राजनीति

अविश्वास की शिकार आप

बीते कई दिनों से आम आदमी पार्टी का जो संसार उलटपुलट से भरा दिखाई दे रहा है वह दरअसल कई रसोईयों के एक ही रसोई में इकट्ठे होकर भोजन पकाने का नतीजा है। रसोईया यदि एक ही हो तो वह सबकी राय लेकर उनको ध्यान में रखकर भोजन पका सकता है मगर यदि सभी भोजन पकाना शुरू कर दे ंतो समस्या पैदा होना लाजिमी है। सभी के द्वारा अपने अपने मसाले डालने की आतुरता समस्या बनकर तब सामने आती है जब कोई एक यह देखता है कि उसकी बात को नहीं माना गया। उसके द्वारा पकते भोजन के संबंध में जो सलाह दी गई उसको सिरे से दरकिनार कर दिया गया। एक प्रकार से खारिज कर दियागया। ऐसे में उसका रसोई में बने रहने का उसके हिसाब से कोई औचित्य नहीं होता। यह तय है कि मसाला यदि एक ही हाथ से पड़े तो भोजन बनाने वाले का जस बना रहता है। जस आम भाषा में यश शब्द का तत्सम है जिसका अर्थ होता हे कि कुछ लोगों द्वारा यदि किसी भी कार्य में हाथ डाला जाये तो उस कार्य के सही ढंग से होने में कोई संदेह नहीं रह जाता।

आम घरों में यदि घर का कोई सदस्य घर की बगीची में कोई फल या सब्जी आदि जब कभी भी लगाता है तब वह फल या सब्जी बेहतर रूप में ही फलती फूलती है जबकि परिवार के अन्य सदस्य यदि उसी कार्य को अपने हाथ से करें तो जरूरी नहीं कि वह परिणाम प्राप्त हों। तब लोग कहा करते हैं कि उस आदमी के हाथ में जस है। आम आदमी पार्टी में यह जस अरविंद केजरीवाल के हाथ में ही है और निश्चित तौर पर इन सबके पीछे हाथ अरविंद केजरीवाल का ही है तो जस भी उन्हें ही मिलना चाहिये। लेकिन एक बात और भी तय है कि रसोई और राजनैतिक पार्टी को आप उदाहरण के रूप में सामने तो रख सकते हैं लेकिन दोनो के यथार्थ में भारी अंतर है। रसोई में यदि बाकी सदस्यों की सलाह न मानकर एक ही व्यक्ति अपनी मर्जी से भोजन पकाये तो भी भोजन पक ही जायेगा लेकिन क्या राजनैतिक पार्टी में कोई अपने दम पर भाजन पका सकता है ? क्या इसमें दूसरों के साथ खड़े होने की जरूरत नहीं है ? इसका जवाब सिर्फ और सिर्फ हां है। अन्य दलों व आप में फर्क यह है कि आप के तमाम बड़े नेता हाईप्रोफाईल व बुद्धिजीवी प्रकृति के है। इसमें इसके मुखिया केजरीवाल ही सिर्फ बुद्धिमान् नहीं हैं बल्कि अन्ना के मोह से खिंचे योगेन्द्र यादव सरीखे सरल व्यक्तित्व, जिन्हें भले ही अब केजरीवाल की चालाकियों ने कुछ चालाकियों विद्रोह स्वरूप सिखा दी हों, व उनकी बुद्धिमत्ता के आकर्षण में शान्तिभूषण व प्रशान्तभूषण जैसे लोगों की आभा ने भी लोगों केा पार्टी में आने के लिए प्रेरित किया, जाहिर है ऐसे तमाम लोग पार्टी मीटिंग में अपना दिमाग घर पर रखकर शामिल होने नहीं आते। वे फौजी की तरह यस सर की मुदा नहीं ओढ़ सकते और न तो वे यह चाहेंगे कि कोई उनसे फौजियों के कमांडर की तरह बर्ताव करे।

