गीता मेरा हृदय है —–श्री कृष्ण

गीता मे हृदयं पार्थ गीता मे सारमुत्तमम्।

गीता में ज्ञानमत्युग्रं गीता मे ज्ञानमव्ययम्। ।

गीता की महत्ता के विषय में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि गीता मेरा हृदय है, गीता मेरा उत्तम सार है, गीता मेरा अति उग्र ज्ञान है, गीता मेरा अविनाशी है, गीता मेरा श्रेष्ठ निवास स्थान है, गीता मेरा परम पद है, गीता मेरा परम रहस्य है तथा गीता ही मेरा परम गुरु है।

गीता विश्व का वह महानतम ग्रन्थ है जिसे सर्वाधिक भाषाओं में अनुवादित व प्रकाशित किया गया है। गीता का अनुसरण सभी देशों के नागरिक, जाति-धर्म, वर्ण व कर्म से अलग होने पर भी करते हैं।  गीता वह शास्त्र है जिसमे किसी पंथ विशेष की नहीं अपितु सम्पूर्ण मानवता को बुद्धि, कर्म, ज्ञान, अध्यात्म की व्यापक चर्चा तथा विचारों का गुंथन किया गया है।  परस्पर विरोधी दिखाई देने वाले अनेक विश्वासों को भी सीधे साधे ढंग से एक जगह गूँथ कर सरल भाषा में संजोने का और मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने का ग्रन्थ है गीता। यह व्यक्ति को आत्मिक कल्याण मार्ग ढूंढने के लिए अलग अलग जगह भटकने से बचाने का शास्त्र है।

गीता के अनेक नाम —–

गीता गंगा च गायत्री सीता सत्या सरस्वती।  ब्रह्मविद्या ब्रह्मवल्ली त्रिसंध्या मुक्तगेहिनी। ।

अर्धमात्रा चिदानन्दा भवघ्नी भयनाशिनी।  वेदत्रयी पराSनन्ता तत्वार्थज्ञानमंजरी। ।

इत्येतानि जपेन्नित्यं नरो निश्चलमानसः।  ज्ञानसिद्धिं लभेच्छीघ्रं तथान्ते परमं पदम्। ।

गीता, गंगा, गायत्री, सीता, सत्या, सरस्वती, ब्रह्म विद्या, ब्रह्मवल्ली, त्रिसंध्या, मुक्तगेहिनी, अर्धमात्रा, चिदानन्दा, भवघ्नी, भयनाशिनी, वेदत्रयी,  परा, अनन्ता और तत्वार्थज्ञानमंजरी –यह सब गीता के अठारह नाम हैं। इनका स्थिर मन से नित्य जाप करने से शीघ्र ज्ञानसिद्धि और अंत में परम पद प्राप्त होना ऋषियों द्वारा कहा गया है।

ब्रह्मपुराण के अनुसार गीता का जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को माना जाता है। इस दिन को मोक्षदा एकादशी भी कहा जाता है।

यधपि गीता  प्रत्येक शब्द- प्रत्येक अक्षर अत्यंत दिव्य एवं कल्याणकारी है तथापि नौवें  श्लोक 22 में भगवान श्रीकृष्ण का अपने भक्तों के सम्मुख समर्पण अनूठा है——-

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्। ।

श्री कृष्ण कहते हैं हे अर्जुन ! जो अनन्य प्रेमी भक्तजन निरंतर चिंतन करते हुए मुझे निष्काम भाव से भजते हैं उन नित्य युक्त  परायण करने वाले मनुष्यों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।

एक अन्य प्रसंग में अर्जुन भगवान कृष्ण से पूछते हैं की मनुष्य इच्छा न होने पर भी पाप  कर्म क्यों करता है ?

