संस्मरण

मेरी कहानी – 11

एक बात मुझ में ऐसी रही है कि दादा जी, मेरी माँ या बड़े भाई जो भी कहें मैंने कभी इंकार नहीं किया था, हमेशा उन का कहना मान जाता था और उन का काम करने के लिए तैयार हो जाता था, कभी भी इंकार नहीं किया था। इस के अतिरिक्त बड़े भाई या छोटे भाई जब कुछ बड़े हुए तो अकड़ जाते थे। यही कारण रहा है कि मैंने बहुत काम किया। जो काम भी दादा जी कहते मैं करने लगता।

एक ऐतवार के दिन दादा जी मुझे अपने साथ गाए भैंसों को घास चराने के लिए चरागाह को ले गए. यह चरागाह गाँव से दो किलोमीटर होगी, यहां भी हमारी बहुत जमींन थी जिस पर इतने घने वृक्ष थे कि यह एक जंगल सा परतीत होता था। दूर दूर तक पेड़ों के सिवाए कुछ दिखाई नहीं देता था।  आज भारत में वृक्ष लगाने के लिए बहुत आवाज़ उठ रही है जो बहुत अच्छी बात है लेकिन अगर उस समय को आज से मुकाबला करूँ तो आज वृक्ष है ही नहीं। मैं सिर्फ अपने गाँव की ही बात करूँ तो बताना चाहूंगा कि राणी पर गाँव के इर्द गिर्द दूर दूर तक पेड़ ही पेड़ दिखाई देते थे। आज खेतों की सिंचाई ट्यूबवैल से होती है लेकिन उस समय  ट्यूबवैल नहीं थे , सिर्फ कुँएं ही होते थे जिनको बलद चलाते थे। कुएँ के इर्द गिर्द आम, जामुन और शहतूत  के पेड़ जरूर होते थे वोह भी बहुत बड़े बड़े, जिन की छाँव में अक्सर पशु बैठे होते थे। गर्मिओं के दिनों में किसान चारपाईओं  पर लेटे हुए होते थे। आम के पेड़ों पर इतने आम लगते थे कि लोग साल भर के लिए अचार बना लेते थे।  मेरी माँ  भी दो तीन बड़े बड़े मट्टी के बर्तन जिन को चाटी  कहते थे उनमें अचार भर कर रख लेती थी।

इसी तरह बहुत लोग चरागाहों के मालिक थे  हमारी चारागाह सब से बड़ी थी। जब मैं दादा जी के साथ गया तो वहां बहुत गाए भैंसें और उनके बछड़े बछड़ीआं थी और जो लोग उन पशुओं को चराने के लिए आए हुए थे उन में बहुत तो लड़के लड़किआं ही थे जिन्हें मैं जानता था। गाँव से चरागाह को जो रास्ता जाता था उन के एक किनारे पर पानी पीने के लिए एक खूही थी जिस पर रस्सी के साथ बाँधी हुई एक बाल्टी होती  थी। साथ ही एक बहुत बड़ा पीपल का पेड़ था। कहने की बात नहीं मुझे यह चराहगाह बहुत पसंद आई। एक दो दिन में मैं सब कुछ समझ गया। कुछ दिनों बाद मुझे गर्मिओं की छुटियाँ हो गईं और मैं अकेला ही गाए भैंसों को ले जाने लगा।

एक बात अवश्य लिखना चाहूंगा कि हमारी चरागाह में पलाश के पेड़ ही थे जिन को छिछरे भी कहते थे। यह पेड़ ऊंचे नहीं होते थे , ज़्यादा से ज़्यादा दस पंद्रह फ़ीट ऊंचे ही होते थे लेकिन इस के पत्ते चौड़े होते थे जिन से एक तरह के डिस्पोज़ेबल कप जैसे बनाये जाते थे जिन को दूने  (दोने) कहते थे। गाँव के चमार हम से सारे सीज़न के लिए पत्ते खरीद लेते थे और वोह हर रोज़ पत्ते तोड़ कर अपने घर ले जाया करते थे और घर के सभी सदस्य इकठे हो कर बहुत तेजी से दूने बनाते थे और किसी दिन वोह सभी  दूने अपने सरों पर रख कर फगवारे ले जाते थे और हलवाइओं और पकौड़े समोसे वालों की रेहडिओं वालों को बेच देते थे जिन में वोह दुकानदार पकौड़े छोले आदिक डाल कर  अपने ग्राहकों को देते थे।

