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चींटी और टिड्डा की कहानी का भारतीय संस्करण

चींटे (ant) और टीडे की कहानी बाय मेरी जुबानी –
ओरिजिनल स्टोरी –
चीटा सारी गर्मी, कुम्हला देने वाली गर्मी में अपना घर बनाता है, बड़े जतन से खाने का इन्तेजाम करता रहता है, उसे सर्दियों के लिए सहेज के रखता जाता है
और ये देख टीडा हँसता है के देखो चिंटा कैसे पगलाया हुआ है और यंही सोंच सारा बसंत और गर्मी हँसता, गाता,उड़ता, उछलता काट देता है
और जब सर्दी आती है तो चींटे के पास ठंढ से बचाने के लिए घर और खाने को खाना होता है और टीडे के पास ना तो घर होता ना ही खाना तो ठंढ में किकुर के मर जाता है…..
और अब इसका
इंडियन वर्जन –
चीटा सारी गर्मी कुम्हला देने वाली गर्मी में अपना घर बनाता है, बड़े जतन से खाने का इन्तेजाम करता रहता है,
और ये देख टीडा हँसता है के देखो चिंटा कैसे पगलाया हुआ है और यंही सोंच सारा बसंत और गर्मी हँसता उछलता काट देता है
और जब सर्दी आती है तो चींटे के पास ठंढ से बचाने के लिए घर और खाने को बेहतरीन खाना होता है और ठंढ से कंकपाता टीडा एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाता है और लोकतांत्रिक तरीके से ये जानना चाहता के चींटे को अच्छा खाना और सर्दी बचने के लिए गरम घर की अनुमति क्यों?? जबकि दुसरे यंहा ठंढ और भूख से मर रहे हैं….
NDTV, BBC, CNN और बाकी की मिडिया शो शुरू करती है एक तरफ भूख और ठंढ से बेहाल टिड्डे की तस्वीर तो दूसरी तरफ चींटे की घर की आरामदायक तस्वीरे और खाने से भरे टेबल की तस्वीरे….
पूरा देश इस बेमेल तस्वीर से अचंभित/सन्न/भौंचक रह जाता है, बुद्धिजीवी बहस छेड़ देते हैं के कैसे इन बेचारे गरीब टिड्डे को भूखो मरने को छोड़ दिया गया…..
अरुंधती रॉय इसके खिलाफ चींटे के घर के बाहर पर्दर्शन करती है, मेघा पाटकर कुछेक मर रहे टिड्डो को संग ले कर अन्न सन्न पे बैठ जाती है, मायावती इसे कमजोरो और पिछरो पे हो रही जुल्म घोषित करती है तो इन्टरनेट, टिड्डा समर्थको के आन लाइन पिटीशन से पट (भर) जाता है, आनन फानन केरला में CPM एक बिल लाती है के चींटो को गर्मी में मेहनत ना करने दिया जाए ताकि समाज में समानता और एकरूपता बनी रहे, तत्कालीन रेल मंत्री हरेक ट्रेन में एक डिब्बा टिड्डो के लिए आरक्षित करने की घोसना करते हैं साथ में “टिड्डा रथ” नाम से एक ट्रेन चलाने की घोसना की जाती है ताकि टिड्डो को लोकतांत्रिक समरसता का अहसास हो सके, और आखिर में गठित न्यायिक समिति “Prevention of Terrorsim against Grasshoppers Act” (POTAGA) ड्राफ्ट करती है जो के तत्काल प्रभाव से शर्दियो के सुरुआत से लागू कर दी जाती है, संग ही प्रोत्साहन तौर पे शिक्षा मंत्री शिक्षा में और श्रम एवं रोजगार मंत्रालय रोजगार में टिड्डों के लिए आरक्षण का प्रावधान उपलब्ध कराते है….

इन सबके बिच चिंटा “POTAGA” के नियम एवं शर्तो को पूरा न कर पाता है और फाइन भरते भरते एक वक्त ऐसा आता है जब उसके पास कुछ न बचता आखिर में उसके घर को सरकार जब्त कर लेती है और उसे एक शाही समारोह में जो की BBC, CNN और बाकी के मिडिया हाउसेज के द्वारा आयोजित की जाती है, टिड्डे के हवाले कर दिया जाता है……
अरुंधती राय इसे “A TRIUMPH OF JUSTICE” कहती है…
रेल मंत्री इसे “सोशल जस्टिस” का नाम देते है
CPM इसे “REVOLUTIONARY RESURGENCE OF DEMOKRECY” कहते हैं (ऐज यूजुअल आर्यभट की औलाद जो ठहरे)
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कई साल बाद – चिंटा दुसरे मुल्क में ठौर की तलाश करता US पंहुच जाता है और अपनी वन्ही पुरानी म्हणत और लगन के बूते एक पुरे सिलिकन वैली का निर्माण कर डालता है, जो के बाद में US और उसकी आर्थव्यवस्था के लिए काफी फायदेमंद रहती है….
दूसरी तरफ इंडिया में तमाम समर्थित नीतिओ, एक्टो और आरक्षण के बावजूद टिड्डे अब भी मरते ही रहते है, और मेहनती चिटो को छोड़ने और कामचोरों टिड्डो को पालने के चक्कर में इंडिया एक डेवेलपिंग कन्ट्री बन के रह जाता है

7 thoughts on “चींटी और टिड्डा की कहानी का भारतीय संस्करण

  1. देश की यही विडम्बना है आलसी और कामचोर मौज कर रहे हैं और काम करने वाले देश छोड़ के जा रहे हैं।

  2. देश की यही विडम्बना है आलसी और कामचोर मौज कर रहे हैं और काम करने वाले देश छोड़ के जा रहे हैं।

  3. थोड़ा सा भाषा पर ध्यान दें तो आप एक अच्छे लेखक हो सकते हैं। लेख को साइट पर डालने से पहले दो तीन बार पढ़ें, वर्तनी की गल्तियाँ अपने आप पकड़ में आ जाएँगी। बहुत अच्छा व्यंग्य है। किसी का नाम न लें तो विवादों से भी बचे रहेंगे ।

  4. बेहतरीन व्यंग्य,सारे चींटे की तरह मेहनत करें तो कोई भूखा न मरे,पर ये टिड्डे तो हमेशा चींटों को पीछे खिचने में ही लगे रहते हैं।मिडिया भी इनकी हाँ में हाँ मिलाता हैं नतीजा ये आगे बढ़ने की बजाय और पिछड़ जाते हैं

  5. वर्तनी की तमाम गलतियों के बावजूद आपने एक करारा व्यंग्य लिखा है, जो सत्य है. बधाई !

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