संस्मरण

मेरी कहानी – 27

कुछ दिन हुए मेरा दोस्त बहादर सिंह भारत से हो कर आया है। इस ऐतवार को वोह मुझे मिलने आया था। मैंने उसे भारत का हाल चाल पुछा तो कहने लगा ” गुरमेल, वैसे तो मैं ज़्यादा शिमले ही रहा लेकिन कुछ घंटों के लिए राणीपर भी गिया था। गुरमेल, राणीपर अब बहुत बदल गिया है और मुझे कोई नहीं पहचानता। जो हम पीछे बच्चे छोड़ कर आये थे अब बूढ़े बने हुए हैं। मुझे सिर्फ दो आदमी ही मिले, एक बाबू राम मास्टर का लड़का राम सरूप और दूसरा गियान चंद। गियान चंद की दूकान पर मैं गिया। गुरमेल ! तू अब गियान चंद को पहचान नही सकता, बहुत बूढ़ा हो गिया है, उस के पोते दूकान में काम कर रहे थे। मैंने गियान चंद से पुछा, गियान चंद ! मुझे पहचानता है ? तो कहने लगा, चेहरा तो कुछ जाना पहचाना सा लगता है लेकिन मुझे याद नहीं आता। फिर मैं ने बताया कि मैं बहादर हूँ, तो मेरे पैर छूने की कोशिश करने लगा, लेकिन मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और गले लग गया। बहुत बातें की और फिर उस ने तेरे बारे में पुछा तो मैंने सब कुछ बताया। फिर मैं उस के पोतों से बातें करने लगा और बताने लगा कि किसी ज़माने में हम तेरे दादा के साथ इसी दूकान में गप्पें लगाया करते थे, तो उस के पोते भी बहुत खुश हुए। कुछ देर के बाद मैं चला आया। ”

बहादर  चला गिया और मैं खो गया पुरानी यादों में.

भारत को अभी आज़ादी मिली ही थी और मैं छह-सात वर्ष का रहा हूंगा और ज्ञान मुझ से दो वर्ष बड़ा होगा. ज्ञान के पिता जी तीन भाई थे. दो भाई अपने घर में एक मशीन से आइसक्रीम बनाया करते थे, उन के नाम थे रामा और चानण. आइसक्रीम लेकर वे अपने गांव और दूसरे गांवों में जाते थे. उन के पास दरख्तों के पत्ते होते थे जिन पर, वे छुरी से काट कर ग्राहकों को आइसक्रीम देते थे. यह बात लिखने का एक ही मकसद है कि, जिस काम को आम लोग छोटा समझते थे वही काम उन के लिए रोज़ी-रोटी तो थी ही, मज़े की बात यह थी कि इस आइसक्रीम से वे किसानों से ज़्यादा पैसे कमा लेते थे, ख़ास कर जब गेहूं का सीज़न होता तो, उन की सेल इतनी हो जाती कि, किसानों से ज़्यादा गेहूं उन के घर आती.

ज्ञान के पिता जी एक कपड़ा बिछाकर हमारे स्कूल के बाहर एक चारपाई पर एक छोटी-सी दुकान चलाते. चारपाई पर उस स्कूल की सभी चीजें जैसे कापियां, पैसिलें, इंक, निब, तख्तियां जिन को हम फट्टी कहते थे और जो लिखने के काम आती थीं और स्लेटें आदि होती थीं. इस के अलावा खाने के लिए चने की हल्दी-रंगी दाल, फुलीयां, गुड़, मरुंडा, संतरे की शक्ल की स्वीट्स और भी बहुत-सी खंड की गोलियां आदि.” होनहार बिरवान के होत चीकने पात.” इस सारे काम में ज्ञान अपने पिता जी का साथ देता था. स्कूल आने से पहले वह चारपाई सर पर रख कर ले आता, फिर दुबारा घर जा कर दुकानदारी का सामान ले आता. इस के बाद स्कूल जाता. इसी तरह शाम को पिता जी की मदद करता. पिताजी का नाम था हरिया. दो तीन वर्षों बाद हरिया ने गांव में आहलूवालिओं के मोहल्ले में एक छोटी-सी दुकान ले ली जिस का, साइज़ ज़्यादा-से-ज़्यादा दस फ़ीट बाई आठ फ़ीट होगा.

