कविता

कुर्सी की महिमा

मैं हूँ कुर्सी महारानी
सुनो मेरी कहानी
हर तरफ हर क्षेत्र में
चलती मेरी मनमानी

मेरे कारण कितनों ने
खेली खूनों की होली
अपनों से भी तोड़वा दूँ रिस्ते
वो चीज हूँ मैं अलबेली

माँ की गोद ज्यादा आनंद
मेरी गोद में मिलता हरदम
मुझे पाकर हर मानव
भूल जाता अपना सब गम

इस यूग क्या हर यूग में
हुई मेरी ही चाहत
श्रीराम गये वन में
हुआ यूद्ध महाभारत

मेरे लिए तो औरंगजेब ने
मार दिया अपना सब भाई
हिटलर ने लाखों को मारा
कर दी दुनिया से लड़ाई

लक्ष्मी मेरे पैरों में बसती
सरस्वती का सेवक आता है
पर मेरे पास आते ही
दूर्गा रुप ले लेता है

मेरी गोद में बैठकर कितने
करते हैं मेरा अपमान
तोड़कर मेरे नियम-कानून
करते हैं मुझको बदनाम

अर्ज है मुझको चाहने वाले
रखें मेरी भी इज्जत
मेरी गोद में बैठकर जरा
करें मेरी भी हिफाजत

-दीपिका कुमारी दीप्ति

दीपिका कुमारी दीप्ति

मैं दीपिका दीप्ति हूँ बैजनाथ यादव की नंदनी, मध्य वर्ग में जन्मी हूँ माँ है विन्ध्यावाशनी, पटना की निवासी हूँ पी.जी. की विधार्थी। लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी ।। दीप जैसा जलकर तमस मिटाने का अरमान है, ईमानदारी और खुद्दारी ही अपनी पहचान है, चरित्र मेरी पूंजी है रचनाएँ मेरी थाती। लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी।। दिल की बात स्याही में समेटती मेरी कलम, शब्दों का श्रृंगार कर बनाती है दुल्हन, तमन्ना है लेखनी मेरी पाये जग में ख्याति । लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी ।।

One thought on “कुर्सी की महिमा

  • विजय कुमार सिंघल

    बढ़िया ! आपने कुर्सी की राजनीति की झलक दिखाई है!

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