कविता

बावरा–भाग १

पत्थर पर कुछ लेख पुराने

स्मृतियों के एक ठिकाने

सांझ का सूरज जैसे ढलता

खुद ही अपने आप को छलता

पथ से भटका मंजिल भूला

झूल निराशाओं का झूला

पर है बढ़ता जाए जोगी

मन की बात बताये जोगी

एक क्षण भी ना लिया आसरा

चलता जाता देखो बावरा

 

पत्थर से टकराया सीना

सागर से है सीखा जीना

फूलों से सीखा मुस्काना

और कलियों से प्रीत निभाना

बागों में जब आयी हरियाली

खिल खिल उठी जब हर एक डाली

तभी उठा निर्मोही ऐसे

मिला बहार से हो ना जैसे

एक क्षण भी ना लिया आसरा

चलता जाता देखो बावरा

 

नभ देखा और देखी धरती

देखी उड़ान जो चिड़िया भरती

देखा झरनों से बहता जल

नदियों का नित देखा कल कल

सिन्धु के सुंदर तट देखे

नाचते कूदते सब नट देखे

रमा नहीं पर, रुका नहीं पर

मन से सबको गले लगाकर

एक क्षण भी ना लिया आसरा

चलता जाता देखो बावरा

 

बीज बोये तो मिले नए फल

फूटे पहाड़ तो निकला नवजल

खंड खंड हो गए अखंड सब

टूटे टुकड़े हुए विखंड सब

धरती काटे देश बन गए

अभिशप्तों के शीश तन गए

लेकिन ये सबसे बेगाना

दुनिया ने ये भेद ना जाना

एक क्षण भी ना लिया आसरा

चलता जाता देखो बावरा

 

मोल प्रेम का चुका ना पाया

हाँ पर हर पल प्रीत निभाया

जितने क्षण जीवन के बिताए

उतने उत्सव गीत सुनाये

एक पल रुधिर रुदन ना रोया

कोई क्षण दुःख में ना खोया

लेकिन जब चलने का पल आया

एक पल भी ना रुका गवाया

एक क्षण भी ना लिया आसरा

बस चलता जाता देखो बावरा

____सौरभ कुमार दुबे

सौरभ कुमार दुबे

सह सम्पादक- जय विजय!!! मैं, स्वयं का परिचय कैसे दूँ? संसार में स्वयं को जान लेना ही जीवन की सबसे बड़ी क्रांति है, किन्तु भौतिक जगत में मुझे सौरभ कुमार दुबे के नाम से जाना जाता है, कवितायें लिखता हूँ, बचपन की खट्टी मीठी यादों के साथ शब्दों का सफ़र शुरू हुआ जो अबतक निरंतर जारी है, भावना के आँचल में संवेदना की ठंडी हवाओं के बीच शब्दों के पंखों को समेटे से कविता के घोसले में रहना मेरे लिए स्वार्गिक आनंद है, जय विजय पत्रिका वह घरौंदा है जिसने मुझ जैसे चूजे को एक आयाम दिया, लोगों से जुड़ने का, जीवन को और गहराई से समझने का, न केवल साहित्य बल्कि जीवन के हर पहलु पर अपार कोष है जय विजय पत्रिका! मैं एल एल बी का छात्र हूँ, वक्ता हूँ, वाद विवाद प्रतियोगिताओं में स्वयम को परख चुका हूँ, राजनीति विज्ञान की भी पढाई कर रहा हूँ, इसके अतिरिक्त योग पर शोध कर एक "सरल योग दिनचर्या" ई बुक का विमोचन करवा चुका हूँ, साथ ही साथ मेरा ई बुक कविता संग्रह "कांपते अक्षर" भी वर्ष २०१३ में आ चुका है! इसके अतिरिक्त एक शून्य हूँ, शून्य के ही ध्यान में लगा हुआ, रमा हुआ और जीवन के अनुभवों को शब्दों में समेटने का साहस करता मैं... सौरभ कुमार!