Monthly Archives: May 2015

  • लुटेरे

    आज प्रदीप पहली बार चोरी करने के इरादे से , रात के काले अँधेरे में, घर से बाहर निकल पड़ा । वो कोई पैदाइशी चोर नहीं था, पर जिंदगी की बेरुखी और गरीबी ने उसे इस...


  • हूक

    हूक

    चीख बाहर नहीं आती आह! आह आती है , कसक सी उठती हैं किसी अपरिचित ने बांह पकड़ झिंझोड़ दिया मेरा सर्वस्व और कह रहा हो कितने डग भर लोगे मेरे बिन, टूटी इमारते मलबे के...


  • स्मृति के पंख – 23

    यह 1946 या 47 की बात है। वहाँ से भ्राताजी के खत आते। उनसे वह काफी परेशान से लगते जैसे रोजाना उनकी तकलीफ बढ़ रही है। मैंने भाई श्रीराम को भ्राताजी की खबर लेने भेजा। उन्होंने...


  • चक्रव्यूह !

    चक्रव्यूह !

      इस जिंदगी का क्या भरोसा कब शाम हो जाय , भरी दोपहरी में कब सूरज डूब जाय …. उम्मीद के पतले  सेतु के सहारे मकड़ी सा  आगे कदम बढ़ा रहे है और खुद के बुने...



  • कुछ मुक्तक

    कुछ मुक्तक

    (1) जीवन की आड़ी तिरछी राहों पर आगे बढ़ता चल बाधा से घबराना कैसा सोच समझ पग धरता चल जन काँटों को चुन एक तरफ कर समतल कर दे राहों को दुःखी हृदय में प्रेम जगा...