जो भी हुआ, गलत हुआ

क्रिकेट के विश्व कप का खुमार भारतीय जनमानस से उतर चुका है. भारतीय टीम अब घर लौट चुकी है. राष्ट्र धर्म और अकूत मनोरंजन वाला महंगा खेल ही भारतीयों में राष्ट्रधर्म की मदिरा पिलाता है. भारत जब तक जीतता रहता है, खिलाड़ियों की खूब प्रशंशा होती है, पर हारने के बाद आक्रोश भी वैसा ही दीखता है…. खैर सायना नेहवाल ने यह कमी पूरी कर दी… ऐसा कारनामा करने वालीं वह भारत की पहली महिला खिलाड़ी भी बन गई हैं. इंडियन ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में पहुंचने के साथ ही वह नंबर एक रैंकिंग के काफी करीब आ गई थीं.उसने वर्ल्ड चैंपियन कैरोलिना मैरीन को हराकर यह मुकाम हासिल कर ली. सेना नेहवाल को आज भारतीय जनमानस तहेदिल से बधाई दे रहा है.
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विश्व कप का खुमार भले ही भारतीय जन-मानस से उतर चुका है. पर आम आदमी पार्टी के अन्दर मचे घमासान का रोमांच भी कम नहीं चल रहा. स्टिंग का पाठ पढ़ाने वाले खुद ही स्टिंग का शिकार हो गए. फोन पर गुस्से में ऐसी भाषा बोल गए जिसे असंसदीय कहा गया और केजरीवाल ने इतने दिनों की कमाई हुई खुद की इज्जत को धूल में मिला दिया. उन्होंने जो चाहा था, कर के दिखा दिया. उनके पास समर्थकों की फ़ौज है, पर आम कार्यकर्ता इन सब के लिए तैयार तो नहीं था. उसे अपने नेता पर गर्व था, पर अब वह शर्म महसूस कर रहा है. इसे ही कहते हैं शायद पावर का अहंकार, दंभ और हिटलर शाही.
आपकी आईआईटी की पृष्ठभूमि, आपका आम आदमी की तरह कपड़े पहनना और वैसे ही उठना-बैठना, ये सब उन्हें आश्वस्त करता था. मगर पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम ने सब कुछ बदल दिया है. जिस तरह आपकी पार्टी में एक के बाद एक स्टिंग हुए और उनमें खुद आपको अपने साथियों के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते सुना और फिर जैसी अलोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाकर योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी के विभिन्न पदों से निकाला गया, यह सब देखने के बाद देश भर के नौजवान वॉलंटियरों की आंखों के आगे जल रही उम्मीद की लौ बुझ सी गई है.
हर समय मीडिया में बने रहने वाले अरविन्द केजरीवाल अब मीडिया के सामने आने से कतराने लगे. अपनी बात को ट्वीट कर भी नहीं जाहिर किया. कुमार बिश्वास भी २८ तारिख की घटनाक्रम में लगभग शांत ही दिखे. संजय सिंह और मनीष सिसोदिया मीडिया को ब्रीफिंग देते रहे पर सवालों से कतराते रहे. सारा मीडिया ग्रुप और राजनीतिक विश्लेषक अरविंद केजरीवाल के इस आत्मघाती कदम से चिंतित दिखे. आखिर क्या हो गया है, इस अधिनायकवादी नेता को? वो केवल अपने आसपास चापलूसों का गिरोह ही रखना चाहता है? जो उसका विरोध करेगा, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा.?
अब्राहम लिंकन ने कहा था कि लगभग हर आदमी मुसीबतों का सामना कर सकता है, लेकिन अगर आपको किसी के चरित्र की असली परीक्षा लेनी हो, तो उसे पावर देकर देखो। तो हम यह क्यों न मानें कि पावर हाथ में आने के बाद यह आपके भी इम्तिहान की घड़ी थी और आप इसमें फेल हो गए. फेल इसलिए क्योंकि अगर आप चाहते तो अपने अहम और अहंकार को पीछे रख, पार्टी के हितों को आगे रखते और कोई ऐसी राह निकालते कि यादव और भूषण भी साथ ही बने रहते. आपके पास एक बड़ा, नि:स्वार्थी और दूरदर्शी नेता बनने का ऐतिहासिक मौका था, जिसे आपने गंवा दिया.
