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भारतीय मिडिया और दलित

6 दिसंबर पर रत्न बाबा साहब अम्बेडकर जी के महा परिनिर्वाण दिवस पर उनको कोटि कोटि प्रणाम।

जिस तरह से आज भी बाबा साहब की उपेक्षा मिडिया करता है, दलितों के हक़ की उपेक्षा करता है उसी प्रकार बाबा साहब के समय भी करता रहा है । पेश है बाबा साहब और मिडिया पर एक लेख-

आंबेडकर की पत्रकारिता

डॉ आंबेडकर एक सफल पत्रकार थे जिन्होंने अपनी पत्रिकाओं के माध्यम से सामाजिक क्रांति का माहौल तैयार किया. वहीँ गाँधी ने भी अस्पृश्यों के मुद्दों को लेकर सन १९३३ में हरिजन नामक अखबार निकाला था जो पूना पैक्ट के बाद आरम्भ हुआ. भारतीय मीडिया ने जहाँ गाँधी के अस्पृश्यो पर अखबार को जमकर तवज्जो दी पर वह डॉ आंबेडकर के द्वारा उनके समुदाय के लिए प्रकाशित अखबारो पर चुप्पी साधे रहा.आखिर डॉ आंबेडकर को खुद के अखबार निकालने की ज़रूरत क्यों पड़ी?

सबसे बड़ा कारण था कि तत्कालीन मीडिया पूरी तरह कांग्रेस के प्रभाव में था और उसने दलित सम्बन्धी समाचारों को कभी कोई जगह नहीं दी. इसी कमी को देखते हुए डॉ आंबेडकर को अपने विचार और संघर्ष लोगो तक पहुचाने के लिए ­­­­निजी मीडिया की ज़रूरत पड़ी.डॉ आंबेडकर का स्पष्ट मानना था कि अखबार देश के उपेक्षित वर्गों की जिंदगी में बदलाव लाने में सक्षम होते हैं।

उनके मराठी अखबारो ने देश में न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को स्थापित करने के लिए नयी रणनीति का सूत्रपात किया.

डॉ आंबेडकर के अखबारों में मूकनायक (साप्ताहिक समाचार), बहिष्कृत भारत (पाक्षिक), जनता (साप्ताहिक) प्रमुख थे.उस समय जब अधिकांश अखबार देश में ‘स्वतंत्रता’ की अलख जगाने के काम में लगे थे उसी वक़्त डॉ आंबेडकर अपने अखबार ‘जनता’ के माध्यम से अछूतो के मुद्दों को जनता के सामने लाने के लिए प्रयासरत थे. जो कि अछूतो के लिए देश की स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण थे.उनके साप्ताहिक अखबार ‘जनता’ के संपादक भास्कर कद्रेकर थे. वहीँ उनके पाक्षिक ‘मूक नायक’ की शुरुआत जनवरी १९२० में कोल्हापुर के महाराज शाहूजी की मदद से हुई. हालाँकि बाबासाहेब इसके भी ऑफिशियल संपादक नहीं थे पर इसका वास्तविक कार्यभार उनपर ही था.गौरतलब है कि तिलक के अखबार ‘केसरी’ ने मूकनायक के विज्ञापन को छापने से मना कर दिया था जबकि यह एक पेड विज्ञापन था. यह सब उस समय की बात है जब तिलक जिंदा थे. हम समझ सकते है कि उस ज़माने में जब समाज में अस्पृश्यता का भारी चलन था तब किसी अखबार में दलित पत्र-पत्रि़का का विज्ञापन भी अछूत माना जाता था.अमरीकी अश्वेतो और भारतीय दलितो के मीडिया इतिहास में बहुत समानता थी,वर्ष १८४० में विलिस ए होद्जेस नामक एक अश्वेत ने ‘द सन’ के सम्पादकीय में अश्वेतो के वोटिंग अधिकार के खिलाफ लिखने पर अपना विरोध जताया था.