इन गर्मिओं की छुटिओं में मैंने जो मज़े किये वोह ज़िंदगी में कभी भूल नहीं सकता और इन बातों को शब्दों में बयान नहीं कर सकता। सारा दिन हम इन पलाश के बृक्षों में घूमते रहते और अपने अपने पछुओं का भी ध्यान रखते। हम में कुछ लड़किआं भी थी। एक लड़की थी जिस का नाम मुझे याद नहीं वोह हर समय मेरे साथ रहती। मुझे बचपन से ही गाने का शौक था और जो पिताजी घर में गाया करते थे मुझे सभी याद थे और यह लड़की मुझे बार बार गाने को कहती थी। एक दफा वोह लड़की बीमार हो गई, उसे शायद बुखार हो गिया था, सारा दिन उस की गाए भैंसों को मैं ने संभाला क्योंकि गाए भैंसों का पता नहीं चलता था कि कब किसी और दिशा में चली जाएँ और लोगों की फसलों में ना चली जाएँ। शाम को जाकर उस लड़की को कुछ होश आई। वोह सभी को यही कहती रही कि गुरमेल ने उस की बहुत मदद की। यह बात वोह तब तक नहीं भूली जब तक कि हम ने  पशु चराने बंद नहीं कर दिए।

बहुत दफा बारिश होने के आसार नज़र आने लगते थे तो हम पलाश के पेड़ों के पत्ते जल्दी जल्दी तोड़ लेते और उन पत्तों को आपिस में जोड़ जोड़ कर छतरी जैसा बना लेते जिसे हम टोप कहते थे। बारिश आने पर वोह टोप हम अपने सरों पर रख लेते थे। इन बृक्षों में कभी कभी हम को सांप भी दिखाई देते लेकिन कभी किसी को इन साँपों की वजह से दुःख नहीं पहुंचा।  बहुत दफा हमको साँपों की उतारी हुई सकिन्न नज़र आ जाती जो पूरे सांप जैसी होती, उस को हम कंज कहते थे। हम उस कंज को उठा लेते और अपनी आँखों पर सात दफा लगाते क्योंकि हम ने सुन रखा था कि सांप की कंज को सात दफा आँखों पे छुहाने से आँखें दुखती नहीं या कोई भी आँखों की बीमारी नहीं होती।

       हर रोज़ दुपहर को खूही पर रोटी खाने के लिए हम सभी इकठे होते। सभी बच्चों के पास अपने अपने घरों से लाए परौठे ही होते थे और यह पराय दो ही होते थे। सूर्य ही हमारी घडी होता था, जब सूर्य आसमान में शिखर पर होता तो हम इस को रोटी वेला कहते थे। परौठों के साथ ज़्यादा तर आम का आचार और एक प्याज होता था। इस प्याज को अपने हाथ का मुक्का सा बना कर जोर से उस पर मारते , प्याज टूट जाता और हम इस प्याज को दोनों हाथों से  निचोड़ देते और उन में से कड़वा पानी निकल जाता और खाने लगते। बाद में खूही से पानी निकालते और एक दूसरे को पिलाते। ग्लास कोई नहीं होता था , सिर्फ हाथों का कप्प ही बना लेते थे।  एक बात मैं जरूर बोलूंगा कि जो स्वाद हमें इन परौठों , आचार और प्याज से आता था ज़िंदगी में कभी नहीं आया। इंग्लैण्ड में रहते इतनी किस्म के खाने खाए, इतने देशों के खाए मगर जो स्वाद उन आचार प्याज और पराठों में था कभी नहीं मिला। कभी कभी हम अपने साथ काले चने  और मक्की के भूने हुए दाने भी ले जाते थे। उन का अपना ही एक मज़ा होता था। हम सभी यह बाँट कर खाते। बहुत दफा मैं सोचता हूँ कि उस सादी खुराक में इतना मज़ा क्यों था, तो मुझे एक ही जवाब मिलता है कि जो इंसान सख्त मिहनत और लहू पसीना कर के खाता है उस को  स्वाद आएगा ही।
        इन पलाश के पेड़ों में कुछ कीकर के पेड़ भी होते थे। हम कीकर के पेड़ों पर चढ़ जाते और इन पेड़ों में से एक तरह का पानी निकलता था जो अक्सर जम जाता था, इस को गूंद (गोंद) कहते थे। हम वोह गूंद अपने नाखूनों से खुरच लेते। इस गूंद को पीसकर अक्सर हम दवात की स्याही में डालते थे जिस से स्याही बहुत चमकदार बन जाती थी। जब हम अपनी पट्टिओं पर लिखते थे वोह बहुत सुन्दर और चमकदार लगती थीं  सारा दिन हम कोई ना कोई खेल खेलते रहते। यहां तक मुझे याद है हमारे बीच में कभी लड़ाई झगडा नहीं हुआ। कभी कभी वृक्षों पर मधु मक्खियाँ भी होती थी। हम देखते रहते थे कि उस में शहद भर गिया है या नहीं। जब हमें यकींन हो जाता कि शहद इस में भरा हुआ है तो हम पहले वृक्ष के नीचे आग लगाते, उसका धुआं होने लगता तो मधु मक्खियाँ उड़ने लगतीं। हमें यकीन हो जाता कि मधु मखीआं अंधी हो गई हैं तो हम शहद निकालने लगते और खाने भी लगते जो बहुत मीठा और स्वादिष्ट होता था।
       एक दफा मेरे दोस्त के मुंह पर मधु मक्खियाँ ने डंक मार दिया  और उस का मुंह सूज कर बड़ा हो गया, हम उस पर हँसते रहे। जब सूर्य ढलने लगता तो हम अपने अपने पशुओं को इकठा करते। हमारे पशु भी जानते थे कि घर जाने का वक्त हो गिया और वोह खुद ही गाँव की ओर चलने लगते। सभी गाए  भैंसें थकी हुई होतीं और गाँव में पहुंचकर अपने अपने ठिकाने की ओर चल पड़तीं। पशुओं की जगह जिस को हम हवेली कहते थे उन में घुस कर अपने अपने ठिकाने पर जा कर खड़ी हो जातीं और हम उन के रस्सों  को खूँटी से बाँध देते और घर को चले जाते। कितनी देर तक मैंने पशु चराये मुझे याद नहीं लेकिन यह भी एक सुनहरी याद है।
(चलता…)

