जनम दिन तुमारा प्रेम पत्तर हमारा

(२५ दसंबर को मेरी अर्धांग्नी का जनम दिन था . यह तोहफा मैं ने उस दिन अपनी अर्धांग्नी को दिया था )
पियारी बीवी ,
25 दिसंबर को क्रिसमस डे भी है और तुम्हारा जन्मदिन भी. तुम 68 साल की हो जाओगी और मैं भी अप्रैल में 72 वर्ष का हो जाऊंगा. तुम सोचोगी, कि मुझे इस उम्र में प्रेम-पत्र की क्या सूझी? क्या इस उम्र में कोई प्रेम-पत्र लिखता है भला? बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुम को जन्मदिन का क्या तोहफ़ा दूं? अचानक मेरे ज़ेहन में हमारी शादी के वक्त की यादें ताज़ा हो आईं. कितने प्रेम-पत्र हम लिखा करते थे. उस में से बहुत-से हम ने अभी भी संभाल कर रखे हुए हैं, जिन को पढ़ने का अब हौसला नहीं पड़ता, क्योंकि वो जवानी के दिन थे और उस में कितनी अजीब-अजीब बातें हम ने लिखी हुई हैं और ख़ास कर, जो तकरीबन आधा घंटा हम ने अपनी दोनों की बातें रिकॉर्ड की हुई थीं, जिन को इतने वर्षों बाद कुछ हफ़्ते पहले ही हमने सुना था, कितने हैरान हो गए थे और झेंप-से गए थे हम! सोचा, शादी के बाद अब तक हम एक दिन भी जुदा नहीं हुए, इस लिए प्रेम-पत्र कैसे लिखते? अब तो हम बुज़ुर्ग हो गए हैं, सोचा पिछली बातों को ही ताज़ा कर लें और तुम तो जानती हो, कि जो मज़ा लिख कर बताने में है, वो बोल कर बताने में नहीं है. इस उम्र में ज़िंदगी का क्या भरोसा, अगला सांस आए-न-आए. एक बात और भी है. आज के ज़माने में तलाक इतने बढ़ गए हैं, कि समझ में ही नहीं आता, कि आज के युवा लोग आख़िर चाहते क्या हैं? इसी लिए मैं इस प्रेम-पत्र को मीडिया में भी हाई लाइट करना चाहता हूं, ताकि आज के नए ज़माने के लोग सोचें कि क्या हम ग़लत थे या वो ग़लत हैं. लो, अब कथा शुरु करता हूं.

यह बात 1955 की है जब मैं सिर्फ 12 वर्ष का था. मेरे पिताजी ईस्ट अफ्रीका से, जो आज केन्या के नाम से जाना जाता है, इंडिया आये हुए थे. मेरे बाबा जी कभी-कभी कोर्ट-कचहरी के काम से जालंधर जाया करते थे जो हमारे गांव से तकरीबन बीस किलोमीटर दूर है. रास्ते में तुम्हारा गांव आता था. एक दिन बाबा जी को प्यास लगी और पानी पीने के लिए पास के कुएं पर चले गए जो भाग्य से तुम्हारे बाबा जी का ही था. तुम्हारे बाबा जी ने मेरे बाबा जी को पानी पिलाया और ज़िद्द करके चाय भी पिलाई. फिर बातें चल निकलीं और एक दूसरे के बच्चों के बारे में बतियाने लगे. तुम्हारे बाबा जी ने बताया कि उस की पोती साढ़े आठ साल की है और मेरे बाबा जी ने बताया कि उस का पोता 12 वर्ष का है. फिर क्या था, तुम्हारे बाबा जी और मेरे बाबा जी ने हमारा रिश्ता वहीं पक्का कर दिया. न मुझे उस वक्त सगाई का कुछ पता था, तुझे तो क्या ही पता होना था, लेकिन जब घर आ कर मेरे बाबा जी ने, मेरे पिताजी को बताया, तो घर में बहुत हंगामा हुआ. पिताजी बाबा जी से झगड़ने लगे. बाबा जी ने अल्टीमेटम दे दिया, कि अगर उनकी बात मानी नहीं गई, तो वो घर छोड़ कर चले जाएंगे. उन्होंने किसी को वचन दिया हुआ है. आखिर पिताजी को हथियार डालने ही पड़े और कुछ दिन बाद तुम्हारे बाबा जी कुछ अन्य साथियों के साथ आए और मेरी झोली में शगुन डाल दिया, जिस में एक नारियल, कुछ बताशे और कुछ मेवे थे. मुझे कहा गया, कि मैं ये बताशे अपने साथियों में बांट दूं. बुज़ुर्ग हंस रहे थे, कि इन लड़कों की सगाई भी जल्दी हो जायेगी. बात आई-गई हो गई और ज़िंदगी आगे बढ़ने लगी. जब मैं कालिज में दाखिल हुआ, तो हम दोस्त फगवाड़े में पढ़ते थे और कभी-कभी जालंधर सिनेमा देखने जाया करते थे, हम साइकिलों पर होते थे और जीटी रोड पर जाया करते थे. जब हम तुम्हारे गांव के नज़दीक आते तो मुझे दोस्त छेड़ते, कि यार तुम्हारा ससुराल आ गया है. मैं भी मन में सोचता कि तू कैसी होगी, तरह-तरह के ख़्याल आते थे. एक दिन हम दो दोस्त ही थे, पता नहीं क्या सूझी, कि गांव में जाने के लिए तैयार हो गए. सड़क से तुम्हारा गांव एक फर्लांग ही है. हम गांव में चलने लगे, बग़ैर यह जाने, कि तुम कैसी होगी और तुम्हारा घर कहां होगा. जब हम गांव की एक गली में गए, तो तुम्हारे बाबा जी को देखा, जिन को मैं पहचानता था, क्योंकि उन्होंने ही मेरी झोली में शगुन डाला था. मैंने दोस्त से कहा, यार! चलो भाग चलें नहीं तो कहर टूट पड़ेगा. हम डर के मारे भाग खड़े हुए कि कहीं पता न चल जाए. बाद में जीटी रोड पर आ कर हम बहुत हंसे.