उसने इसके विरोध स्वरुप सबसे पहले सम्पादकीय में अपना पत्र भेजा, जिसे उस अखबार ने $15 की फीस चार्ज करने के बाद प्रकाशित किया. पर उसने इस सन्देश को जस का तस प्रकाशित न करते हुए इसे एक विज्ञापन के रूप में ही पेश किया. जिसके खिलाफ होद्गेस ने फिर अपना विरोध प्रगट किया जिस पर ‘द सन’ के तरफ से बड़ा विचित्र जवाब आया. उसने लिखा कि ‘सन (सूरज) सभी गोरे लोगो के लिए चमकता है. काले लोगो के लिए नहीं’.यानि इस अखबार ने स्पष्ट कर दिया था कि वह काले लोगो को अपने पाठकों के रूप में नहीं चाहता. ‘द सन’ के इस रवैय्ये को देखते हुए उस अश्वेत व्यक्ति ने आखिरकार १८४७ में ‘रेम’स होर्न’ (Ram’s Horn) नाम से अपना स्वयं का अखबार शुरु किया.चूँकि डॉ आंबेडकर ने भी अपनी पढाई के समय कुछ साल अमरीका में गुजारे थे इसलिए वे मीडिया इंडस्ट्री से बखूबी परिचित थे. वे भारतीय सन्दर्भ में जानते थे कि यहाँ का मास-मीडिया सवर्ण जाति दुराग्रह से पीड़ित हैं।

और इसलिए उन्होने भी दलितो के लिए अलग से अखबार निकालने की ज़रूरत समझी.उनके अखबार- ‘मूक नायक, जनता, बहिष्कृत भारत’ का उद्देश्य उनके नाम से ही स्पष्ट होता है.मार्च १९२७ को डॉ आंबेडकर के नेतृत्व में हजारो लोगो ने पानी पीने के अधिकार के लिए महाड के चावदार तालाब तक मार्च किया था और जिसके प्रतिक्रिया स्वरुप सवर्ण हिन्दुओ ने उनपर भीषण हमला किया था.यह हर तरह से एक बड़ा समाचार था.पर महराष्ट्र के अखबार इस समय दो खेमो में बंट गए थे. एक वर्ग जहाँ दलितो के इस साहसपूर्ण कदम का विरोध करने लगा तो दूसरा इसे कानूनी मसला बता कर इस मुद्दे पर घडियाली आंसू बहा रहा था.मीडिया में तो अब डॉ आंबेडकर के विरोध का सिलसिला शुरू हो गया था. इस हालात में उन्होंने ने अप्रेल ३,१९२७ को उनके पाक्षिक ‘मूकनायक’ को आरंभ किया. इस पत्रिका का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए डॉ आंबेडकर ने कहा था ‘मैंने वकील का पेशा इसलिए अपनाया क्योंकि इसके साथ अखबार भी चलाया जा सकता है. अगर समाज की भलाई के लिए कुछ करना हो तो स्वतंत्र पेशा होना ज़रुरी है.’मैंने वकील का पेशा इसलिए अपनाया क्योंकि इसके साथ अखबार भी चलाया जा सकता है. अगर समाज की भलाई के लिए कुछ करना हो तो स्वतंत्र पेशा होना ज़रुरी है.’

भारतीय मीडिया में डॉ आंबेडकर

डॉ आंबेडकर एक राष्ट्रिय नेता थे पर मीडिया ने उन्हें हमेशा दलित-नेता के रूप में ही प्रोजेक्ट किया. डॉ आंबेडकर के आंदोलन और संघर्ष के दौर से लेकर उनकी जन्मशती तक मीडिया ने उनके बारे में चुप्पी साधे रखी. भारतीय मीडिया का किसी व्यक्ति को समाज में स्थापित करने का आधार ब्राह्मणवादी चश्मे से ही गुजरता है. इसलिए भारतीय मीडिया डॉ आंबेडकर को नापसंद करता है.

दक्षिण की एक दलित मेगजीन समाथुवम (Samathuvam) ने अपने १७ वे अंक में वहीँ के मुख्यधारा के अखबार स्वदेश्मित्रण (Swadeshamitran) की आलोचना करते हुए लिखा कि इस अखबार ने जहाँ कांग्रेस के नेता के भाषण को भरपूर जगह दी वहीँ इसमे बाबासाहेब के भाषण को छोटे से अंश के रूप में सम्पादित करके छापा.

औपनिवेशिक और गैर-औपनिवेशिक दौर में जिस तरह डॉ आंबेडकर को मीडिया के द्वारा भेदभाव का शिकार होना पडा वह अश्वेत अमरीकी बुकर टी वासिंगटन का श्वेत समुदाय की प्रेस में हुए भेद के समान ही है.वाशिंगटन का उनके हज़ारो समर्थकों के सामने दिए जोशीले भाषणों को जहाँ अखबार के पहले पन्ने की खबर होना चाहिए था वह अखबार के आखिरी पन्ने में एक इंचमात्र स्थान ही पाता था. पर वही अखबार किसी अश्वेत व्यक्ति के द्वारा किये छोटे-मोटे अपराध को वह पहले पन्ने का न्यूज़ बनाने से नहीं चूकता था.जब बाबासाहेब गोलमेज परिषद में दलित हित कि बात रख रहे थे तब भारतीय मीडिया ने उन्हें गद्दार प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इस घटना पर प्रेस का रवैय्या बिलकुल जातीय हिन्दुवादी दृष्टि से ओतप्रोत था.यह ठीक उसी तरह की बात है जिसे अमरीका के सिविल राइट्स मूवमेंट के दौरान कर्नर कमीशन की रिपोर्ट में आई- “यहाँ गोरे अपनी गोरी आँखों से सबकुछ गोरो के ही परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं.”बाबासाहेब के मामले में क्षेत्रीय भाषाओँ की प्रेस ने भी अंग्रेजी प्रेस का ही अनुकरण किया.लितो के लिए पृथक निर्वाचन की मांग को मनवाने में सफल हुए तब भारतीय अखबार उनकी बुराई करने में नहीं चूके. तमिल अखबार ‘विकेतन’ ने अपने सम्पादकीय में छापा कि डॉ आंबेडकर ने देश की बहुसंख्यक आबादी को धोखा दिया है. इसने डॉ आंबेडकर के गाँधी के प्रति विचार की भी आलोचना की थी.इसी अंक में सेथ्जम्नावल (Sethjamnawal) के आर्टिकल ‘कधाम्बम (Kadhambam) में लिखा था कि ‘डॉ आंबेडकर का अछूतो के लिए नया कुआ खोदना उनके लिए पानी उपलब्ध कराना नहीं बल्कि उनको डुबो के मार देना है. इस कुए का नाम पृथक निर्वाचन क्षेत्र है’.

बॉम्बे क्रोनिकल’ के अनुसार, ‘डॉ आंबेडकर के पृथक निर्वाचन का उद्देश्य बहुसंख्यक हिन्दुओ को अल्पसंख्यक में बदल देना है’.

उस समय मीडिया ने उनके लिए राक्षस, गद्दार और भाड़े के टट्टू जैसे शब्दों का प्रयोग किया था. बॉम्बे क्रोनिकल में ही बी.जी. होर्निमन के एक उत्तेजक आलेख छपा था जिसमे लिखा था कि ‘यह डॉक्टर अपने आप को देश से भी ऊपर समझता है और देश पर अपनी मनमानी चलाना चाहता है’.फिर जब गाँधी ने पूना पेक्ट के बाद मंदिर-प्रवेश आंदोलन को समर्थन देना शुरू किया तब डॉ आंबेडकर ने इसका विरोध करते हुए लोगो से इस छोटी लड़ाई से अलग रहते हुए अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संगठित होने का आह्वान किया था.गाँधी का यह कदम दलितो को बहुसंख्यक हिन्दुओ की दया पर रखना था और उनकी दृष्टि में छुआछूत अपराध नहीं बल्कि पाप था. गाँधी वर्णाश्रम को भी श्रेष्ठ समझते थे और उनकी जाति को खत्म करने में कोई रूचि नहीं थी.इस पर प्रेस के बयान काबिलेगौर थे. उन्होंने डॉ आंबेडकर को ‘भीमासुर’ कहते हुए उनके खिलाफ द्वेष फ़ैलाने का अभियान शुरू कर दिया।

बॉम्बे के एक मराठी अखबार ने तो उन्हें ब्रह्म्द्वेषता की उपाधि दे डाली.प्रेस जहाँ गाँधी के सत्याग्रह को बढचढ कर प्रचारित करती थी वहीँ वह डॉ आंबेडकर के सत्याग्रहो की आलोचना करती थी. ‘वर्तमान’ २२ जुलाई १९४६ का कहना था कि ‘गाँधी के सत्याग्रह राष्ट्र के लिए होते हैं पर डॉ आंबेडकर के सत्याग्रह का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वार्थ ही होता है’, उसने कभी डॉ आंबेडकर के अहिंसात्मक आंदोलन को कोई तवज्जो नहीं दी.प्रेस की भाषा डॉ आंबेडकर और उनके आंदोलन के प्रति काफी द्वेषपूर्ण थी. वह उनके लिए बेहद अभद्र भाषा का प्रयोग करते थे.

प्रख्यात पत्रकार साईनाथ के अनुसार देश के संविधान बनाने वाले व्यक्ति के लिए मीडिया में उपेक्षा के सिवाय कुछ नहीं है. अभी उनकी पुण्यतिथि पर बॉम्बे में जुटने वाली भीड़ को एक ओर मीडिया जहां पूरी तरह नज़रंदाज़ कर देता है वहीँ इसके अगले दिन शिवाजी पार्क में पड़ी गन्दगी और ट्रेफिक जाम को बड़े चटखारे लेकर खबर बनाता है.

मीडिया कोई बवाल मचाने से भी नहीं चुकता उसका इस दिन लोगो से आह्वान होता है कि वे दादर के निकट नहीं जाए. उनको दलितो का बाबासाहब के प्रति दादर ओर शिवाजी पार्क में इकट्ठा होकर श्रद्धांजलि अर्पण करना अभद्र प्रतीत होता है.अगले दिन मीडिया लोगो के इंटरव्यू छापता है कि इस दिन भीड़ होने के वजह से कैसे लोग सुबह की सैर पर नहीं जा सके या अपने कुत्ते को नहीं घुमा सके, या कोई व्यक्ति भारी भीड़ कि वजह से रेस्टारेंट या ऑफिस जाने से वंचित रह गया!उनके लिए बाहर से आये हुए लोगो का खुले में नहाना बड़ा मुद्दा होता है. आश्चर्यजनक है कि २१ वर्षीय मेडिकल छात्र को यह दृश्य ‘अपसेट’ करने वाले लगे.

मीडिया पर डॉ आंबेडकर के विचार

डॉ आंबेडकर ने अखबारों का उल्लेख करते हुए कहा था कि इसमे दलित वर्गों को मामूली स्थान मिलता है उन्होंने यह भी कहा था कि ये अखबार उनके आंदोलन पर चुप्पी साधे रहते है.वे कहते है कि “यह दुःख की बात है कि हमारे पास संसाधनों की कमी है, हमारे पास पैसे नहीं है इसलिए हम अपना अखबार नहीं चला सकते. हमारे लोग रोज शोषण का शिकार होते हैं पर ये अखबार योजनाबद्ध तरीके से हमारी सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं पर चुप्पी बनाये रखते हैं. हर दिन गाँवों में हिन्दुओ और दलितो के बीच संघर्ष होता है पर इसकी किसी को भी जनकारी नहीं होती. मीडिया ऐसी घटनाओ को कभी सामने नहीं लाना चाहता”.डॉ आंबेडकर ने बाहर की दुनिया को इस सच्चाई बताने का बीड़ा स्वयं अपने हाथ में लिया. उनके अनुसार ‘दलितो की अपनी कोई प्रेस नहीं है. कांग्रेस की प्रेस उनके लिए बंद है और वह दलितो को बिलकुल भी स्थान नहीं देना चाहती और दलितो की अपनी प्रेस नहीं हो पाती क्योंकि उन्हें कोई विज्ञापन नहीं देता है’.उनके अनुसार मीडिया द्वारा दलितो का भेदभाव करने का दूसरा बड़ा कारण इसमें सवर्ण हिन्दुओ का वर्चस्व है. असोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया जो भारत की सबसे बड़ी प्रेस एजेंसी है का ज़िक्र करते हुए वे कहते हैं कि इसका पूरा स्टाफ मद्रासी ब्राह्मणों से भरा है जो सभी कांग्रेस के पक्षधर है. इसी वजह से वे कांग्रेस के विरुद्ध कोई टिपण्णी नहीं छापना चाहते. और इसी कारण है कि अस्पृश्य वर्ग की आवाज़ प्रेस में सामने नहीं आ पाती.

