संस्मरण

मेरी कहानी – 29

जब हम छठी क्लास में पड़ते थे तो हमें पता था कि इस गाँव के स्कूल में हमारा आख़री साल था और इस के बाद हमें प्लाही पड़ने जाया करना था, इसलिए हमें कुछ चिंता थी कि हमें इतनी दूर रोज़ पैदल चल कर जाना होगा। कभी कभी गाँव के कुछ लोग जिनमें डाक्टर सोहन लाल, मास्टर केहर सिंह, मास्टर गुरदयाल सिंह और कुछ अन्य लोग शाम को स्कूल में आते और उनकी मीटिंग होती। बहुत दफा उनकी बहस हो जाती और यह काफी गरम होती। हमें तो कुछ नहीं पता था कि यह लोग क्यों झगड़ते थे। कुछ महीनों बाद हमें बताया गया कि अब सातवीं और आठवीं कक्षा तक पढ़ाई गाँव की पंचायत चलाएगी। इस बात से हमें कुछ राहत मिल गई ख़ास कर लड़किओं के लिए क्योंकि वोह तो अपने गाँव के बाहिर पड़ने के लिए जा नहीं सकती थी। छठी क्लास के इम्तिहान हो गए और हम पहली दफा गाँव के स्कूल में ही मिडल स्कूल में दाखल हो गए।

स्कूल में जगह कम थी, इसलिए हमें एक कमरा बहादर के चाचा जी की पशुओं वाली हवेली में मिल गिया था जो स्कूल के सामने ही था। दो नए टीचर आ गए। एक तो गाँव के ही नए पोस्ट मैन भगवान दास का बेटा था जो कालज से पड़ कर आया था, शायद वोह बीए करके आया था और एक और था जिस का मुझे नाम याद नहीं। हमारे साथ चार लड़किआं तो पहले ही थीं, बाद में दो और आ गईं। इन में से एक यहां रहती है और उस के पति इस दुनिआ को छोड़ चुक्के हैं। कुछ ही महीने बाद यह स्कूल मिडल तक सरकारी हो गया। हमको तो इतना पता नहीं था लेकिन उन दिनों कभी कभी गाँव में मिनिस्टर आया करते थे और लोग मिडल तक सरकारी स्कूल बनाने के लिए उन से अनुरोध किया करते थे जो आखिर में मंजूर हो गया था जिस का फायदा हमें बहुत मिला क्योंकि इन दो सालों में हमनें बाइसिकल चलाना भी सीख लिया था और वैसे भी हम बड़े होने लगे थे।

इस मिडल स्कूल में तब्दीलिआं होने लगी। मास्टर साधू राम जो अंग्रेज़ों के समय से हैडमास्टर हुआ करते थे साधारण मास्टर हो कर रह गए थे क्योंकि एक नया मास्टर हरबंस सिंह हैड मास्टर बनकर आ गया था। उसकी एक कलाई और हाथ छोटा था। सर्दिओं में गरम सूट पहना करता था और गर्मिओं में पैंट और हाफ स्लीव शर्ट पहना करता था। जेब में रुमाल और एक कीमती पैन रखा करता था। इसका बहुत रोअब हुआ करता था। वोह क्लीन शेव था और हर सुबह शेव करके आता और जिस विद्यार्थी के कपडे मैले होते उसको घर भेज देता था। छोटी कलाई वाला छोटा हाथ वोह अक्सर जेब में ही रखता था और दूसरे हाथ से बहुत जोर से थपड़ मारता था। सारे स्कूल में उसका एक भय सा बन गिया था। सभी बच्चे और मास्टर उससे डरते थे।

हरबंस सिंह उस समय तीस वर्ष के भी नहीं थे और उनकी शादी भी अभी हुई नहीं हुई थी। स्कूल में एक डिसिप्लिन कायम हो गया था। हमें वोह हिसाब भूगोल और इतहास पढ़ाते थे। बहुत अच्छा पढ़ाते थे। हममें से किसी ने भी अभी फिल्म नहीं देखि थी और हरबंस सिंह कभी कभी फिल्मों की बातें हमको सुना देते थे जब उनका मूड अच्छा होता था। एक दिन उसने हमें फिल्म चार सौ बीस के एक सीन को सुनाया जिस की हमें बहुत वर्षों बाद समझ आई। सीन यह था कि नर्गिस स्कूल में बच्चों को पढ़ाती थी तो राज कपूर ने नर्गिस को पुछा था कि उसके कितने बच्चे थे, तो नर्गिस ने शायद बीस कहा। इस पर राज कपूर हैरान हो गया था कि इतने बच्चे? मास्टर हरबंस सिंह की बात हमें किसी को समझ नहीं आई लेकिन हम हंस दिए थे।

