उपन्यास अंश

आत्मकथा : मुर्गे की तीसरी टांग (कड़ी 23)

पत्र-मित्रता के माध्यम से मुझे कई घनिष्ट मित्र पाने का सौभाग्य मिला, जिनका जिक्र आगे करूँगा। मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में मेरे मित्रों, खासकर पत्र मित्रों का बहुत हाथ रहा है, अतः उन सबके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना मेरा कर्तव्य है।

मेरे सबसे बड़े और घनिष्ट मित्रों में से एक हैं श्री रमेश चन्द्र राणा। आप सेना में सिग्नल कम्पनी में उस समय हवलदार थे और आजकल किसी ऊँची पोस्ट पर हैं। ये मुझे बहुत प्यार करते हैं। उनके सारे पत्र प्यार से ओत-प्रोत होते थे। हम दोनों की उम्र में काफी अन्तर है लेकिन इन्होंने मुझे कभी इस बात का अहसास नहीं होने दिया। मेरी प्रतिभाओं (जो भी छोटी-मोटी हैं) के वे बहुत प्रशंसक हैं। उनके अनुरोध पर मैंने अपने दो कार्टून उन्हें बनाकर भेजे थे। पहले मैं कार्टून बहुत बनाया करता था, जिनमें से केवल एक छप सका है। बाद में इसमें मेरी अरुचि हो गयी, क्योंकि इसमें समय बहुत लगता था और उसकी तुलना में फायदा नगण्य था। राणा साहब की रुचि साहित्यिक थी और मैं तो एक तरह का हरफन मौला रहा ही हूँ। अतः वे मुझे अपनी लघु रचनाएं लिखकर भेजते थे और मैं भी अपनी कविताएँ उन्हें लिख देता था, जिनके वे बहुत बड़े प्रशंसक थे। उन्हीं दिनों मेरे कान खराब हुए थे। एक दिन मैंने अपनी समस्या के बारे में उन्हें लिख दिया। जबाब में उनका बहुत प्रेरणादायक पत्र आया। मेरी आँखों के सामने छायी निराशा की धुंध को अपनी प्रेरणाओं से समाप्त करने का बहुत कुछ श्रेय उन्हीं को है।

मुझे एक बार उनके दर्शन का भी सौभाग्य मिल चुका है। एक बार वे जबलपुर से आगरा होकर दिल्ली जा रहे थे। उन्होंने अपने आने का दिन तथा समय मुझे लिख दिया था। सौभाग्य से मुझे वह पत्र एक-दो दिन पहले ही मिल गया। अतः मैं कुछ पेठा और दालमोंठ लेकर प्रातः 5 बजे पैदल ही लोहामंडी से आगरा कैण्ट स्टेशन पर गया था। मेरे सौभाग्य से उनका डिब्बा ढूँढ़ने में मुझे कोई मुश्किल नहीं हुई और वे भी मिल गये। यद्यपि मैं उन्हें पहचान नहीं पाया था, क्योंकि फोटो देखकर किसी को पहचानना मेरे लिए बहुत मुश्किल होता है, लेकिन उन्होंने मुझे पहचान लिया था। मैंने राजा की मण्डी तक की टिकट ले रखी थी अतः हम उसी गाड़ी से साथ ही साथ राजा की मण्डी तक आये और बातें करते रहे। मैंने राजा की मण्डी पर उनसे विदा ली। वह दिन मेरी जिन्दगी के सबसे ज्यादा खुशी वाले दिनों में से एक है। उसके बाद उनके दर्शन नहीं हो पाये, यद्यपि कई बार अच्छे मौके मिले। उनके सैकड़ों पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित रखे हुए हैं, जिन्हें मैं अपनी निधि मानता हूँ आज भी कभी-कभी भूले भटके उनका पत्र आ जाता है।

(पादटीप : श्री राणा से अब मेरा संपर्क टूट चुका है. अंतिम समाचार मिलने तक अवकाश प्राप्ति के बाद वे मंडी जिले के अपने गाँव में रह रहे थे.)