अन्य दलों में जो स्थिति है उसमें कांग्रेस गांधी परिवार की आभा से बाहर निकलने को तेैयार नहीं हैं इसलिए एक जुट हैं। जिस दिन गांधी परिवार इस पार्टी से अलग हो जाएगा उस दिन इस पार्टी में सिर फुटौव्वल की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन चूंकि यह पार्टी इतनी अनुभवी हो चुकी है कि इस सिर फुटौव्वल से यह अपने आपको बचा ही लेगी क्योंकि इसके अनुभव भिन्न हैं और कोई नरसिंहाराव फिर से पार्टी को गांधी परिवार से इतर संभाल ही लेगा। भाजपा की हालिया सिर फुटौव्वल हम आडवाणी जी आदि के प्रकरण में देख ही चुके हैं और यदि आर एस एस का दण्ड सिर पर न हो तो अहंकार यहां भी बहुत कुछ उलट पुलट करने को उतारू है। शेष माया मुलायम ममता बीजू जयललिता लालू नीतिश चैटाला ठाकरे पवार नायडू आदि की लंबी कतार उनकी व्यक्तिगत घरौंदे जैसी पार्टियां हैं जहां परिवार नहीं तो पार्टी खत्म।

अन्ना आन्दोलन से उपजी आप में केजरीवाल द्वारा दूसरों को दरकिनार करना इस पार्टी को सबसे महंगा पड़ने वाला है और यदि ऐसा हुआ तो आजकल शादियों में बारात जब दुल्हन के घर पहुंचती है तो आखिर में एक पटाखा बजाया जाता है जिसमें साठ सत्तर विस्फोट होते हैं जो एक एक कर आकाश में जाते है और राकेट सी अपनी चमक बिखेरकर खत्म हो जाते हैं। इन्हें देखने के लिए उत्सुकता से सबकी आंखें इनकी ओर ही लगी रहती हैं और सभी इसका आनन्द उठाते हैं। विदित हो कि कभी अगर ये पटाखा अराजक हो जाये तो भारी नुकसान भी देता है। आप में भी यह संभव है। लोग तालियां लिये बैठे हैं कि कब ये खत्म हों और हम अपने उन बयानों को सही ठहरायें जिसमें हमने कहा था कि ये तो चार दिन की चांदनी है। आप का यह कर्तव्य है कि उन विपक्षियों को अपनी दुर्गति पर ताली बजाने का मौका न दें।

यह सही है कि सत्ता प्रमुख और पार्टी प्रमुख यदि एक हो तो पार्टी मजबूत रहती है जैसे कांगे्रेस में कभी इंदिरा गांधी के जमाने में हुआ करता था। और हालांकि विगत यूपीए सरकार में ऐसा नहीं हुआ तो भी सरकार तो परिवार ही चलाता था। इसलिए केजरीवाल पार्टी को एक रखने के तौर पर संयोजक भी बने रह सकते हैं लेकिन नैतिकता के उच्च मानदंड स्थापित करने का दावा करने वाली पार्टी के लिए यह आसान काम नहीं है। और जहां हर नेता अपना एक अलग और स्वतंत्र चिंतन करने में सक्षम हो वहां वह हां जी हां जी की संस्कृति को इतनी आसानी से नहीं अपना पायेगा। केजरीवाल कई नौकरियों को धता बताकर सी एम बने हैं तो कइ्र्र नौकरियों छोड़ने का प्रतिफल भी वे अपनी मेहनत के बूते पा चुके हैं सी एम बनकर। लेकिन यहां कई अन्य भी ऐसे कार्यकर्ता हैं जो अपनी अपनी नौकरियां या व्यवसाय छोड़कर अपनी प्रतिफल की प्रतीक्षा कर रहे हैं। निश्चित ही इस सेवा भाव के फल की अपेक्षा उन्हें भी होगी। यहां दिल्ली की जनता के धैर्य की दाद देनी होगी जो आराम से केजरीवाल सरकार के कर्तृत्व की प्रतीक्षा कर रही है। हालांकि कम से कम एक साल बाद ही किसी सरकार की समीक्षा शुरू होनी चाहिये इसलिए यह धैर्य भी जरूरी है।