विवेचन

दलित जो कि समाज से बहिष्कृत, उपेक्षित, लाचार और शोषित थे उन्हें मीडिया से भी बिलकुल वैसा ही बर्ताव मिला. उस समय के अखबार दलितो के मुद्दे और उनके लिए वास्तविक कार्य करने वाले नेताओं के विषय पर मौन धारण किये रहते थे.डॉ आंबेडकर जिन्होंने अस्पृश्यता को समाप्त करने के लिए जीवन लगा दिया, मीडिया ने उन्हें ‘भीमासुर’ का नाम दिया।

अखबारों द्वारा उनके लिए प्रयुक्त भाषा और संबोधन तथा उनके कार्यों को नज़रंदाज़ करना मीडिया के चरित्र को बखान करता है.डॉ आंबेडकर मीडिया के मालिकों और उसकी सामाजिक संरचना से भली-भांति परिचित थे. उस समय के अधिकांश अखबार कांग्रेस के भक्त थे. इसलिए जो भी विचार कांग्रेस और हिन्दुवाद के खिलाफ थे उसे वे बड़ी आसानी से नज़रंदाज़ कर दिया करते थे.जिस अखबार ने गाँधी के नमक सत्यग्रह पर बढ़-चढ कर लिखा वह डॉ आंबेडकर के महाड सत्याग्रह को सत्याग्रह मानने के लिए तैयार नहीं था, उल्टा इसे धोखा करार दे रहा था.

ऐसे स्थिति जब कोई अखबार डॉ आंबेडकर को जगह देने कि जहमत नहीं उठा रहा था तब डॉ आंबेडकर ने खुद अखबार निकालने का निर्णय लिया.मार्क्सवादी विश्लेषण में मीडिया को सत्ता की संरचना के भीतर कैद माना गया है. उनके अनुसार मीडिया केवल प्रभुत्वशाली वर्ग का ही प्रतिनिधि होता है इसलिए वह केवल प्रभुत्वशाली वर्ग के हितों का ही संरक्षण करता है. उसमे वंचित तबके का कोई स्थान नहीं होता है. यह बिलकुल जायज़ और स्वाभाविक बात है.ठीक इसी तरह भारतीय अखबारों ने भी जातीय हिन्दुओ के ही विचारों को प्रश्रय दिया.भारतीय मीडिया ने जिसमे दलित नगण्य थे उसने उन्हें कोई स्थान न देते हुए कांग्रेस को ही महत्त्व दिया और आज़ादी के आन्दोलन को कांग्रेसी आंदोलन जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मीडिया के लिए दलित वर्ग के जीवन स्तर, समस्या और अछूतपन की पीड़ा के लिए कोई जगह नहीं थी. बाबासाहेब जो गूंगे समाज कि आवाज़ थे को प्रेस ने अपनी बात रखने की कभी इजाज़त नहीं दी.

मीडिया की सामाजिक संरचना आज बिलकुल वैसे ही हैं जैसे वह डॉ आंबेडकर के ज़माने में थी.योगेन्द्र यादव (सी.एस.डी.एस), अनिल चमडिया और जीतेन्द्र कुमार के सर्वे के अनुसार ‘राष्ट्रीय मीडिया’ में सामाजिक विविधता कहीं दीखाई नहीं देती और दलित और आदिवासी की इसमे कोई निर्णायक भूमिका नहीं है. कुल ३१५ भारतीय प्रेस के निर्णयकर्ताओ में एक भी दलित और आदिवासी नहीं है।

साभार- रत्नमाला मिजोरम विश्विद्यालय के जनसंचार विभाग में सहायक प्राध्यापक है. उनका यह आलेख अंग्रेजी भाषा में WWW.roundtableinindia.Co.in उपलब्ध है।

संजय कुमार (केशव)

नास्तिक .... क्या यह परिचय काफी नहीं है?

One thought on “भारतीय मिडिया और दलित

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छा लेख. डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर को मीडिया द्वारा उतना महत्त्व नहीं दिया गया जितना दिया जाना चाहिए. उनको केवल संविधान निर्माता कहा गया, जिसमें अर्ध सत्य भी है. डॉ आंबेडकर की इस छवि के लिए मीडिया से भी अधिक जिम्मेदार वे तथाकथित दलित नेता हैं जिन्होंने डॉ आंबेडकर को एक जाति या वर्ग विशेष का नेता बनाकर छोड़ दिया है. वे डॉ आंबेडकर का पूरा नाम भी नहीं लेते, क्योंकि उसमें ‘रामजी’ शब्द आता है.

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