बाल कहानी

बाल कहानी – बदल गई ईशा

ईशा बड़ी ही नकचढ़ी लड़की थी | उसकी अपनी किसी भी सहेली से ज्यादा दिन तक पटरी नहीं बैठती थी | जरा – जरा सी बात पर तुनकती रहती | जिधर से घर मे आती , मम्मी से किसी न किसी सहेली की शिकायत जड़ देती | – “ रेशू ने मेरे सामने अपनी गुड़िया की इतनी तारीफ किया ,जैसे किसी के पास इतनी अच्छी गुड़िया ही नहीं है | मेरी गुड़िया उससे खराब है क्या ? उसकी नयी आयी है इसीलिए भाव खा रही है |” मम्मी समझाती – “ बेटी , उसने तेरी गुड़िया की बुराई तो नहीं किया न | सिर्फ अपनी नई गुड़िया की तारीफ किया तो इसमे गलत क्या है ?”

“ मेरी गुड़िया की बुराई करती तो उसका मुंह नोच लेती मैं | ” ईसा गुस्से मे बोली – “बड़ी आई नयी गुड़िया वाली “ | मम्मी फिर समझाती – “गलत बात है बेटा , तुम भी तो जब पापा के साथ जाकर अपनी नयी गुड़िया लायी थी तो कितना खुश थी | अपनी सारी सहेलियों से उसकी तारीफ करते नही थक रही थी | आखिर रेशू भी तुम्हारी ही तरह छोटी लड़की है |”
“ हुंह , पर मैंने तो उसे अपनी गुड़िया के बारे मे नहीं बताया था | वह क्या सोचती है कि मेरे पास उससे अच्छी गुड़िया नहीं है | मेरी गुड़िया देख ले तो उसकी गुड़िया की तारीफ रखी रह जाएगी |”

– “ पर बेटी इसमे इतना भुनभुनाने की क्या बात है | उसने तुम्हें तो कुछ कहा नहीं |”
– “ आप भी उसी की तरफ बोलती है | जाइए मैं आपसे भी नहीं बोलूंगी | कुट्टी …..|” और ईशा दनदनाती हुई अपने कमरे मे चली गयी | मम्मी बोली – “ उफ… , ये लड़की भी कितनी नादान है ? आखिर कब समझेगी ?”

ये ईशा का रोज का काम था | कल वो शालू से अपनी नई पेंसिल बॉक्स के लिए चिढ़ गयी थी | कारण कुछ खास नही था | बस , शालू ने उसकी नई पेंसिल बाक्स की तारीफ नहीं किया था | परसों, आन्या से बैडमिंटन की रैकेट के लिए गुस्सा हो गयी थी | उसने ईशा से सिर्फ इतना कहा था कि दीदी आपकी रैकेट मुझसे पकड़ते नहीं बनती | शायद थोड़ा सा बड़े साइज़ की है | बस ईशा बिफर गयी – “ क्या मैंने तुम्हारे लिए, तुमहरे नाप का रैकेट खरीदा है? बड़ी आयी बड़ा छोटा बताने वाली | जाकर अपनी नाप के रैकेट से ही क्यों नहीं खेलती ? मेरा क्यों छूती है | मैंने तुझसे अपने साथ खेलने के लिए तो नहीं कहा ?” ऐसी जली – कटी सुन कर आन्या सन्न रह गयी और उदास होकर वहाँ से चली गयी |

ईशा को इस नए शहर की कालोनी मे आए हुए लगभग एक महीना हो रहा था | उसके पापा का यहाँ तबादला हुआ था | पिछले शहर मे भी ईशा ऐसा अक्सर करती रहती थी | ये उसकी आदत बन गयी थी | पिछले पन्द्रह दिन तो उसे कालोनी के बच्चों से दोस्ती करने मे लग गए थे | अब बाकी के पन्द्रह दिनो मे ही उसकी सबसे कुट्टी होने लगी थी | कोई उसे समझाता तो वह उससे भी रूठ जाती थी | अपने मम्मी – पापा और बड़े भाई से भी | उसकी इसी आदत से धीरे – धीरे मुहल्ले के सभी बच्चे उससे कन्नी काटने लगे थे | कोई भी बच्चा उसके साथ खेलने – घूमने का मन नहीं बना पाता था |

कुछ दिन बाद तो ऐसा माहौल हो गया कि ईशा कालोनी मे अकेली पड़ने लगी | वह घर से बाहर निकलती तो बच्चों का झुंड विपरीत दिशा मे घूमने चल देता | पार्क मे जाती तो बच्चे उससे दूर खेलने लगते | यहाँ तक कि स्कूल की कक्षा मे भी कोई सहेली उसके पास नहीं बैठती थी | उसके अगल – बगल खाली सीट पर वो नए बच्चे बैठने लगे थे , जिनसे ईशा की कभी न दोस्ती हुई थी , न बोल – चाल होती थी | अब ईशा को बड़ा अजीब सा लगने लगा था |

खाली समय काटने को दौड़ता था | वह कभी किताब लेकर बैठती तो ऊब जाती | खेलने निकलती तो सिर्फ अकेले वाला खेल जैसे रस्सी आदि कूद कर संतोष करना पड़ता | घूमने निकलती तो अकेले चुपचाप टहलती रहती | गुमसुम फूलों – पत्तियों को निहारते – छूते हुए गुजर जाती | जबकि थोड़ी ही दूरी पर अनेक बच्चे एक साथ हँसते – खेलते ठहाके लगते रहते थे | लेकिन ईशा को अब भी समझ नहीं आता था कि इतने सारे बच्चे इस तरह उससे दूरी क्यों बनाते जा रहे हैं | एक दिन तो वह अपने छोटे भाई आयुष पर तुनक गयी ,जिसके साथ वह अकसर लूडो या साँप – सीढी खेल लिया करती थी | भाई भी गुस्से मे उठकर चला गया तो उसे अकेले ही दोनों तरफ से खेलकर समय बिताना पड़ा | उसे बिलकुल भी मज़ा नहीं आ रहा था | पर वो करती भी क्या ?

वह बहुत उदास रहने लगी थी | अब अकेलापन उसे काटने को दौड़ता था | …… और एक दिन तो वह बीमार ही पड़ गयी | मम्मी – पापा ने डॉक्टर अंकल को बुला लिया | उन्होने देखा और जाँच करने के बाद आश्चर्य से कहा – “ ईशा को तो कोई बीमारी नहीं हैं | हाँ ,यह कुछ सुस्त और उदास जरूर दिख रही है | ऐसा अकेलेपन और अवसाद के कारण हो सकता है |”

डॉक्टर अंकल ने बड़े प्यार से ईशा का सिर सहलाया और पूछा – “ इतनी सुंदर और अच्छी बच्ची के पास अकेलापन और उदासी कहाँ से आगयी ? आखिर क्या बात है बेटी !” डॉक्टर अंकल की बात सुनकर ईशा फफक पड़ी | उसने बताया कि मेरे साथ कोई खेलना – बैठना – पढ़ना नहीं चाहता | मेरा भाई भी नहीं | मैं बहुत ऊब जाती हूँ | ”
– “ लेकिन ऐसा होता क्यों हैं ? तुम तो बहुत अच्छी लड़की हो |”
– “ मैं अच्छी हूँ पर ,….. शायद ऐसा कोई और नहीं मानता | मेरा बड़ा भाई भी नहीं | मुझे अकेले ही लूडो खेलना पड़ा | उसकी चाल भी चलनी पड़ी | तब खेल खत्म हो सका | मैं क्या करती ? कल मेरा जन्मदिन भी है | कोई बच्चा नहीं आएगा | मैं अकेले कैसे मनाऊंगी ? अंकल ! मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा |”

डॉक्टर अंकल को सारी बात समझते देर न लगी | वे बोले – “ जब तुम उन बच्चों को जाकर प्यार और अपनेपन से बुलाओगी तो वे जरूर आएंगे |” इतना सुनते ही ईशा फिर से तुनक गयी – “ मैं क्यों बुलाने जाऊँ ? मेरी गलती थोड़े है | वे लोग खुद ही मुझे नहीं बोलते |’

डॉक्टर अंकल ने प्यार से समझाया – “ देखो बेटी ! तुम शायद नहीं जानती कि तुम्हारी समस्या क्या है ? ये तुम्हारा ‘ईगो’ है | ईशा का ईगो , ईशा का बड़बोलापन | दूसरे की बातें और उसकी भावनाएं न समझने की गलती | अपनी बात आगे और ऊंची रखने की गलती | तुरन्त किसी की बात पर बिना सोचे – समझे कड़वी प्रतिक्रिया देने की गलती | तुम्हें अपने व्यवहार मे परिवर्तन लाना होगा | सभी की बातों को धैर्य पूर्वक सुनना और उनकी भावनाओं को समझना होगा | जैसे वो तुम्हारी बातों को सुन लेते हैं और बिना झगड़ा किए चले जाते हैं | वैसे ही तुम्हें भी सब से प्रेम से बिना गुस्सा किए हुए बात करना चाहिए | तुम ऐसा करके देखो | वो सब जो तुमसे अभी बात तक नहीं करते , वही तुम्हारे सबसे अच्छे दोस्त बन जाएंगे |”

मम्मी – पापा की बातें भी न समझने वाली ईशा पर डॉक्टर अंकल की बातों ने जैसे जादू किया | उसकी आँखों मे आशा की चमक आ गयी – “ क्या ऐसा सच मे हो जाएगा अंकल ?”
डॉक्टर अंकल मुस्कराये – “ बिलकुल बेटी ! तुम आजमाकर देख लो | एकदम मुफ्त का इलाज है |”
ईशा ठठाकर हंस पड़ी | बोली – “ अभी देखती हूँ |” सामने ही उसका भाई आयुष आश्चर्य भरी निगाहों से चुपचाप पीछे हाथ बांधे खड़ा देख रहा था | ईशा प्यार से बोली – “ भाई ! मेरे साथ लूडो खेलेगा ? अब मैं किसी की बात का बुरा नहीं मानूँगी | आ जा मेरे अच्छे भैया |” आयुष तुनक कर बोला – “ पर मैं तो बुरा मान गया |”
“ क…. क…. क्यों ? ” – ईशा आश्चर्य से डॉक्टर अंकल की ओर देखते हुए बोली |

आयुष ठहाका लगाकर हंस पड़ा – “ ईशा पगली ! तेरी नहीं डॉक्टर अंकल की बात का | मैंने तो सोचा था कि तुझे चार – पाँच सुइयां लगेगी और ढेर सारी कड़वी – कड़वी दवाइयाँ खानी पड़ेंगी , तभी अक्ल ठिकाने आएगी |”

“ तूने मुझे पगली कहा , तू मुझे सुई लगवाना चाहता था | ठहर तुझे अभी बताती हूँ |” – ईसा तुनक कर बिस्तर से उठी और आयुष को पकड़ने दौड़ी | अब आयुष अपने दोनों हाथ आगे करके खड़ा हो गया – “ लेकिन ईशा ! मैं तो कब से तेरे साथ खेलने के लिए लूडो हाथ मे पकड़े खड़ा हूँ | ”

कमरे मे ज़ोर का ठहाका गूँजा | मम्मी – पापा समेत सभी हंस पड़े थे | अगली सुबह ईशा और आयुष मिलकर सभी से पिछली बातों की माफी मांगते हुए जन्मदिन का निमंत्रण बाँट रहे थे और शाम को सारे बच्चे मिलकर जन्मदिन की खुशियाँ बाँट रहे थे | “ हैप्पी बर्थ डे टू यू ईशा , जन्म दिन बहुत – बहुत मुबारक हो |”- … और ईशा ?, मानो उसका नया जन्म ही हो रहा था | आज से वह सचमुच बदल गई थी |

परिचय - अरविन्द कुमार साहू

सह-संपादक, जय विजय

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