कांग्रेस से मोहभंग व मोदी सरकार से तुरन्त फल न मिलने से हताश दिल्ली की जनता के पास चुप बैठने के अलावा कोई उपाय भी नहीं है और पानी तो फ्री मिल ही रहा है और बिजली भी सस्ती हुई है जैसे भी हुई हो।लेकिन स्टिंग स्टिंग के खेल में फंसी इस पार्टी में धीरे धीरे कहीं अविश्वसनीयता इस कदर न बढ़ जाये कि लोग आपस में ही एक दूसरे को शक की निगाह से न देखने लगें कि कहीं सामने वाला उनका स्टिंग तो नहीं कर रहा है। और शक तो वैसे भी लाईलाज है। केजरीवाल के स्टिंग उद्घोष से जनता ने कितनी शिक्षा ली यह तो नहीं पता लेकिन कार्यकर्ताओं केा यह अहसास हो चला है कि उनका कोई अस्तित्व नहीं है यदि उन्होंने पार्टी लाईन से हटकर कुछ भी बयान दिया या स्वतंत्र कुछ विचार प्रकट किया तो। तो निश्चित ही अब और भी बहुत से लोग स्टिंग करते दिखें कि कब कहां पता नहीं काम आ जाये और इसीलिए लोग बोलने से पहले चार बार सोचेंगे कि कहीं स्टिंग का शिकार न हो जायें। लेकिन इस प्रकार से कोई पार्टी अपनों पर ही अविश्वास करके और खुद अविश्वास का शिकार होकर कैसे काम कर पायेगी, देखना होगा। और हां, अब जिस तरह से दोनों गुटों में जो तीर चले हैं और जो गांठें पड़ गई हैं वे खत्म न होंगी क्योंकि ये कड़वाहट निकाले नहीं निकलेगी। लेकिन उम्मीद करनी चाहिये कि केजरीवाल इसे संभाल लेंगे। एबीपी न्यूज के बारह सौ लोगों पर किये गये तथाकथित सर्वे में अभी भी साठ प्रतिशत लोगों की पसंद केजरीवाल हैं। बधाई।

डाॅ द्विजेन्द्र, हरिपुर कलां, देहरादून

डॉ. द्विजेन्द्र वल्लभ शर्मा
आचार्य - संस्कृत साहित्य , सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय , वाराणसी 1993 बी एड - लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ , नयी दिल्ली 1994, एम ए - संस्कृत दर्शन , सेंट स्टीफेंस कॉलेज , नयी दिल्ली - 1996 एम फिल् - संस्कृत साहित्य , दिल्ली विश्व विद्यालय , दिल्ली - 1999 पी एच डी - संस्कृत साहित्य , दिल्ली विश्व विद्यालय , दिल्ली - 2007 यू जी सी नेट - 1994 जॉब - टी जी टी संस्कृत स्थायी - राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय , केशवपुरम् , दिल्ली 21-07-1998 से 7 -1 - 2007 तक उसके बाद पारिवारिक कारणों से इस्तीफा वापस घर आकर - पुनः - एल टी संस्कृत , म्युनिसिपल इंटर कॉलेज , ज्वालापुर , हरिद्वार में 08-01-2007 से निरंतर कार्यरत पता- हरिपुर कलां , मोतीचूर , वाया - रायवाला , देहरादून

2 thoughts on “अविश्वास की शिकार आप

  1. नयी पार्टी है अभी राजनीति सीख रही है …मुझे ऐसा लगता है …इसे राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होने में समय लगेगा

  2. अच्छा लेख. आआपा के बारे में एक शेर की पंक्ति सही बैठती है- “एक भीड़ तो है, लेकिन ये कारवां नहीं है.”

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