हरबंस सिंह फ़ुटबाल के माने हुए खिलाड़ी थे, शायद कालेज में खेलते रहे होंगे। जब हम स्कूल के फ़ुटबाल प्ले ग्राउंड में खेलते तो हरबंस सिंह भी साथ खेलता। वोह बहुत तेज दौड़ता था और हममें कोई भी बाल उससे छीन नहीं सकता था। साथ ही जो खिलाड़ी गलती करता तो उनको डांटता। हम अब कुछ बड़े हो गए थे और सरकार की तरफ से भी हमें खेलने के लिए बहुत सी चीजें मिल गई थीं। फ़ुटबाल हम बहुत खुश हो कर खेलते थे। पहले हम फ़ुटबाल में एक पंप से हवा भरते, फिर ब्लैडर की टूटी को रस्सी से बाँध कर दोनों हाथों के अंगूठों से फ़ुटबाल के अंदर बड़े जोर से धकेल देते, फिर एक स्पैशल मोटी तार से बने टूल से फ़ुटबाल को चमड़े के तस्में से कस कर बांधते। तब टेस्ट करने के लिए जमींन पर मार कर किक्क मारते। तब खेल शुरू हो जाता। यह फ़ुटबाल खेलना स्कूल टाइम के बाद होता था।

रिसेस या आधी छुटी के वक्त हम वॉलीबाल खेलते थे। इस के लिए हर रोज़ वॉलीबाल नैट लगाना होता था और खेल खत्म होने के बाद नैट को उखाड़ कर और फोल्ड करके दफ्तर में रखना होता था। वॉलीबाल तो मेरा बहुत पसंदीदा खेल था। अक्सर हमारा मुकाबला राम गढ़ प्लाही या चहेरु के स्कूल से होता ही रहता था। एक दफा फगवारे और कपूरथले में डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट भी हुए थे। यह दो साल हमारे बहुत अच्छे रहे। पड़ने में एक लड़का जो माधो पर गाँव से आता था जिसका नाम था रावल। वोह हिसाब में बहुत हुशिआर था लेकिन दूसरे सब्जेक्ट्स में मैं उनसे आगे था। इतहास तो इतना मैं पसंद करता था की इतहास की सारी पुस्तक मैंने जबानी याद कर ली थी। लड़किओं में बिमला हुशिआर थी और मास्टर केहर सिंह की दोनों लड़किओं में मिन्दो तो कुछ ठीक ठाक ही थी लेकिन वीरो विचारी सीधी साधी और कमज़ोर ही थी।

क्योंकि बचपन से मुझे गाने का शौक था, इस लिए हर शनिवार के प्रोग्राम को तैयार करना मेरी ज़िमेदारी होती थी। मैं लड़कों और लड़किओं के नाम लिखता, उन से पूछता की उन्होंने क्या गाना था या जोक्स सुनानी थी, सब अपनी कापी में लिख लेता। बिमला बहुत अच्छा गाती थी जिस से प्रोग्राम की रौनक बड़ जाती थी। शनिवार को छुट्टी के बाद सभी टीचर एक तरफ कुर्सिओं पे बैठ जाते थे और सारे स्कूल की क्लासें उन के सामने बैठ जाती थीं। पहले हरबंस सिंह खड़ा हो कर कुछ लैक्चर देता और फिर मैं अपनी कापी लेकर स्टेज पे आ जाता। कुछ लाइनें मैं बोलता जो मैंने कापी पर पहले ही लिखी होती थी और एक एक करके लड़के लड़किओं के नाम बोलता जाता। आखिर में मैं कोई गीत गाता ।

एक गीत मुझे बहुत दफा सुनाने को कहा जा चुक्का था, वोह था, “देख तेरे संसार की हालत किया हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान।” और दूसरा था झंडे का गीत। यह गीत मैंने इतनी बार गाया कि अभी भी भूला नहीं, सिर्फ दो स्टैनज़े भूले हैं , इसी लिए एक दफा मैंने युवा सुघोष में भी दे दिया था, जो कुछ इस तरह था, देश का यह निशाँ, कौम की है यह जाँ, जिस तारा, झंडा ऊंचा रहे यह हमारा। इसी गाने पर मुझे लख पुर साहनी गाँव के एक फंक्शन में छोटा सा प्राइज़ मिला था। यह गीत हमें मास्टर साधू राम जी ने सिखाया था।