दुकान लेने के बाद ज्ञान का काम और बढ़ गया. जब हम छठी कलास में  पढ़ते थे तो, ज्ञान ने स्कूल छोड़ दिया. उस ने बाइसिकल चलाना सीख लिया था और वह हर रोज़ शहर जाता और दुकान के लिए सौदा ले आता. धीरे-धीरे दुकान बढ़ती गई और काम भी बढ़ गया. हरिया कुछ बीमार रहने लगा था , इसलिए सारा भार ज्ञान के कंधों पर आ पड़ा. गियान से बड़े दो भाई और थे लेकिन वोह दूकान में रूचि नहीं रखते थे और कहीं और काम करते थे। ज्ञान रात को काफी देर तक दुकान खुली रखता था, और रात के समय ही हम कुछ दोस्त ज्ञान की दुकान पर आ जाते और ज्ञान के साथ गप्पें लगाते. ज्ञान ने दुकान के तीनों तरफ शैल्फें लगा ली थीं और सभी सामान से भरी पड़ी थीं. उसकी दुकान में स्कूल के बच्चों के सामान के अलावा औरतों के सिंगार की चीज़ें भी थीं. फ़िल्मी गानों की छोटी-छोटी किताबें होती थी जो, रात को हम पढ़कर गाते. ज्ञान मिठाई भी रखता था जो, सिर्फ बर्फी, बेसन मीठी सीरनी, नमक वाली सीरनी और लडू तक ही सीमित थी. अक्सर हम कुछ-न-कुछ मिठाई खरीदते और खाते रहते. गियान खुद भी मठाई खाने लगता और हम हंस पड़ते और कहते ” गियान ! तुझे मुनाफा क्या होता है?”

कभी-कभी हमारे एक टीचर हरबंस सिंह भी आ जाते. एक दिन वे आए और फ़िल्मी गानों की कॉपियों को ध्यान से देखते रहे, फिर बोले, ”अरे ज्ञानचंद, यह वनत कौन सी फिल्म है ?, कभी सुनी नहीं.” मैंने वह कॉपी उठा ली और गाने पढ़ने लगा. मैंने कहा, ”मास्टर जी ! यह फिल्म का नाम गलत लिखा हुआ है, दरअसल यह वचन फिल्म है.” फिर मैंने मास्टर जी को एक गाना गा कर सुनाया जिसके बोल अभी तक मुझे याद हैं.” जब लिया हाथ में हाथ निभाना साथ मेरे सजना, देखो जी हमें छोड़ ना जाना, यह साथ कभी ना छूटे चाहे दुश्मन बने ज़माना.”

अब ज्ञान ने एक नया काम शुरू कर दिया. उस ने एक सोडा वाटर बनाने की छोटी-सी मशीन ले ली, जिस में पुराने टाइप की बोतलें भरी जाती थीं. बोतल के गले में एक गोली सी होती थी जो गैस के प्रैशर से बोतल को बंद कर देती थी. ज्ञान बड़ी-बड़ी बालटियों में पानी डालता, फिर उस में शक्कर डालता, कोई इसेंस डालता, संतरा, रोज़ या लेमोनेड का. फिर सारी बोतलें भरता. इस में हम भी कभी-कभी उस का साथ देते थे. फिर वह तीन बोतलें मशीन में डालता, फिर एक हैंडिल से ज़ोर-ज़ोर से मशीन को घुमाता, गैस का सिलिंडर साथ ही होता था. फिर वह गैस को खोलता, एक शूं-शूं की आवाज़ आती, कुछ देर और मशीन को घुमाता, फिर बोतलें निकाल कर तीन और डाल देता. सारी बोतलें बक्सों में रख देता. कभी-कभी मन में आता है, कितना मेहनती था ज्ञान. गर्मियों के दिनों में ज्ञान सुबह उठ कर शहर को जाता और बर्फ का एक बड़ा बक्सा बाइसाइकिल पर रख कर ले आता. गर्मियों के दिनों में सोडा वाटर की सेल बहुत हो जाती थी.

हम कुछ दोस्त शहर के एक स्कूल में मैट्रिक में दाखिल हो गए और ज्ञानचंद की छोटी उमर में ही शादी हो गई. हम भी अपनी स्टडी में मसरूफ़ हो गए लेकिन, ज्ञान की वह दुकान उसके लिए एक गोल्ड माइन बन गई. उसी दुकान से उस ने अपनी तीन बहिनों की शादियां कीं. उसके तीन बेटे हुए, उन को पढ़ाया-लिखाया. हम भी इंग्लैण्ड आ गए थे लेकिन, जब भी वापिस जाते गले लग कर मिलते, पुरानी बातें याद कर के हंसते, ख़ास कर ”ज्ञानचंद !! वनत कौन सी फिल्म है, कभी सुनी नहीं.” इस पर हम हंस पड़ते. हमारी शादियां भी हो गई थीं लेकिन, उस वक्त तक ज्ञान के बेटे उसका हाथ बंटाने लग गए थे.

