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सच्चे आध्यात्मिक श्रम से अभ्युदय व निःश्रेयस की प्राप्ति

मई दिवस पर ईश्वर ने मनुष्य को ऐसा प्राणी बनाया है जिसमें शक्ति वा ऊर्जा की प्राप्ति के लिए इसे भोजन की आवश्यकता पड़ती है। यदि इसे प्रातः व सायं दो समय कुछ अन्न अर्थात् रोटी, सब्जी, दाल, कुछ दुग्ध व फल आदि मिल जाएँ तो इसका जीवन निर्वाह हो जाता है। भोजन के बाद […]

कविता

प्रार्थना मुक्ति की

  वरदानों का अभिशाप भोगते आज तुम्हें भागते दौड़ते गर एक नाम याद आये तो कर देना एक प्रार्थना हो जाये शायद उसकी मुक्ति…. पिता के मोहपाश ने बांध दिया फांस में अमरता की जंजीर में आत्मा को शरीर में बना दिया बंदी….. अब न वह जलता न डूबता है न स्मृति है न भूलता […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : अजब गजब सँसार हुआ

रिश्ते नाते प्यार वफ़ा से सबको अब इन्कार हुआ बंगला, गाड़ी, बैंक तिजोरी इनसे सबको प्यार हुआ जिनकी ज़िम्मेदारी घर की वह सात समुन्द्र पार हुआ इक घर में दस दस घर देखे अब अज़ब गज़ब सँसार हुआ कुछ मिलने की आशा जिससे उससे सबको प्यार हुआ व्यस्त हुए तब बेटे बेटी बूढ़ा घर में […]

कविता

मेरा मन सोचता है कि

  जब आया भूकंप नेपाल में पूरे उत्तर प्रदेश में अचानक प्राकतिक दुर्घटना घटी उसी पल जमीन फटी सजे संवरे सुसज्जित गृह खँडहर में बदल गये शमशान गृह में ही सारे शहर ही बदल गये मेरा मन सोचता है कि ये चुपचाप सा लेता हुआ युबा कौन है क्या सोचता है और क्यों मौन है […]

कविता

मज़दूर दिवस

०१ मई २०१५ , ‘मज़दूर दिवस’ पर सभी ईमानदार मेहनतकश इंसानों को समर्पित— मज़दूर दिवस, कब यह वक़्त बदलेगा- कब मज़दूर का चेहरा, कोई हँसता हुआ देखेगा, पर यह वक़्त वक़्त क्यों इसे, हर बार सताता है, क्यों मज़दूर का हँसता चेहरा, इसे नहीं भाता है, उसकी चार पल की खुशी इससे देखी नहीं जाती, […]

कविता

अहिवाती धरती

मै अहिवाती धरती हूँ, मुझे बेवा तो न बनाइये मेरा सुहाग है हरियाली, सूनी मांग तो न बनाइये मै ही माँ की ममता हूँ, हर जीव-जंतु की जननी हूँ श्रृंगार न मेरा रंजित हो, मुझे बंजर तो न बनाइये  मै धरती हूँ फलित कोख,  मुझे बंध्या तो न बनाइये इस सत्य-सनातन नारी को, कलुषित तो […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

महर्षि दयानन्द ने खण्डन-मण्डन, समाज सुधार व वेद प्रचार क्यों किया?

महर्षि दयानन्द ने सन् 1863 में दण्डी स्वामी प्रज्ञाचक्षु गुरू विरजानन्द से अध्ययन पूरा कर कार्य क्षेत्र में पदार्पण किया था। उन दिनों में देश में अज्ञान, धार्मिक व सामाजिक अन्घविश्वास, कुरीतियां व अधर्म इतना अधिक बढ़ गया था कि इन बुराईयों से मुक्त होने का न तो किसी के पास कोई उपाय था और […]

उपन्यास अंश

यशोदानंदन-५८

“राधा!” उद्धव के कंठ से अस्फुट स्वर निकला। “कौन, उद्धव?” राधा का प्रतिप्रश्न उद्धव जी ने सुना। गोपियों से बात करते-करते, उन्हें समझाते-बुझाते सूरज कब पश्चिम के क्षितिज पर पहुंच गया उद्धव जी को पता ही नहीं चला। राधा ने उद्धव जी के पास आने की आहट भी नहीं सुनी। उद्धव जी के अधरों से […]

आत्मकथा

आत्मकथा – दो नम्बर का आदमी (कड़ी 43)

पिछली कड़ियों में अपनी जापान यात्रा का पूर्ण विवरण दे चूका हूँ। जापान से लौटने वाले दिन सड़क पर जाम के कारण मेरी उड़ान छूट गयी थी। अगली उड़ान 2 दिन बाद थी। वे 48 घंटे मैंने जापान के नारीता एयरपोर्ट पर बैठे हुए किस प्रकार बिताये, यह पूरा विवरण भी पिछली कड़ी में दिया है। दो […]