8 thoughts on “मेरी कहानी – 11

  • नीतू सिंह

    सर…..आपने लिखा है कि सब कहते थे साँप की केंचुली सात बार लगाने से आँखों की कोई समस्या नहीं आती है और आपने भी लगाई। क्या आप बता सकते हैं कि ऐसा कुछ सच में हुआ। क्या आपको आँखों की समस्याएं नहीं हुईं।

  • विभा रानी श्रीवास्तव

    बचपन कभी नहीं भूलता …… रोचक अध्याय

    • विभा बहन , सही कहा आप ने , बचपन की यादों का अपना ही एक मज़ा है , हौसला अफजाई के लिए धन्यवाद .

  • विजय कुमार सिंघल

    आपका कहानी की यह क़िस्त पढ़कर मजा आया. कभी कभी भैसा मैं भी चराता था, परन्तु नियमित नहीं, क्योंकि हम पढाई और खेलों पर अधिक ध्यान देते थे.

    • विजय भाई , धन्यवाद . किओंकि एक तो वोह वक्त ही कुछ और था , दुसरे हमारे खेत बहुत थे और दादा जी बाद में खुद खेती करने लगे थे तो मैंने और भी बहुत काम किया जो आगे जा कर लिखूंगा .

  • Man Mohan Kumar Arya

    आपने भारतीय ग्रामीण जीवन का सजीव चित्रण किया है। प्रायः भारत के सभी गावों में उनदिनों इसी प्रकार का जीवन होता था। मुझे भी अपनी माँ के गाँव डोईवाला का ध्यान है। हम गर्मी की छुटियों में वहां जाते थे। मक्की के खेतों में टांड पर बैठ कर भुट्टे भून कर खाते थे और चिड़ियों वा पक्षियों को उड़ाने के लिए जोर जोर से आवाजे किया करते थे। छुट्टी बीत जाने पर घर लौटने का मन नहीं करता था। बचपन में हमारे घर पर बकरियां थी। बकरी का दूध मुझे बहुत अच्छा लगता था और जितना मिल जाए पीता था। बकरियों को कई बार पास के जंगल में ले जाकर चराया है। अब वह जंगल समाप्त हो गएँ हैं। बस यादें ही बाकी हैं जो आपकी आत्म कथा पढ़कर ताजा हो गईं. आज की किश्त पढ़कर खूब आनंद आया। हार्दिक धन्यवाद।

    • मनमोहन जी , धन्यवाद . आप तो जानते ही हैं कि वोह समय कुछ और था . बक्क्रिआन हमारे गाँव में भी बहुत लोग चराया करते थे . किओंकि बक्र्याँ अक्सर ब्रिक्षों के पत्ते खाती हैं तो उस समय दरख्त बहुत हुआ करते थे . जो गाँव वोह था अब है नहीं . किओंकि ब्रिक्ष बहुत होते थे और घास के मैदान भी बहुत होते थे तो नैचुरली गाए भैंसें और बक्र्याँ भी होंगी . मनमोहन जी जो आप ने देखा है या मैंने देखा है वोह इतहास है जो हमें लिखना भी चाहिए ताकि आने वाली पीडीयाँ पड़ें कि उन के बजुर्ग किया थे . हौसला अफजाई के लिए धन्यावाद .

      • Man Mohan Kumar Arya

        आपकी टिप्पणी पढ़कर अच्छा लगा। धन्यवाद।

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