पवन कुमार गुप्ता मेरे एक और घनिष्ट पत्र मित्र रहे हैं। वे काफी स्मार्ट और आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक हैं। कुछ समय तक बेरोजगार रहने के बाद वे एक बड़े होटल में रिसेप्शनिस्ट हो गये थे। उनके साथ मेरी अच्छी पटती थी। पत्र लिखने में हम दोनों में ही होड़ लगी रहती थी। उन्होंने अपने कई चित्र (फोटू) मुझे भेजे थे जो आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। उनसे कई बार मिलने का सौभाग्य मिला, आगरा में भी और दिल्ली में भी। आजकल वे दिल्ली में ही एक पंचतारा (फाइव स्टार) होटल में हैं।

(पादटीप : श्री गुप्ता से भी मेरा संपर्क दिल्ली छोड़ने के बाद से ही टूट गया था. अब वे कहाँ हैं, पता नहीं.)

मेरी कई महिला पत्र मित्र भी रही हैं। उनमें सबसे पहला और सबसे ऊपर नाम है अनीता अग्रवाल (लखनऊ) का, जिन्हें मैं ‘अनी’ कहा करता था। उसे मैंने एक बहुत ही सुलझे हुए विचारों वाली मित्र पाया। मुझमें सैकड़ों तरह की गन्दी आदतें रही हैं, मैं बहुत जल्दी किसी के बारे में अपनी सही या गलत, अच्छी या बुरी राय बना लेता था और उसी के अनुसार मेरा व्यवहार होता था, जिसके कारण मुझे प्रायः हानि उठानी पड़ती थी या शर्मिन्दा होना पड़ता था। मेरी ऐसी ही आदतों को काफी हद तक सुधारने का श्रेय अनी को ही है। उसकी भी साहित्य में रुचि थी। मेरी कविताएं उसे बहुत पसन्द थी। मैंने अपनी कई कविताएं उसे लिख भेजी थीं। उसने भी अपने एक दो कविताएं मुझे लिखी थीं। उसका शौक था- नामकरण करना। मेरा उपनाम ‘अंजान’ उसी का दिया हुआ है। जो मुझे काफी पसंद है।

मैंने अपने एक-दो फोटो उन्हें भेजे थे, मगर अफसोस कि तमाम प्रार्थनाओं के बावजूद उन्होंने मुझे अपना फोटो नहीं दिया। लेकिन इस बात का मुझे कोई दुःख नहीं है। वास्तव में उनके पत्र ही उनके सौन्दर्य के सच्चे दर्पण हैं। हो सकता है वे तन से सुन्दर न हों लेकिन मन से सुंदर अवश्य हैं। मुझे उनके दर्शन करने का सौभाग्य अभी तक नहीं मिला है और शायद कभी नहीं मिलेगा, क्योंकि आजकल वे इलाहाबाद के एक संभ्रान्त परिवार की कुल वधू हैं। लखनऊ में वर्षों तक रहते हुए भी मैं कभी उनके घर (मायके) जाने का साहस नहीं जुटा सका, क्योंकि हमारा समाज खून के रिश्ते के अलावा अन्य किसी सम्बन्ध को मान्यता नहीं देता। अनी की शादी ठीक उस दिन हुई थी, जिस दिन मैं तिहाड़ जेल से छूटा था। मैं वहाँ संगीन ‘अपराधों’ के आरोप में बंद था। अनी की शादी का निमन्त्रण पत्र मुझे आगरा में मिला था, उसकी शादी के एक दिन बाद। जाने का प्रश्न ही नहीं था, क्योंकि समाज द्वारा खड़ी की गयी दीवारों को लाँघने का साहस मुझमें नहीं था।

उम्र में छोटी होते हुए भी मैं उसे अपनी बड़ी बहन की तरह मानता था और उसे मुझको डाँटने-फटकारने का भी अधिकार मिला हुआ था। एक बार मैंने उसके ऊपर एक कविता लिखी थी, जो उसे भेजी भी थी। अनी ने उस कविता पर सीधी तरह कोई टिप्पणी नहीं की। लेकिन उसके पत्र उसकी शादी के बाद भी एक-दो आये थे। उसके द्वारा लिखे गये पचास से भी ज्यादा पत्र मेरे पास सुरक्षित हैं, जिन्हें मैं अपनी अमूल्य धरोहर मानता हूँ। कभी-कभी जब मुझे अनी की बहुत याद आती है, तो मैं उसके पुराने पत्रों को खोलकर पढ़ लेता हूँ।

