कविता

स्त्री

रसोई से उठते,

घी के धुँये सी सुबह,

दीपक की लौ सी जलती शामें!

भाव का दीप प्रज्जवलित कर,

खुद को ही खडा कर लेती हूँ,

भगवान के आगे!

दिन की वीरानी जब ,

साँय -साँय कर कानों को,

भेदती हैं!

तब सोचती हूँ,

जीवन का ये कौनसा पक्ष है,

खुद होकर भी ,

अपना वजूद न होना!

बंधनों में बँधी “स्त्री”

किसी कठपुतली से कम ,

नहीं आँक पाती, स्वयं को!

जिनकी खातिर होम दिया,

पूरा जीवन,

मिटा दिया खुद को!

प्रत्युत्तर में जब , सुनने मिलता है!

बहुत जुबान चलती है,

कुछ सुनना सीखो,

कितनी बहस करती हो!

रात के सन्नाटे भी

शोर करते,

प्रतीत होते है!

लगता है,

कानों की,

सहन शक्ति अब,

जबाब दे रही है!

…राधा श्रोत्रिय”आशा” २५-०१-२०१५

राधा श्रोत्रिय 'आशा'

जन्म स्थान - ग्वालियर शिक्षा - एम.ए.राजनीती शास्त्र, एम.फिल -राजनीती शास्त्र जिवाजी विश्वविध्यालय ग्वालियर निवास स्थान - आ १५- अंकित परिसर,राजहर्ष कोलोनी, कटियार मार्केट,कोलार रोड भोपाल मोबाइल नो. ७८७९२६०६१२ सर्वप्रथमप्रकाशित रचना..रिश्तों की डोर (चलते-चलते) । स्त्री, धूप का टुकडा , दैनिक जनपथ हरियाणा । ..प्रेम -पत्र.-दैनिक अवध लखनऊ । "माँ" - साहित्य समीर दस्तक वार्षिकांक। जन संवेदना पत्रिका हैवानियत का खेल,आशियाना, करुनावती साहित्य धारा ,में प्रकाशित कविता - नया सबेरा. मेघ तुम कब आओगे,इंतजार. तीसरी जंग,साप्ताहिक । १५ जून से नवसंचार समाचार .कॉम. में नियमित । "आगमन साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समूह " भोपाल के तत्वावधान में साहित्यिक चर्चा कार्यक्रम में कविता पाठ " नज़रों की ओस," "एक नारी की सीमा रेखा"

3 thoughts on “स्त्री

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    जिस दिन महलाओं का सम्मान होने लगेगा , समाज में शान्ति हो जायेगी लेकिन बहुत दफा देखा है कि नारी , नारी की ही दुश्मन बन जाती है . सास का बहु से बुरा वर्ताव , ननद का भाभी के साथ नारी को इस उलझन से उठने नहीं देता .

  • विजय कुमार सिंघल

    वाह वाह !

  • रमेश कुमार सिंह

    बहुत खुब वाह!

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