मुक्तक/दोहा

एक मुक्तक

जरा गौर से देखो कोई बुला रहा अनन्त की ओर

कोमल काया इतनी सीढ़ी जिसका कोई ओर न छोर

मन कितना मतवाला देखो फिर भी हार नही मानी

भर उड़ान उड़ चला गगन में सोच कभी तो होगी भोर

— लता यादव 

लता यादव

अपने बारे में बताने लायक एसा कुछ भी नहीं । मध्यम वर्गीय परिवार में जनमी, बड़ी संतान, आकांक्षाओ का केंद्र बिन्दु । माता-पिता के दुर्घटना ग्रस्त होने के कारण उपचार, गृहकार्य एवं अपनी व दो भाइयों वएकबहन की पढ़ाई । बूढ़े दादाजी हम सबके रखवाले थे माता पिता दादाजी स्वयं काफी पढ़े लिखे थे, अतः घरमें पढ़़ाई का वातावरण था । मैंने विषम परिस्थितियों के बीच M.A.,B.Sc,L.T.किया लेखन का शौक पूरा न हो सका अब पति के देहावसान के बाद पुनः लिखना प्रारम्भ किया है । बस यही मेरी कहानी है

One thought on “एक मुक्तक

  • विजय कुमार सिंघल

    सरल शब्दों में अच्छा मुक्तक !

Comments are closed.