अनी और मेरी पत्र मित्रता के बारे में परिवार वालों और कई घनिष्ट मित्रों को भी मालूम था। यहाँ तक कि कल्पना को भी यह मालूम था। प्रायः कल्पना मुझे अनी का नाम लेकर छेड़ा करती थी। मेरी और अनी की मित्रता एक आदर्श थी और मैं स्वयं को इस बात के लिए बहुत सौभाग्यशाली मानता हूँ।

(पादटीप : श्रीमती अनीता अग्रवाल से लगभग 28 साल बाद मेरा संपर्क फेसबुक के माध्यम से पुनः स्थापित हुआ. वे अब दादी बनने वाली हैं. एक बार मैं लखनऊ में उनके मायके वाले घर में मिल चुका हूँ और एक बार वे भी मेरे परिवार से मिलने आ चुकी हैं. उनसे whatsapp पर अभी भी संपर्क बना हुआ है. इन मुलाकातों के बारे में विस्तार से आत्मकथा के चौथे भाग में लिखूंगा.)

जिन अनेक मित्रों के सम्पर्क में आने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ (पत्रों के माध्यम से) उनमें भी सुभाष चन्द्र दलाल का नाम अविस्मरणीय है। आप हरियाणा के बहादुरगढ़ जिले के एक गाँव में गरीब लेकिन आकार में बड़े परिवार के सदस्य हैं। अगर मुझसे सच्चे इंसानों का उदाहरण देने के लिए कहा जाय तो मैं दलाल साहब का नाम शायद सबसे पहले लूँगा। आप कांग्रेस के प्रति काफी श्रद्धा रखते थे, जबकि मैं सदा से कांग्रेस का कट्टर विरोधी रहा हूँ। इस सबके बावजूद वे मुझे बहुत प्यार करते थे। हममें पत्रों के माध्यम से काफी लम्बी और कभी-कभी अप्रिय बहसें हुआ करती थीं। लेकिन मेरा सौभाग्य है कि उन्होंने कभी मुझे यह अनुभव नहीं होने दिया कि भिन्न राजनीतिक विचाराधारा के कारण या अन्य किसी कारण से वे मुझे पसन्द नहीं करते। बल्कि मैंने सदा ये पाया कि घोर बहस और मतभेद के दिनों में भी उनका प्यार मेरे प्रति बढ़ता ही जाता था।

इससे भी बढ़कर उनकी इंसानियत की झलक उनकी परदुःखकातरता में मिलती थी। स्वयं गरीब और घरेलू कारणों से तनावग्रस्त होते हुए भी उन्होंने सैकड़ों गरीबों की मदद की थी और आज भी करते रहते हैं। आजकल वे वहीं एक जूनियर हाईस्कूल में शिक्षक हैं और अपना ज्यादातर समय समाजसेवा में लगाते हैं। मेरे पास उनके पत्रों की संख्या सबसे ज्यादा है और सबसे लम्बे भी। सारे पत्र अभी तक मेरे पास रखे हैं और रखे रहेंगे। उनका एक फोटो भी मेरे संग्रह में है। काफी दिनों तक हम दोनों का पत्र व्यवहार चलता रहा था लेकिन समय के साथ वह भी बन्द हो गया। मुझे अभी तक उनके दर्शन का सौभाग्य नहीं मिला है, जिसके लिए मैं काफी कोशिश करता था। शायद यही ईश्वर की इच्छा है।

गोरखपुर निवासी श्री शिव प्रसाद तुलस्यान मेरे एक और घनिष्ट पत्र मित्र रहे हैं। आप आनन्द नगर (गोरखपुर) की गणेश सुगर मिल्स में सुपरवाइजर हैं। मेरी तरह तुलस्यान साहब भी संघ के स्वयंसेवक हैं और नियमित कार्यक्रमों में जाया करते हैं। कई बार मुझे उनका दर्शन करने का सौभाग्य भी मिला है। डाक टिकट संग्रह में जाग्रत हुई मेरी रुचि को बढ़ाने में उनका बहुत योगदान रहा है। उन्होंने काफी टिकट मुझे भेंट में दिये थे। उनका अपना संग्रह मुझसे काफी बड़ा है। मैं प्रायः प्रसिद्ध व्यक्तियों पर जारी की गयी टिकट इकट्ठे करने में बहुत रुचि लेता था। आजकल यद्यपि समय की कमी से मेरा यह शौक लगभग रुक गया है, लेकिन प्रायः टिकटें मिलती रहती हैं। तुलस्यान साहब के पत्र मुझ तक अभी भी कभी-कभी आ पहुँचते हैं।