1962 में मेरे दोस्त का इंग्लैण्ड आने का चांस बन गया. मेरी रातों की नींद उड़ गई, क्योंकि यह मेरा दोस्त बहुत प्यारा था. मेरे पिता जी इंग्लैण्ड में आ गए थे, लेकिन मैंने कभी इंग्लैण्ड आने का सोचा ही नहीं था. मैंने भी इंग्लैण्ड में लंदन के एक कॉलेज को, जिस का नाम था ”फैराडे हाऊस इंजीनियरिंग कॉलेज” एक पत्र लिखा, कि मैं एडमिशन लेना चाहता हूँ. दो हफ्ते बाद मुझे फ़ॉर्म आ गए, जो मैंने भर कर भेज दिए. कुछ हफ्ते बाद मुझे एडमिशन की कन्फर्मेशन आ गई. मैंने पासपोर्ट के लिए अप्लाई कर दिया. मेरा पासपोर्ट मेरे दोस्त से भी पहले आ गया और मैं सीट बुक करवा कर दोस्त से एक हफ्ता पहले इंग्लैण्ड आ गया. यहां आ कर ज़िंदगी का असली पता चला. पढ़ना तो क्या था, काम भी नहीं मिलता था. हम लोग ऐसे रहते थे, जैसे हम रिफ्यूजी कैम्पों में रहते हों. एक घर में बीस-बीस पचीस-पचीस लोग रहते थे. एक बैड पर दो-दो सोते थे. फिर मुझे किसी की सिफ़ारिश से एक फैक्टरी में काम मिला, लेकिन जब पहला दिन काम पर गया, तो मेरा शरीर टूट चुका था. घर आ कर मैं बहुत रोया, कि कहां फंस गया! सभी लोग इकट्ठे हो गए और मुझे हौसला देने लगे. फिर धीरे-धीरे ज़िंदगी चलने लगी और मैंने कुछ पैसे जमा किए. बहुत दोस्त बन गए थे. हम विलायत की सैर करते, हर शनिवार और रविवार को दूर-दूर तक फ़िल्में देखने जाते. पता ही नहीं चला, कि कब पांच साल पूरे हो गए. पिताजी वापिस इंडिया चले गए थे और मुझे ख़त लिखते कि मैं इंडिया आ जाऊं, क्योंकि तेरे पिताजी शादी के लिए ज़ोर दे रहे थे. मैंने अपने पिताजी को लिखा, कि मैं अपनी वाइफ को ख़त लिखना चाहता हूं. पिताजी ने तेरे पिताजी से पूछा और मुझे इजाज़त मिल गई. बस फिर क्या था, प्रेम-पत्र शुरु हो गए. ये पत्र एक पेज से शुरु हो कर अनेक पेजेज़ के बन गए. पता नहीं कहां से बातें आती थीं. ख़त लिखना शुरु करता, तो रात-रात भर लिखता रहता. तुझे याद है, एक ख़त मैंने सात रंगों में सात बड़े-बड़े पेजेज़ पर लिखा था, इतना बारीक लफ़्ज़ों में था, कि आज भी हैरानी होती है, कि कैसे यह लिखना संभव हो गया. सच मानो, यही वो सुनहरे दिन थे, फिर कभी-कभी मैं तुम को किसी के घर टेलीफ़ोन भी करता था, जब कि उस समय तीन मिनट टेलीफ़ोन करने के पांच पाऊंड हुआ करते थे, जो उस समय आज के सौ पाऊंड के बराबर थे, लेकिन पैसों की किस को परवाह थी! फिर मैंने और एक दोस्त ने इंडिया आने के लिए सीटें रिज़र्व करा लीं. एयर अफगान में हम ने जाना था. सारा ऐरोप्लेन पंजाबियों से भरा हुआ था. लंडन गैटविक एयरपोर्ट से उड़े और पहले काबुल आ कर लैंड हुए. उस समय कितने अच्छे लोग हुआ करते थे अफगानिस्तान के! इतने फ़्रैंडली थे, कि सोच कर अब के अफगानिस्तान पे तरस आता है. दो घंटे बाद फिर प्लेन उड़ा और हम अमृतसर आ गए. पिता जी आए हुए थे और तीन-चार घंटे बाद हम गांव आ गए. सारी रात तेरे बारे में सोचता रहा और सुबह उठ कर साइकिल उठाई और तुझ से मिलने के लिए चल पड़ा. जीटी रोड पर हमारा मिलने का वादा था. जब मैं तुम्हारे गांव के बस स्टैंड पर पुहंचा, तो तू अभी आई ही थी, तेरे साथ तेरी छोटी बहन भी थी. मैंने तुझे फोटो पर ही देखा हुआ था, इस लिए झिझकते- झिझकते मैंने तुझे सत सिरी अकाल बोला. तुम ने भी बड़ी मासूमियत से जवाब दिया. फिर हम अपनी-अपनी साइकिल ले कर पैदल ही चल पड़े. मैं बातें कर रहा था, लेकिन तू झिझक-झिझक कर जवाब दे रही थी . फिर हम जालंधर शहर आ गए, बहुत घूमे, कुछ शॉपिंग की और मैंने फ्रूट की टोकरी बनवाई, तुम्हारे घर ले जाने के लिए. वापिस जालंधर से आ कर पहली दफ़ा तुम्हारे घर के दर्शन किए. तुम्हारी मां, यानी मेरी सासू मां ने दरवाज़े के दोनों तरफ पर तेल डाला और मुझे अन्दर आने का शुभ संकेत मिला. मेरी बहुत सेवा की गई .

