संस्कृत भाषा की महत्ता

आज संस्कृत एवं जर्मन भाषा को लेकर चर्चा जोरो पर हैं। तीसरी भाषा के रूप में केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन के स्थान पर संस्कृत भाषा को लागु करने के सरकार के फैसले का कुछ लोग जोर शोर से विरोध कर रहे हैं। उनका कहना हैं की जर्मन जैसी विदेशी भाषा को सीखने से रोजगार के नवीन अवसर मिलने की अधिक सम्भावना हैं जबकि संस्कृत सीखने का कोई लाभ नहीं हैं। कोई भी व्यक्ति जो संस्कृत भाषा की महत्ता से अनभिज्ञ हैं इसी प्रकार की बात करेगा परन्तु जो संस्कृत भाषा सीखने के लाभ जानता हैं उसकी राय निश्चित रूप से संस्कृत के पक्ष में होगी। संस्कृत भाषा को जानने का सबसे बड़ा लाभ यह हैं कि हमारे धर्म ग्रन्थ जैसे वेद, दर्शन, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता इत्यादि में वर्णित नैतिक मूल्यों, सदाचार,चरित्रता, देश भक्ति, बौद्धिकता शुद्ध आचरण आदि गुणों को संस्कृत की सहायता से जाना जा सकता हैं। जो जीवन में हर कदम पर मार्गर्दर्शन करने में परम सहायक हैं। मनुष्य जीवन का उद्देश्य केवल आजीविका कमाना भर नहीं हैं। अगर ऐसा होता तो मनुष्य एवं पशु में कोई अंतर नहीं होता क्यूंकि पेट भरना, बच्चे पैदा करना और उनका लालन पोषण करना दोनों में एक समान हैं। मनुष्य के पास कर्म करने की स्वतंत्रता हैं एवं कर्म करते हुए आध्यात्मिक उन्नति करना उसके जीवन का लक्ष्य है। इस उन्नति में नैतिक मूल्यों का यथार्थ योगदान हैं। इन मार्गदर्शक मूल्यों को वेदादि धर्म ग्रंथों के माध्यम से प्रभावशाली रूप से सीखा जा सकता हैं।

एक उदहारण से इस विषय को समझने का प्रयास करते हैं। एक सेठ की तीन पुत्र थे। वृद्ध होने पर उसने उन तीनों को आजीविका कमाने के लिए कहा और एक वर्ष पश्चात उनकी परीक्षा लेने का वचन दिया और कहा जो सबसे श्रेष्ठ होगा उसे ही संपत्ति मिलेगी। तीनों अलग अलग दिशा में चल दिए। सबसे बड़ा क्रोधी और दुष्ट स्वाभाव का था। उसने सोचा की मैं जितना शीघ्र धनी बन जाऊंगा उतना पिताजी मेरा मान करेंगे। उसने चोरी करना, डाके डालना जैसे कार्य आरम्भ कर दिए एवं एक वर्ष में बहुत धन एकत्र कर लिया। दूसरे पुत्र ने जंगल से लकड़ी काट कर, भूखे पेट रह कर धन जोड़ा मगर उससे उसका स्वास्थ्य बेहद कमजोर हो गया , तीसरे पुत्र ने कपड़े का व्यापार आरम्भ किया एवं ईमानदारी से कार्य करते हुए अपने आपको सफल व्यापारी के रूप में स्थापित किया। एक वर्ष के पश्चात पिता की तीनों से भेंट हुई।  पहले पुत्र को बोले तुम्हारा चरित्र और मान दोनों गया मगर धन रह गया इसलिए तुम्हारा सब कुछ गया क्यूंकि मान की भरपाई करना असंभव हैं, दूसरे पुत्र को बोले तुम्हारा तन गया मगर धन रह गया इसलिए तुम्हारा कुछ कुछ गया और जो स्वास्थ्य  का तुम्हें नुक्सान हुआ हैं उसकी भरपाई संभव हैं, तीसरे पुत्र को बोले तुम्हारा मान और धन दोनों बना रहा इसलिए तुम्हारा सब कुछ बना रहा। ध्यान रखो मान-सम्मान तन और धन में सबसे कीमती हैं।

यह मान सामान, यह नैतिकता, यह विचारों की पवित्रता, यह श्रेष्ठ आचरण, यह चरित्रवान होना यह सब उस शिक्षा से ही मिलना संभव हैं जिसका आधार वैदिक हैं और जिस शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविकोपार्जन हैं उससे इन गुणों की अपेक्षा रखना असंभव हैं। यह केवल उसी शिक्षा से संभव हैं जो मनुष्य का निर्माण करती हैं। मनुष्य निर्माण करने और सम्पूर्ण विश्व को अपने ज्ञान से प्रभावित करने की अपार क्षमता केवल हमारे वेदादि धर्म शास्त्रों में हैं और इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता हैं। एक साधारण से उदहारण से हम इस समझ सकते हैं कि जीवन यापन के लिए क्या क्या करना चाहिए यह आधुनिक शिक्षा से सीखा जा सकता हैं मगर जीवन जीने का क्या उद्देश्य हैं यह धार्मिक शिक्षा ही सिखाती हैं। समाज में शिक्षित वर्ग का समाज के अन्य वर्ग पर पर्याप्त प्रभाव होता हैं। अगर शिक्षित वर्ग सदाचारी एवं गुणवान होगा तो सम्पूर्ण समाज का नेतृत्व करेगा। अगर शिक्षित वर्ग मार्गदर्शक के स्थान पर पथभ्रष्टक होगा तो समाज को अन्धकार की और ले जायेगा।

इसके अतिरिक्त जर्मन सीखने वाले कितने बच्चे भविष्य में जर्मनी जाकर आजीविका ग्रहण करेंगे यह तो केवल एक अनुमान मात्र हैं। मगर नैतिक शिक्षा ग्रहण कर समाज में आदर्श सदस्य बनने वाले समाज का निश्चित रूप से हित करेंगे। इसमें कोई दौराय नहीं हैं। इसलिए समाज का हित देखते हुए संस्कृत भाषा के माध्यम से नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर समाज का आदर्श नागरिक बनाना श्रेयकर हैं।

डॉ विवेक आर्य