कृष्ण कहते हैं -काम अर्थात कामना या इच्छा –प्रभुता की कामना, धन की या सुख  कामना के कारण  ही मनुष्य पाप कर्म करता है। यह कामना जब मन, बुद्धि, और इन्द्रियों को काबू कर लेती है तो व्यक्ति भ्रष्टाचारी बन जाता है।

हमारे ऋषि-मुनियों ने गंगा से भी अधिक महत्त्व गीता का माना है। क्योंकि गंगा तो भगवान के श्रीचरणों से निकली और गीता भगवान के ह्रदय से। गीता गीत  है, गति है, प्रगति है तथा गीता ही परमगति है, बिना गीता केवल दुर्गति है।

ऐसी महान गीता का ही असर था कि ईसाई धर्म  मानने वाले केनेडा के प्रधानमन्त्री मिस्टर पीअर टुडो गीता पढ़कर भारत आये। उन्होंने कहा कि जीवन की शाम हो जाए और देह को दफनाया जाए उससे पहले अज्ञानता को दफनाना जरुरी है और उन्होंने प्रधानमन्त्री पद से इस्तीफा देकर गाय और गीता-उपनिषद लेकर एकांत में जाने का  निर्णय किया।

भारतीय मनीषियों के अलावा अनेकों विदेशी विद्वानों ने गीता के महत्त्व को समझा —

अमेरिकन महात्मा ‘ थोरो’ के अनुसार -प्राचीन युग की सभी स्मरणीय वस्तुओं में श्री भगवदगीता से श्रेष्ठ कोई भी वस्तु नहीं है।  गीता में ऐसा उत्तम व सर्वव्यापी ज्ञान है कि उसके रचियता देवता के असंख्य वर्ष हो गए फिर भी ऐसा दूसरा कोई ग्रन्थ नहीं लिखा गया।

श्री एफ एच होलेम (इंग्लॅण्ड)  के अनुसार मैंने बाइबिल का यथार्थ अभ्यास किया है, उसमे जो भी ज्ञान लिखा है वह केवल गीता के उद्धरण रूप में है। मैं ईसाई होते हुए भी गीता के प्रति इतनी श्रृद्धा व आदर इसीलिए रखता हूँ कि जिन गूढ़ प्रश्नों का समाधान पाश्चात्य लोग अभी तक नहीं खोज पाये हैं, उनका गीता में शुद्ध और सरल तरीके से समाधान दिया गया है। इसीलिए गीता मेरे लिए साक्षात योगेश्वरी माता बन गयी है जिसे विश्व के समस्त धन से भी नहीं खरीदा जा सकता है। यह भारत वर्ष का अमूल्य दिव्य खजाना है।

यूँ तो गीता पर भक्तों द्वारा अनेक टीकाएँ लिखी गयी हैं परन्तु प्रमुख भाष्य निम्न हैं —

गीता भाष्य   (आदिशंकराचार्य )

गीताभाष्य   (रामानुज)

गूढ़ार्थ दीपिका टीका (मधुसूदन सरस्वती )

सुबोधिनी टीका (श्रीधर स्वामी )

ज्ञानेश्वरी (संत ज्ञानेश्वर)

गीता रहस्य (बाल गंगाधर तिलक)

अनासक्ति योग ( महात्मा गांधी)

गीता चिंतन (हनुमान प्रसाद पोद्दार )

गीता यथारूप (प्रभुपाद स्वामी)

गीता साधक संजीविनी (रामसुख दास जी)

essays on geetaa (अरविन्द घोष )

ईश्वरार्जुन संवाद (परमहंस योगानंद)

गीता प्रवचन (विनोबा भावे)

गीता तत्व विवेचनी (जयदयाल गोयन्दका )

भगवदगीता का सार (स्वामी क्रियानन्द )

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै शास्त्र विस्तरैः

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्मविनि सृतम्।

अर्थात गीता को सुगीता यानी उसका पालन करिये, अन्य शास्त्रों के विस्तार को नहीं देखिये, गीता तो स्वयं भगवान के श्रीमुख से निकली है।

(इस आलेख के तैयार करने में दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र से अनेक तथ्यों को लिया गया है, पत्र के लेखकों तथा संपादक के प्रति आभार )

 

डॉ अ कीर्तिवर्धन