धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

वेदाध्ययन में स्त्रियों व दलितों सहित सभी का समान अधिकार

वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है जिसका उद्देश्य सभी विषयों, तृण से लेकर ईश्वर पर्यन्त, में मनुष्यों को सत्य व असत्य का विवेक कराना है। यदि ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में वेदों का ज्ञान न दिया होता तो मनुष्य आंख, नाक, कान, मुंह, जिह्वा, कण्ठ, मन व बुद्धि के होते हुए भी अज्ञानी ही रहते। […]

कविता

“यहाँ दूसरों को ना लाओ भाई •••”

यहाँ दूसरों को ना लाओ भाई। पूछेगा अपने सारा लोग भाई। यह वही जगह है सवँरती थी हँसकर, वह मेरे नयनों में रहती थी धँसकर, आँखें उस पर रह जाती थी फँसकर, लहराते थे, घुघराले काले बाल भाई। उसकी हँसीं बहुत ही कुछ कहती थी, फिर भी अपने में सदा मग्न रहती थीं, खुशियाँ बहुत […]

कविता

मधुमास

वन में खिल गए पलाश आ गया मधुमास सरस हुए बादल प्यार की बूंदों की हुई बरसात उड़ा कर गोरी का आँचल रसिक हुई बयार छेड़ गयी अमराई में कोयलिया मधुर तान गुनगुनाने लगे भंवरें उपवन में कलियों ने किया श्रृंगार बज उठे नगाड़े टहनियों पर झूम उठे पात पात सुबह लाल सांझ को सिंदूरी […]

कविता

कविता——‘मेरा मन’

एक फूल के सुखद एहसास सा है मेरा मन …….. आओ और महसूस करो इसकी भीनी खुश्बू……… मैं बिखेर दूंगी इसकी खुश्बू और महक उठूँगी तुम्हारे आस पास हवा के झोंकों सा है मेरा मन खोल दो,अपने दिल कि खिड़की मेरे लिए ……. और महसूस करो इसकी ताजगी आखिरी दम तक बहती जाउंगी तुम्हारे आस […]

कविता

“आकाश की परी मेरे घर उतर गई”

“ये जिंदगी भी मेरी अचानक मँचल गई, ये उम्र चारू चेहरें की खातिर फिसल गई, मुझको तो उसकी आँखों ने मदहोश कर दिया, नशा प्यार का देकर मेरी जाना किधर गई। फिर जिंदगी भी मेरी अचानक सँवर गई, सूरज की किरणें खुशियाँ बनकर बिखर गई, मेरी जान वो नादान को ढूँढा कहाँ कहाँ, वो आकाश […]

उपन्यास अंश

यशोदानंदन-१२

योगमाया का प्रभाव समाप्त होते ही मातु यशोदा की निद्रा जाती रही। जैसे ही उनकी दृष्टि बगल में लेटे और हाथ-पांव मारते शिशु पर पड़ी, वे आनन्दातिरेक से भर उठीं। शिशु एक पवित्र मुस्कान के साथ उनको देखे ही जा रहा था। उन्होंने उसे उठाकर हृदय से लगाया। हृदय से लगते ही दूसरे क्षण शिशु […]

कविता

लौटना भर है…

हर आना समेटे हैं लौटकर चले जाना मुझ तक आया ,लौट गया तुम तक आकर भी लौट जाएगा दूर हवा हवा में बहती पानी पानी नदी में बहता कुछ तुम बहे कुछ मै बहता रहा साथ-साथ जो बहकर निकला रास्ते से किसी भी मोड़ मुड़ सकता हैं मुड़ा हुआ ना जाने फिर किस रास्ते से […]

कविता

अंगड़ाई

  फूलों पर मंडराने फिर आ गए मधुप उड़ने लगे हैं पराग कणो के धूल कच्चे आमों की गंध लिए महकने लगी है बयार खूब महुवा की बूंदों से भींग गयी है सुनहरी स्निग्ध धूप वन हो या उपवन या गाँवों की अमराई हो गूंज रही हैं वहाँ कोयल की कूक पलाश का वृक्ष लेने लगा है […]

उपन्यास अंश

उपन्यास : देवल देवी (कड़ी 38)

34. सखी से मंत्रणा दिल्ली के शाही हरम में गुजरात की जबरन अपहृत की गई राजकुमारी देवलदेवी का कक्ष। अब वहाँ साजो सम्मान की हर वस्तु उपलब्ध है जो शाही हरम की शहजादियों और बेगमों के कक्षों में उपलब्ध रहती है। देवलदेवी कक्ष के फर्श पर पड़ी कालीन पर टहल रही है, टहलने से उनके चंद्रमा की स्वर्ण […]

कविता

वो पत्र

हे खुदा हमने यह प्यार कभी न किया होता गर उन्होंने दो पन्नों का वो पत्र न दिया होता यूँ घुट घुट के कभी न जिया होता गर उन्होंने दो पन्नों का वो पत्र न दिया होता यह जीवन क्या है यह तो सभी जी लेते हैं सूखी घास पे ओस की बूंदों को प्यासे […]