ज्ञान में एक बात बहुत अच्छी थी, वह गांव के हित में बहुत भाग लेता था. बचपन से  एक मंदिर देखते आये थे जो पीपलों के बीच होता था और ज्ञान की दुकान के करीब ही था. अक्सर बच्चे उस में जा कर खेलते रहते. उस में कोई दरवाज़ा नहीं था, कुत्ते-बिल्लियां वहां जा कर सो जाते थे. इस मंदिर के बारे में एक  दंत कथा चली आ रही थी कि  हमारे गांव में एक संत आ कर रहने लगा. वह जब बूढ़ा हो गया तो किसी ने गाली बक दी. नाराज़ हो कर उस ने कहा कि, जब वह मरे तो, हमारे गांव का कोई आदमी उसे हाथ न लगाए बल्कि, पड़ोस के गांव वाले उस की लाश को नमक में रख इस जगह पर उसका संस्कार कर दें.

जब वह परलोक सिधारा तो हमारे गांव वालों ने पछतावे के कारण वहां एक छोटा-सा मंदिर बनवा दिया जो, धीरे-धीरे खराब होता गया. दस-बारह वर्ष पहले ज्ञानचंद ने लोगों से पैसे इक्कठे किये, कुछ अपने से डाले और मंदिर फिर बनवा दिया. अब इस मंदिर में एक पुजारी है और गांव के हिन्दू-सिख वहां जाते हैं. ज्ञान की हिम्मत से फिर से जंगल में मंगल हो गया है. ज्ञान के बच्चों की शादियां हो चुकी हैं, बेटे और पोते पोतीआं हो चुक्के हैं,ज्ञान का परिवार फल-फूल रहा है. जो उस ने छोटा-सा पेड़ लगाया था, अब उस पे फलों के ढेर लग रहे हैं. बहुत वर्षों से मैं गांव जा नहीं सका हूँ लेकिन, पांच  वर्ष पहले मेरी पत्नि और बेटा गांव गए थे और ज्ञान की वीडियो बना कर लाये थे. है तो वह एक मिनट की लेकिन, उस की याद के लिए वही काफी है।
जब मैं २००३ में गया था तो उस वक्त गियान चंद की दूकान पहले से बड़ी थी और काफी सेल थी लेकिन वोह वातावरण नहीं है जो पहले हुआ करता था। तब गियान चंद की दूकान के सामने खुला मैदान हुआ करता था और एक तरफ सोहन लाल डाक्टर की सर्जरी होती थी। अब सोहन लाल भी कब का यह दुनिआ छोड़ गिया है और सर्जरी खत्म हो चुक्की है।  अब बहुत दुकाने बन गई हैं और गियान चंद की दूकान ऐसे लगती है जैसे एक तंग गली में हो। कुछ भी हो गियान चंद बूढ़ा है लेकिन सुखी है।

चलता…. 

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.

10 thoughts on “मेरी कहानी – 27

  1. पूरी आत्मकथा का आज का भाग पढ़कर प्रसन्नता हुई। बड़ी खूबी से आपने पुरानी घटनाओं का सजीव चित्रण किया है। श्री ज्ञान चंद जी ने मेहनत से अपनी व अपने परिवार की जिंदगियों को सम्मुनत किया, यह प्रेरणाप्रद है। हार्दिक धन्यवाद।

    1. मनमोहन जी , पुरानी यादें किसी को भी नहीं भूलती लेकिन उन को सच्चे मन से याद करना हर किसी के बस की बात नहीं होती . गियान चंद ने कितनी मिहनत की यह मैं ही जानता हूँ किओंकि उस के भाईओं ने घर के लिए कुछ नहीं किया . बचपन से आज तक उस ने सिर्फ इमानदारी से काम ही किया . गाँव में और भी बहुत लोग थे जो मुझे याद आते हैं लेकिन गियान चंद एक इलग्ग ही था .

  2. भाई साहब, आपकी यह कहानी पढ़कर अभिभूत हो गया. पुराने दोस्तों से मिलना वास्तव में एक रोचक अनुभव होता है.
    आपने ज्ञान चंद के बारे में शायद पहले भी एक बार संक्षेप में लिखा था. याद इसलिए आ गया कि आपने खाट सिर पर रखकर ले जाने का जिक्र किया है. उनकी कहानी विस्तार से पढ़कर अच्छा लगा. मेहनत से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है.

    1. विजय भाई , लीला बहन के ब्लॉग में एक दफा यह कहानी लिखी थी लेकिन अब मैं इस को नहीं लिखता तो मेरी कहानी में कमी रह जाती किओंकि गियान चन्द से जुडी यादें बहुत हैं .अगले एक दो एपिसोड में भी गियान चन्द का ज़िकरआएगा .

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