प्रश्न यही उठता है कि क्या अब भारतीय जनता कोई नयी राजनीति के बारे में सोच सकती हैं क्या? लोकनायक जयप्रकाश के आंदोलन के बाद जनता पार्टी, राष्ट्रीय मोर्चा, तीसरा मोर्चा का हस्र लोगों ने देखा हुआ है, अब अन्ना आंदोलन से जन्मे आम आदमी पार्टी का अंजाम भी वही हुआ ऐसा लग रहा है. ज्यादा जोगी मठ उजाड़. सभी पढ़े-लिखे लोग, राजनीति से दूर रहने वाले एक राजनीतिक पार्टी बनाते हैं. ईमानदारी और पारदर्शिता का दम भरते हैं. जनलोकपाल का सपना दिखाकर भ्र्ष्टाचार को जड़ से समाप्त करने का दवा करते हैं …. एक बार नहीं, तो दुबारा अविश्वसनीय, अकूत बहुमत पाकर अहकार के वशीभूत हो जाते हैं, जबकि खुले मंचों से इंसान का इंसान से भाईचारा का सन्देश देते हैं. जनता की हक़ की बात करने वाले, पारदर्शिता की बात करने वाले, शुचिता की बात करने वाले, वही सब कुछ करने लगते हैं, जो पूर्व की पार्टियां करती रही हैं. दूसरी पार्टियां कुछ साल कुछ पारी झेल पाई, पर यह तो पहली पारी में ही हिचखोले खाने लगे हैं. पहली बार ४९ दिन का सत्तासुख और अब तो पांच साल के लिए जिम्मेदारी मिल चुकी है. कुछ अच्छा कर रहे थे, ऐसी खबरें आ रही थी. पर अब जो मैसेज पूरे देश को गया है, क्या यह पार्टी दूसरे राज्यों में अपने पैर फैला सकेगी? क्या यह नयी राजनीति का बीजारोपण कर पाएगी या दिल्ली तक एक क्षेत्रीय पार्टी बन कर रह जाएगी. दिल्ली की समस्यायों से निपटना भी इनके बस की बात तो है नहीं, जब तक केंद्र इन्हे मदद नहीं करेगा?…. और अब इन हालातों में केंद्र इन्हे क्यों मदद करेगी. इन्होने अपने कुछ मजबूत खम्भे को हटा दिया है,बाकी खम्भे कब तक ठीक रहेंगे. इन सब अंतर्कलहों से ऊब कर अंजलि दमानिया और अब मेधा पाटेकर ने भी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया है. बहुत सारे कार्यकर्ता निराश हैं. कोई यह नहीं बता रहा है कि आखिर पार्टी के पदों से हटाए गए लोगों की गलती क्या थी? पार्टी विरोधी गतिविधि अगर थी, तो उसके प्रमाण कहाँ हैं? उन्हें भी अपनी बात रखने, स्पष्टीकरण देने का मौका दिया जाना चाहिए था पर यह तो जैसे पहले से तय था और जो कुछ नाटक किया गया उसे सबने दिखावा माना. उनके चाँद समर्थकों को छोड़कर …
केजरीवाल के बंगलोर से लौटने के बाद ऐसा लगा था, मामला सुलझने की ओर है… प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव थोड़े नरम हुए थे, लेकिन अरविंद तो जैसे अपनी जिद्द के अनुसार पहले ही फैसला ले चुके थे और और उसने अपने फैसले को अमलीजामा पहना दिया.
राजनीति में इतना गुस्सा भी जायज नहीं है, यह उनके राजनीतिक अपरिपक्वता को ही दर्शाता है. वैसे भी प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, प्रोफ़ेसर आनंद कुमार और अजित झा के समर्थक इतनी जल्दी हार मान जायेंगे ऐसा लगता नहीं है. कोई न कोई रणनीति फिर बनेगी कुछ और सदस्य टूटेंगे उनके साथ आएंगे या वे फिर एक नयी पार्टी बनाएंगे अभी कुछ भी कहाँ जल्दबाजी होगी लेकिन जो भूचाल आया है उसे शान हो गया समझाना भी भूल होगी मेरे ख्याल से .
एक पपीते का पेड़ एक साल में इतना बड़ा हो जाता है कि फल भी देने लायक हो जाता है.दूसरे साल भी वह फलता है पर तब उसके फल छोटे हो जाते हैं. पपीता का पेड़ दूसरे साल या दूसरे फल के बाद धराशायी हो जाता है…. वैसे अरविंद केजरीवाल को भी पपीता पसंद है. डॉ. उसे पपीता खाने की सलाह भी देते हैं और लोग उसे गिफ्ट में भी पपीता ही देते हैं. अब पपीते से इतना लगाव रखनेवाले आदमी की रचनात्मकता यही देखने में आई है कि ज्यादातर वे दो साल ही एक काम को बखूबी कर पाये हैं, उसके बाद रास्ता बदल लेते हैं. …पर पपीते के अंदर बीज बहुत होते हैं और उस बीज से पुन: नए पौधे तैयार होते हैं. एक परिवर्तन की हवा चली है. कांग्रेस को हरा भाजपा सत्ता में आई. यहाँ भी मोदी जी ही प्रधान नायक रहे और अपनी ही मनमर्जी फैसले लेते रहे. अपनी वक्तृत्वकला से लोगों को लुभाते रहे पर नौ महीनों के अंदर ही जनता ने उन पर भरोसा करना छोड़ दिया, फलस्वरूप केजरीवाल की आम आदमी पार्टी दिल्ली में सत्तासीन हुई …परिणाम सबके सामने है. अब आगे क्या होगा भविष्य के गर्भ में है या डार्विन के सिद्धांत के अनुसार अपने आप विकास होता है, होता रहेगा. या फिर गीता के अनुसार हम सब तो निमित्त मात्र हैं. जो होना है होकर ही रहेगा. सारे खेल का सूत्रधार अदृश्य रहकर अपनी कठपुतलियों को नचाता रहता है. चित्रगुप्त महाराज के पास सारा लेखा-जोखा है. या फिर कह सकते है, जनता ही जनार्दन का रूप होती है. लोकतंत्र की चाभी उसी के पास है, लेकिन वह करे तो क्या करे. जिसको चुनती है वही धोखेबाज निकल जाता है …इसलिए सहनशील बनो और सबकुछ सहते रहो. आम आदमी हो अपनी औकात में रहो. समरथ को नहीं दोष गुंसाईं .
भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित वयोवृद्ध लोकप्रिय नेता का कहना था- हम रहे न रहें यह देश रहना चाहिए और इस देश में लोकतंत्र रहना चाहिए. लोकतंत्र तो जिन्दा है. जितनी बार भी इसे दबाने की कोशिश हुई है यह और भी निखरे हुए रूप में प्रकट हुआ है.

– जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर