संस्मरण

स्मृति के पंख – 21

रिसालपुर आकर दूसरी साथ वाली दुकान भी हमने ले ली। बाकी जैसा भ्राताजी ने कहा था, दुकान पर काफी काम था। हमारा पड़ोसी दुकानदार मेरठ की तरफ से आया था और पंडित था। वह भी अकेला काम करता था। काम उसके पास बहुत था। उसके भी काफी ग्राहक हमारे पास आने लगे। भ्राताजी नौशहरा से थोड़ा माल लाते थे। अब मैंने मरदान से थोक माल लाना शुरू कर दिया। जिला मरदान में एक सौ पांच तोले का सेर चलता था और रिसालपुर में अस्सी तोले का। अगर भाव के भाव भी माल बिक जाता तो काफी फायदा बचता। अब थोक माल भी दुकानदार हमसे खरीदने लगे। अब काम काफी अच्छा था। सिर्फ पिताजी के बारे में परेशानी रहती। कुछ सरमाये की भी भ्राताजी के पास कमी थी। मैं जब गाँव से आया तो पांच हजार रुपया मेरे पास था। माताजी और पिताजी के लिये अलग से मकान ले रखा था। उनके साथ शांति बहन, मीरा बहन, चन्द्रमुखी और उर्मिला रहते। रिसालपुर में बेटी राज और पृथ्वीराज को स्कूल भी दाखिल करा दिया।

तकरीबन एक साल बाद कांग्रेस कमेटी का दफ्तर भी खुला। फखरुद्दीन सदर थे, किशनचन्द नारंग सेक्रेटरी और मैं खजांची था। हमारी कांग्रेस कमेटी का मरदान और पेशावर दोनों से तालमेल रहता। कभी-कभी जलसे भी कराते। बाबू उत्तम चन्द महिन्दा्र सनातन धर्म के प्रेसीडेंट थे। महकमा बिजली में मुलाजिम थे। हमारे बिल्कुल सामने उनका क्वार्टर था। उनकी बेटी (उसका नाम भी शायद राज था – संपादक) का हमारे घर आना जाना ऐसे ही था, जैसे अपना घर हो। बाबू उत्तम चन्दजी का ज्यादातर लेनदेन हमारे पड़ोसी पंडतजी दुकानदार से था। उन दिनों कुछ चीजें राशन में हो गई थी जैसे डालडा, घी। उन्हें इस बारे में जब तकलीफ होती, तो मैं उन्हें खुद कह देता डालडा, घी या आटे की तकलीफ हो, तो मंगवा लिया करो और ऐसे ही उनसे राहोरस्म बढ़ता गया।

तीसरी बात जो थी वह तो बहुत खुशी वाली थी। जब मैंने राज की माताजी को देखा तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी अपनी मां हो। उसने भी मुझे बच्चों की तरह प्यार दिया। राज मुझे चाचाजी कहकर बुलाती थी, लेकिन मैंने उसे कह दिया तुम मुझे बहन जैसी लगती हो और भ्राताजी कहा करो। राज बहुत प्यारी लड़की थी और मेरा दिल चाहता था कि अगर बन सके तो अनन्तराम के साथ इसका रिश्ता हो जाये, तो बहुत अच्छी जोड़ी रहेगी। ना ही अनन्तराम कुछ दिनों से आये थे और ना मैं उन्हें मिल सका था। दिल में एक भावना सी उभरी। कुछ दिनों से बाबू उत्तम चन्द भी नहीं मिले थे। मैंने राज से पूछा- बाऊजी कहाँ हैं। कहने लगी पंजाब गये हैं और उनकी वापसी पर पता चला कि वह बेटी का रिश्ता पंजाब में कर आये हैं।

अब कपड़े का भी राशन हो गया। कपड़ा डिपो पर ही मिलने लगा। जिसके पास लाइसेंस वहीं फिरोख्त कर सकता था। आम कपड़ा नहीं मिलता था। सिर्फ लाइसेंस वालों को मिलता था। लाइसेंस उसको मिलता था जिसने 1935-36 में कपड़े का काम किया हो और रिकार्ड पेश कर सकता हो। गलाढेर में तो कपड़े का काम तो मेरे पास था, लेकिन उसका रिकार्ड मेरे पास नहीं था। मैने दरखास्त दी लेकिन नामंजूर हो गई। काजी साहब महकमे के वजीर थे। मैं उनके बंगले पर चला गया। घर पर नहीं थे, मैंने इंतजार किया। वह चार-पांच बजे आये। मैंने अंदर आने की इजाजत मांगी, उन्होंने बुला भेजा। पूरी बात जुबानी उन्हें कह डाली। लाइसेंस मेरा हक बनता है, आप मेहरबानी करके मेरी दरख्वास्त पर गौर फरमाये।

उसने कहा तुम्हारे पास रिकार्ड क्यों नहीं है। मैंने कहा गाँव की दुकान छोड़ दी है, अब रिसालपुर में रहता हूँ तो रिकार्ड संभाला नहीं है। उसने सुझा दिया कि उन थोक व्यापारियों से तुम रिकार्ड हासिल कर सकते हो। अगर ऐसा कर सको, तो लाइसेंस तुम्हें मिल जायेगा। मरदान आकर उन व्यापारी लोगों से कहा। उन्होंने मेरे खतों का हिसाब उतार कर मुझे दे दिया। अब दूसरा सवाल था दुकान भी होनी लाजमी है। मुझे लाइसेंस मिलना था जिला मरदान का और अब हमारी दुकान जिला पेशावर रिसालपुर में थी। मरदान रघुनाथ की मंडी में एक कमरा उससे लेकर दुकान लिखवा दी और दुबारा दरख्वास्त दी तो लाइसेंस मंजूर हो गया।

कपड़ा का कोटा जब मिलता मैं तकसीन करने मरदान आ जाता। दो तीन दिन में सब खत्म हो जाता। इस तरह अपनी मदद के लिये मैं अपने साले लीलाराम को बुला लिया करता। अब एक दूसरा काम हरिकृष्ण खन्ना के साथ सालाना ठेके पर जन्द्र ले लिया। बाबी सौ पर निलाम हुआ था। नहर का किनारा, हर तरफ जंगल, अपनी हिफाजत करनी वहाँ बहुत मुश्किल सी लगती। एक बंदूक सरकारी मिल गई थी। दूसरी दुनाली बंदूक के लिए मैंने दरखवास्त दे दी। लाइसेंस मंजूर होने पर आनन्तराम ने मुझे दो सौ रुपया पर खरीद कर ला दी थी। जब हमने चार्ज संभाला तो नहर बंद कर दी थी, फिर भी एक रात मुझे कुछ खटका लगा, वैसे ही दो गोली मैंने चला दीं। मैंने हरिकृष्ण से कहा कि यह जगह संभालना हमारे बस की बात नहीं। तजबीज हुआ कि गलाढेर से खान को बुलवा लिया जाये। खान नम्बर दस का बदमाश था लेकिन पक्का पठान, यार का यार और दुश्मन का दुश्मन। हमने सब बात उसे बतलाईं। उसने कहा कि मैं शाम को सूरज गुरुब होने के बाद पहुँचूँगा और सुबह चार बजे पहली नमाज अदा करके वापस आ जाया करूँगा। हमने कहा ठीक है।

उस साल हमारे पास गल्ले का काफी स्टाक था। दो बंदूक भी थीं। मक्की की फसल बड़ी होने के बाद मफरूर लोग आ जाते। उनके छुपने के लिये आसानी होती। खान खुद भी मफरूर रह चुका था। उन लोगों ने खान को बहुत कहा- खान तुम बस सिर्फ हां कर दो। लेकिन खान ने कहा, ‘जब तक मैं जिंदा हूँ, यहाँ से तुम कुछ नहीं ले सकते और ना ही किसी में ऐसी मजाल है, जो मेरे होते हुये आंख भी उठा सके।’ हमारे नजदीक ही एक दूसरा जन्द्र था, वहाँ से तो नुकसान हो गया लेकिन हमारा कुछ नहीं बिगड़ा। खान ने हमसे कुछ मांगा नहीं, हम हर महीने उसके घर तीन मन आटा भिजवा देते और कुछ कपड़े बीवी-बच्चे के लिये।

दुकान का काम भी बहुत अच्छा था। साथ में कपड़े का काम भी था और अब तीसरा जन्द्र का नाम। सब मिलकर अब कोई परेशानी नहीं थीं। लेकिन पिताजी की परेशानी के कारण ही परेशानी बढ़ती ही गई। पुलिस वालों ने भ्राताजी को कह दिया हम तुम्हारे पिताजी को पकड़ कर ले जायेंगे लोगों की बहुत शिकायत है। भ्राताजी पुलिस को टालते रहते। पिताजी सुबह नाश्ता हमारे घर आकर ही करते, फिर सुभाष को उठा कर ले जाते। कई लोगों ने हमें कहा- बच्चा क्यों देते हो इसे? वह तो उसे कहीं बिठाकर इधर-उधर चला जाता है। फिर भी पिताजी उसे ले ही जाते। रोटी के समय वापिस आ जाते। पुलिस ने दुबारा चेतावनी दी। अब कुछ करने के सिवाय कोई चारा नहीं था। किसी अस्पताल में तो ऐसे ईलाज के लिये कोई जगह ना थी। पेशावर एक पागलखाना ही था। भ्राताजी ने कहा पिताजी को पागलखाने में दाखिल करा देंगे। रामलाल मल्होत्रा भ्राताजी का बड़ा जँवाई पेशावर में रहते थे और पिताजी की खबरगीरी करते रहेंगे और इलाज के लिये भी जो हो सकेगा करेंगे। मुझे तो कोई राह नहीं सूझ रहा थी। रोते-रोते इतना ही कहा – जो आप अच्छा समझो। भ्राताजी पिताजी को पेशावर पागलखाना ले गये। पिताजी को ले जाना आसान काम नहीं था। दो आदमी साथ लिये हाथ पांव बांधना पड़ा। यह सब मैं देख नहीं सका, वहाँ से हट गया। वापिस आकर भ्राताजी ने कहा डाक्टरों से मिलकर दवाई बारे और खुराक बारे बातचीत हो गई। रामलाल और उनके बड़े भाई को हिदायत कर आया। खबर लिया करेंगे पिताजी की।

(जारी…)

परिचय - राधा कृष्ण कपूर

जन्म - जुलाई 1912 देहांत - 14 जून 1990

3 thoughts on “स्मृति के पंख – 21

  1. विजय भाई , राधा कृष्ण जी की कठिन तपस्य है . और ख़ास कर उन के पिता जी की समस्य तो बहुत गंभीर थी , लगता है उन को एल्जाईमर होगा किओंकि इस में याददाश्त धीरे धीरे ख़तम हो जाती है .

    1. भाईसाहब, लेखक ने जो कष्ट उठाये थे वे किसी तपस्या से कम नहीं। उनके पिताजी की बीमारी क्या थी कहा नहीं जा सकता। मुझे लगता है कि उनके दिमाग़ में गरमी चढ़ गयी थी।

  2. सारी कड़ी को पढ़ा। घटनाओं का प्रभावशाली चित्रण हैं। आगामी क़िस्त की प्रतीक्षा है। धन्यवाद।

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