जो धोखा ।

*विभा रानी श्रीवास्तव

"शिव का शिवत्व विष को धारण करने में है" शिव हूँ या नहीं हूँ लेकिन माँ हूँ

One thought on “ओस

  • विजय कुमार सिंघल

    ये हाइकु बहुत उच्च कोटि के हैं. इनका अर्थ रहस्यमय है, जो मेरे जैसे साधारण व्यक्ति की समझ से परे है.

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