इस दिन के बाद तो मानो हम को लाइसैंस ही मिल गिया और हम रोज़ मिलने लगे. शादी के गहने और कपड़े भी हम दोनों ने मिल कर खरीदे. एक बात मैंने तुझ को बताई नहीं थी, कि कॉलेज के ज़माने में हम चार दोस्तों ने वादे किये हुए थे, कि हम अपनी शादी बगैर दान-दहेज़ और दस बरातियों के साथ करेंगे. दो साथियों ने तो ऐसा कर भी दिखाया, लेकिन एक साथी घर वालों के आगे हार गया. जब मेरी बारी आई, तो मैंने भी अपनी इच्छा घर वालों को बताई, जो कुछ नाराज़गी के बाद मान ली गई. दस बरातियों के साथ, बगैर बैंड-बाजे के हमारी शादी हो गई. कुछ लोगों ने इस को बहुत अच्छा माना और कुछ ने दान-दहेज़ के बारे में लैक्चर भी दिए. इस के बाद हम घूमने-फिरने के लिए चंडीगढ़ आ गए. झील पर हम बोटिंग करने के लिए जाते, बहुत मज़े किये . फिर हम मंडी, कुल्लू और मनाली भी गए. दो हफ्ते घूम-फिरकर, मज़े करते हुए, हम वापिस आ गए और कुछ हफ़्ते रह कर हम इकट्ठे इंग्लैण्ड आ गए. यहां आकर ज़िंदगी इतनी बिज़ी, हो गई कि सारे लव लैटर भूल गए.

प्यारी बीवी कुलवंत, यह तो हो गई हम दोनों की कहानी. अब मैं कुछ और भी कहना चाहूंगा कि मैं कितना भाग्यशाली हूं, कि तुम मेरी ज़िंदगी में आईं, मेरी ज़िंदगी को तुम ने स्वर्ग बना दिया. मैं नहीं जानता कि कहीं और स्वर्ग है, लेकिन मेरी ज़िंदगी की झोली में तो तुम ने स्वर्ग के सभी सुख डाल दिए. पहले मैं अकेला था, फिर तू आई और अब हमारा परिवार बढ़ कर एक बड़ा वट-वृक्ष-सा हो गया है, क्या यह स्वर्ग से कम है? हम जानते हैं, कि हमने ज़िंदगी में बहुत तकलीफ़ें भी उठाईं, लेकिन दोनों ने मिल कर तकलीफ़ों को पछाड़ दिया. हा हा माना, कि ज़रूरत पड़ने पर तुम कुछ कड़वी भी हो, लेकिन मेरी मिठास ने तुम्हारे कड़वेपन को भी अपनी मिठास में घोल लिया. ज़िंदगी में पता नहीं कितनी बार हम ने बहस भी की, लेकिन याद ही नहीं कि किस बात पर बहस की थी. आज मैं तुम्हारे बाबा जी और मेरे बाबा जी का धन्यवाद करूंगा, क्योंकि उन बुज़ुर्गों के आशीर्वाद से ही यह सब मुमकिन हुआ है. बच्चे हुए, उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, पढ़ा-लिखाकर काम से लगाया और उनकी शादियां कीं. फिर पोते-दोहते और दोहती भी हुई, अब वो भी बड़े हो गए और हम बुज़ुर्ग हो गए. सभी बच्चे हमें खुश रखते हैं, बस हमें और क्या चाहिए? इसीलिए, मैंने तुम्हारे जन्मदिन पर यह तोहफ़ा यानी “प्रेम-पत्र” देना ही उत्तम समझा है.”

प्यार सहित,
तुम्हारा अपना
गुरमेल भमरा

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.