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शंका- एक व्यक्ति मन से पापकर्म का विचार करे मगर कर्म से कोई पापकर्म न करे। क्या वह पापी है?

शंका– एक व्यक्ति मन से पापकर्म का विचार करे मगर कर्म से कोई पापकर्म न करे। क्या वह पापी है?
समाधान– निश्चित रूप से मन से पापकर्म की बात सोचने वाला व्यक्ति भी कर्म से पाप करने वाले के समान पापी है। शतपथ ब्राह्मण में लिखा है मनुष्य जैसा मन में विचार लाता है वैसा वाणी से कहता है जैसा वाणी से कहता है वैसा कर्म से करता है। कुछ लोग यह शंका भी करते है कि केवल मन में बुरे विचार लाने वाला व्यक्ति किसी दूसरे का कोई अहित नहीं कर रहा फिर वह पापी कैसे हो सकता है? इस विषय में गीता श्लोक ३/६  में लिखा है कि जो मनुष्य कर्म इन्द्रियों को रोककर केवल मन से इन्द्रियों के भोग का विचार करता है, वह मूढात्मा मिथ्याचारी है। इसके अलावा गीता श्लोक २/६२-६३ में लिखा है कि विषयों का ध्यान करने से मनुष्य को उनके साथ संग वह राग पैदा होता है जिससे तीव्र इच्छा पैदा होती है। काम की पूर्ति न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मूढ़ता होती है। मूढ़ता से स्मृति में दोष आता है। स्मृति के बिगड़ने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि के नाश से मनुष्य का नाश हो जाता है। बुद्धि के बल पर मनुष्य और पशु में भेद होता है और जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाये उसका सर्वनाश निश्चित है।
   जिस प्रकार से पानी के तालाब में पत्थर फेंकने से उसकी लहरे उठती है, जिस प्रकार घंटी बजाने से उसकी आवाज वायु में चारों दिशाओं में फैलती है, जिस प्रकार जिस प्रकार दीपक जलाने पर उसका प्रकाश चारों दिशाओं में फैलता है उसी प्रकार से मानस तत्व के विचार एक व्यक्ति के मन से दूसरे व्यक्तियों तक भी पहुँचते है। मन के श्रेष्ठ विचार अन्यों को प्रकाशित करते है और दुर्गन्ध वाले विचार दूषित करते है।
वेद भगवान भी इसीलिए मनष्यों को पाप कर्मों के विचार से बचने के प्रेरणा देते है। अथर्ववेद ६/४५/१५ में लिखा है- हे मन के पाप, दूर हट जा, क्या बुरी बातें बताता है। हटजा तुझको मैं नहीं चाहता। वन-वृक्षों में फिरता रह, मेरा मन घर में, गौ आदि पशुओं की पालना में है।
ऋग्वेद १०/१६४/१ में लिखा है- हे  मन को पतित करने वाले कुविचार! हटो दूर भागों परे चलों। दूर के विनाश को देखो। जीवित मनुष्य का मन बहुत सामर्थ्य से युक्त है।
इन  मन्त्रों का आशय स्पष्ट है कि जिस प्रकार से हमारे घर में कोई चोर-डाकू आदि प्रवेश करने का प्रयास करता है तो हम उसे दूर भगा देते है उसी प्रकार से हमारे मन रूपी घर में कोई दुर्विचार प्रवेश करने का प्रयास करे तो हम उसे रोके और अगर भीतर आ जाये तो हमें उसे निकाल देना चाहिए।
वेद भगवान के इन दोनों मन्त्रों के अर्थों पर निरंतर चिंतन करने से मनुष्य अपने मन में दुर्विचारों के प्रवेश करने एवं प्रवेश हुए विचारों को निकालने में संभव है। मन से किया हुआ पाप कर्म से किये हुए पाप के समान ही मनुष्य का नाश करता है।
डॉ विवेक आर्य   

One thought on “शंका- एक व्यक्ति मन से पापकर्म का विचार करे मगर कर्म से कोई पापकर्म न करे। क्या वह पापी है?

  • विजय कुमार सिंघल

    मन में कोई पाप करने कि बात सोचना भले ही कानूनी दृष्टि से अपराध न हो, लेकिन मानसिक विकार तो है ही. इसलिए जहाँ तक संभव हो ऐसे विचारों को मन में नहीं आने देना चाहिए.

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