एक बार मेरा पता ‘यूथ टाइम्स’ नामक अंग्रेजी की एक साप्ताहिक पत्रिका में छप गया था। उसके बाद मुझे काफी पत्र मिले थे, विशेष कर लड़कियों के और उनमें से कई मेरे बहुत घनिष्ट मित्र बन गये थे।

उनमें सबसे उल्लेखनीय नाम है- शहनाज का। वैसे उसका नाम ‘नफीसा नाज’ था, लेकिन मैंने उसका नाम ‘शहनाज’ रख दिया था। उसे भी यह नाम बहुत पसन्द था। वह मुझे ‘विजू’ कहकर पुकारा करती थी, जो कि मेरा बचपन से घर का नाम चला आ रहा है। शहनाज और मैं शीघ्र ही पत्रों के माध्यम से बहुत खुल गये थे। वह गुजरात और राजस्थान की सीमा पर बसे ‘दोहद’ की रहने वाली थी और उसके घर में अंग्रेजी बोली जाती थी, लेकिन मेरे हिन्दी प्रेम को देखकर उसने मुझे हिन्दी में पत्र लिखना शुरू कर दिया था। प्रारम्भ में उसकी हिन्दी ऐसी ही थी लेकिन शीघ्र ही वह काफी सुधर गयी थी। वह मेरी पहली महिला पत्र-मित्र थी जिसने अपना फोटो मुझे भेजा था। वह काफी सुन्दर थी। जिस दिन मुझे उसका फोटो मिला था, मैं देर तक छुपकर उसे देखता रहा था। उसकी सुन्दर आँखें और बाल तथा मासूम चेहरा मेरे दिल में बस गये थे। उस दिन पहली बार मैंने वह महसूस किया था, जिसे लोग ‘प्यार’ कहा करते हैं।

वह मुस्लिम थी। मैं जानता था कि हमारा सम्बन्ध मात्र पत्र-मित्रता तक रहेगा और हम दोनों का मिलना लगभग असंभव है। फिर भी मैं उसके पत्रों को ही अपने सौभाग्य की निशानी मानता था। प्रायः हर महीने उसके दो-तीन पत्र आ जाते थे। मैं बेसब्री से उसके पत्र का इन्तजार करता रहता था। वह भी मुझे बहुत प्यारी-प्यारी बातें लिखती थी और कई बार मुझे सान्त्वना तथा प्रेरणा दिया करती थी। उसके दो अन्य फोटो भी मेरे पास आये थे, मगर दुर्भाग्य से उनमें से एक खो गया था।

लेकिन मुझे ज्ञात नहीं था कि भाग्य मेरे साथ एक क्रूर मजाक करने वाला है। केवल एक साल की पत्र मित्रता के बाद जाने क्या हुआ कि उसने अचानक मुझे पत्र लिखना बन्द कर दिया। उसे मेरी कानों की बीमारी के बारे में मालूम था, फिर भी वह मुझे बहुत प्रेरणा देती थी और प्यार भरे शब्दों में सान्त्वना देती थी। उसके अचानक पत्र बन्द कर दिये जाने से मैं हैरान रह गया था। उस समय तक मैंने अनी का शहनाज से परिचय करा दिया था तथा उनमें भी पत्र व्यवहार होने लगा था। अनी के पत्रों से ही मुझे ज्ञात हुआ कि किसी कारणवश वह मुझसे आगे पत्र व्यवहार नहीं रखना चाहती। साथ ही उसने अपने फोटो तथा पत्र भी वापस माँगे थे। अनी के कहने से मैंने उसका एक फोटो अपने पास रखकर उसका फोटो तथा सारे पत्र रजिस्टर्ड डाक से भेज दिये थे। उसने मुझे औपचारिक धन्यवाद भी दिया अनी के माध्यम से। इस समय शहनाज की मात्र दो निशानियाँ मेरे पास हैं- एक उसका फोटो तथा एक दीपावली पर भेजा गया कार्ड, जिसमें उसने कुछ शब्द लिखे हैं। इन दोनों ही चीजों को मैं अपनी अमूल्यतम निधि मानता हूँ। भले ही वह अब मेरी कुछ न लगती हो, लेकिन उसकी यादें मेरे मन पर सदा-सदा के लिए अंकित हो गयी हैं। आजकल भी मुझे उसकी याद आती है। शायद उसकी शादी भी हो गयी हो।

