ब्लॉग/परिचर्चा

सुधर जाओ धर्म के ठेकेदारो

आजकल हिन्दू मुस्लिम विवाद कुछ ज्यादा ही गर्म पृष्ठभूमि में जी रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से बुराई निकलने के नाम पर एक दुसरे की कमियां निकली जा रही हैं। मुस्लिम हिन्दू समाज में चुन चुन कर कमी निकाल रहे हैं, शायद दाल बनाते समय कंकड़ भी कभी इतने ध्यान से न चुना हो। यद्यपि […]

लघुकथा

लघुकथा : लाली

लाली इस नाम को सुनते ही होंठो पर बरबस मुस्कुराहट आ जाती है । लाली हमारी गली का कूड़ा उठाने वाली की बेटी , मेरी हम उमर ही रही होगी लगभग , थोड़ा बहुत कम ज़ियादा हो सकता है । जिस दिन उसकी माँ की तबीयत खराब होती तो लाली आ जाती अपनी माँ की […]

कविता

मुक्तक

नींव विश्वास की मजबूत हो तभी पनपते हैं रिश्ते क्षल, कपट, द्वेष की तपिश से पिघलते हैं रिश्ते हसरतों की चाहत में गमों को सिलते ही रहना सच की आधार शिला पर टिके होते हैं रिश्ते !

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

वेदों में ईश्वर से की जाने वाली एक सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना’

संसार का विवेचन करने पर यह तथ्य सामने आता है कि यह ससार किसी अदृश्य सत्ता द्वारा बनाया गया है और उसी के द्वारा चलाया जा रहा है। वही सब प्राणियों को जन्म देता है और उनका नियमन करता है। संसार व सृष्टि की भिन्न-भिन्न रचनाओं पर ध्यान दें तो लगता है कि वह सत्ता […]

कविता

जो बद् दुआ बन कर उमड़ रही है दुनिया की हर मां के हृदय से ….

चुप है एक माँ, क्या कह कर मन को मनाए क्या समझाए किसी को । रोती हुई माओं के साथ ही रो पड़ती है वह स्वयं…. प्रार्थना , सांत्वना सभी शब्द छोटे और झूठे नज़र आते हैं। कब सोचा था किसी ने भी विदा के लहराते हाथ किताबें थामें हाथ , अंतिम विदाई लिए खुद […]

बाल साहित्य

टुनिया की सूझबूझ ( बाल कथा )

माँ कब से आवाज़ लगा रही थी। टुनिया को न जाने  सुनाई दे भी रहा  था भी कि नहीं। रज़ाई में दुबकी  पड़ी थी। उसके दोनों भाई -बहन स्कूल के लिए तैयार हो गए थे। और वह अभी तक उठी ही नहीं थी। माँ भी क्या -क्या करे सुबह -सुबह। कितने काम होते हैं। बच्चों को उठाओ। उनके कपड़े निकल […]

गीतिका/ग़ज़ल

सन्नाटे के घेरे में जरुरत भर ही आबाजें

इन कंक्रीटों के जंगल में नहीं लगता है मन अपना जमीं भी हो गगन भी हो चलो ऐसा घर बनातें हैं ना ही रोशनी आये ना खुशबु ही बिखर पाये हालात देखकर घर की अब पक्षी भी लजातें हैं दीबारें ही दीवारें नजर आये घरों में क्यों ? पड़ोसी से मिले नजरें तो कैसे मुहँ […]

कविता

किताबो को खुद पर नाज है …

  वो सब बच्चे जो पाठ शाला नही जाते ..हमे नही पढ़ पायंगे .. किताबें उदास है .. हमे कौन पढ़ेगा किताबों को इंतजार है .. किताबें उदास है .. किताबों के पन्नों में कई कहानियाँ ..कैद हैं .. वक्त नही है उन्हें पढ़ने के लिए किसी के पास और वक्त के पास है .. […]

उपन्यास अंश

उपन्यास : देवल देवी (कड़ी ८)

6. षड्यंत्र के सूत्रधार राजसी सवारियाँ मार्ग के किनारे निर्मित धर्मशाला के सामने रूकी। अग्रगामी घुड़सवारों ने राजसी स्त्रियों के आने की पूर्वसूचना धर्मशाला के प्रबंधक को दे दी थी। प्रबंधक धर्मशाला के मुख्य द्वार पर अगवानी को खड़ा था। आन्हिलवाड़ की महारानी कमलावती सोमनाथ के दर्शन करके वापस महल की तरफ जा रही थी। उनकी रक्षा उपसेनापति कंचनसिंह […]