उससे पत्र मित्रता टूट जाने के बाद मुझे बहुत दुःख हुआ था। मैं हर समय उसकी याद में खोया रहता था। इच्छा होती थी कि उड़कर उसके पास पहुँच जाऊँ और उससे पूछूँ कि बता, मेरा कसूर क्या है? उन दिनों मैं बहुत तनावग्रस्त रहता था। मेरा स्वास्थ्य बहुत ज्यादा गिर गया था तथा मेरे गले के चारों ओर टान्सिल हो गये थे। मैंने उसकी याद में कई कविताएं तथा गजलें लिखी हैं। जिनमें से एक नीचे दे रहा हूँ-
मुझे वे दिन याद आते हैं,
जब तुम्हारे हर पत्र से प्यार झलकता था
जब तुम्हारे हर पत्र से स्नेह टपकता था
जब मैं आसमान में उड़ा करता था
जब मैं तुम्हारे ख्यालों में खोया रहता था
एक साल, सिर्फ एक साल
फिर सब कुछ समाप्त हो गया,
एक सुन्दर स्वप्न की तरह!
मेरी प्रियतमा!
मैं तुमसे कुछ नहीं चाहता,
बस तुम मुझे मेरे वे दिन लौटा दो,
ताकि मैं आसमान में उड़ता रहूँ
ताकि मैं तुम्हारे ख्यालों में खोया रहूँ!

मैं आज भी यह मानता हूँ कि उसने मुझसे मित्रता समाप्त करने का निर्णय किसी बहुत बड़ी मजबूरीवश लिया होगा और वह भी उतनी ही, बल्कि उससे ज्यादा ही, दुःखी हुई होगी, जितना मैं हुआ था। क्योंकि उसका प्यार सच्चा था, क्योंकि हमारी मित्रता पवित्र थी और इसका सबूत है उसकी मासूम आँखें और उसकी कभी न मिटने वाली याद।

(पादटीप : अनीता के साथ ही शहनाज़ से भी मेरा पुनः संपर्क लगभग 30 साल बाद हुआ. आजकल वे अबुधाबी में हैं. उनसे पहले चैट हो जाती थी, पर अब केवल ईमेल से संपर्क बना हुआ है. उनके बारे में भी विस्तार से आत्मकथा के चौथे भाग में पढ़ना.)

(जारी…)

 

परिचय - डाॅ विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com

5 thoughts on “आत्मकथा : मुर्गे की तीसरी टांग (कड़ी 23)

  1. विजय भाई , आप की कहानी बहुत दिलचस्प होती जा रही है , जिंदगी के खट्टे मीठे तजुर्बे पड़ कर आगे जान्ने की इच्छा हो रही है.

    1. प्रणाम, भाई साहब ! आप इसको दिलचस्पी से पढ़ रहे हैं, यह जानकार मुझे बहुत संतोष होता है.
      आपको नवीन वर्ष के लिए हार्दिक शुभकामनायें. प्रभु आपको ढेर सारी खुशियाँ दे.

  2. सारे विवरण को एक साथ एक बार में पढ़ गया। आपको तिहाड़ जेल में जाना पड़ा था। इसने कुछ सोचने के लिए विवश किया। यह जीवन की खट्टी यादे होती हैं। आपको भी इससे गुजरना पड़ा. आपसे परिचय पढता जा रहा है। आगे जानने की इच्छा है। आजकल आप कहा रहते है? यह भी जानने की इच्छा करती है।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद. मेरे तिहाड़ जेल में रहने का विवरण अगले अध्याय में पढ़ना.

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