स्कूल के बाद मुझे दादा जी का हाथ भी बंटाना होता था। पिता जी ने दादा जी को खत लिखा था कि वोह खेती करना छोड़ दें क्योंकि इससे मेरा नुक्सान होता था लेकिन दादा जी मानते नहीं थे। शायद जून जुलाई का महीना होगा, गर्मी बहुत थी और पिता जी और मेरे बड़े भाई अफ्रीका से आ गए। एक दिन वोह दोनों साइकलों पर फगवारे गए। शायद उस वक्त मुझे गर्मिओं की छुटिआं थी या वैसे ही रविवार होगा। मैं और दादा जी कपास के खेत में खुर्पों से गुड़ाई कर रहे थे और पसीने से भीगे हुए थे लेकिन हमें कोई तकलीफ नहीं थी क्योंकि इस काम के हम आदि हो चुक्के थे। फगवारे को रास्ता हमारे खेतों के पास से ही जाता था। मैं ने देखा पिता जी और बड़े भैया साइकलों पर फगवारे से वापिस आ रहे थे। उनकी कमीज़ें पसीने से भीगी हुई थीं। पिता जी दादा जी को चाचा बोलते थे। आते ही बोले,” चाचा ! छोड़ दो यह खुरपा, अब से आप को खेती खत्म कर देनी होगी “. दादा जी हंस पड़े और बोले, यह जो हम ने कपास और मक्की बीजी है वोह तो हमें आखिर में काटनी ही होगी क्योंकि हम ने मिहनत की थी, इस के बाद ज़मीं किसी को दे दी जायेगी “. फिर वोह नज़दीक ही खेतों में गए और एक किसान को बुला लाये जिस का नाम था जगत सिंह और उस के बेटे का नाम था भजन। उस से खेती की सभी बातें हुई और कपास और मक्की की कटाई के बाद सारी जमींन उस को दे दी गई। इस फसल के बाद मुझे भी पशुओं के लिए चारा लाने के सिवा और कोई काम नहीं रहना था। बस यह था हमारी खेती का अंत।

किसी भी पार्टी की सरकार आये, उस पर नुक्ताचीनी अभी तक बराबर सुनता आ रहा हूँ और यह आगे भी इसी तरह चलती रहेगी क्योंकि ऑपोज़िशन के बगैर देश की उन्नति खतरे में पड़ सकती है। आज़ादी के बाद देश की उन्नति शुरू हो गई थी। जो बातें अंग्रेज़ों के ज़माने से एक जगह खड़ी थीं उस में तबदीली आनी शुरू हो गई थी। सबसे पहली बात जो हमारे देखने में आई वोह थी बलौक डिवेलपमेंट ऑफिसर। हमारे एरिये का दफ्तर फगवारे में था। उस समय नए नए मंत्री गाँव में आते ही रहते थे। मैं लिख चुक्का हूँ कि हमने कभी फिल्म नहीं देखि थी। एक दिन हमने सुना कि हमारे गाँव में बीडीओ साहब फिल्म दिखाने आ रहे हैं। शाम को गाँव में बहुत लोग इकठे हो गए थे। एक तरफ बहुत बड़ी स्क्रीन लगा दी गई थी। एक तरफ जेनरेटर की ऊंची आवाज़ आ रही थी, बड़ा बिजली का बल्व लगा हुआ था और फिल्मे दिखाने के लिए प्रोजेक्टर ऊंची जगह पर रखा हुआ था।

बीडीओ साहब ने खेती बाड़ी की जानकारी देनी शुरू की। दरअसल यह काम हकूमत की तरफ से लोगों को खेती बाड़ी के नए नए ढंग सिखाने के लिए ही था। सारी फिल्मे साइलेंट थीं और बीडीओ साथ साथ बोलता जा रहा था। खेतों में किसान काम कर रहे थे और कोई अफसर किसानों को कुछ बता रहा था लेकिन कोई आवाज़ नहीं थी, सिर्फ बीडीओ ही बता रहा था। मशीनों से अण्डों की सिलेक्शन दिखाई जा रही थी। हमें तो जो सब से अच्छा लगा, वोह था एक गाना जो एक फ़िल्मी सीन था। वोह गाना पंजाबी का था, जिस का नाम था,” अम्भी दा बूटा “. हमें बहुत बाद में मालूम हुआ था कि यह प्रोफेसर मोहन सिंह की कविताओं की किताब सावे पत्तर की एक कविता अम्भी दा बूटा पर फिल्माया गया था। इस का सारा सीन अभी तक मुझे याद है।

एक और बात जो गाँव में हुई वोह थी गाँव के गिर्द एक रिंग रोड बनाना जो पक्की तो बहुत वर्षों बाद हुई लेकिन अब यह बननी शुरू हो गई। इस रिंग रोड को फिरनी बोलते थे। यह गाँव के बहुत दूर से कुछ हट्ट कर बननी शुरू हुई। यह काम इतना आसान नहीं था क्योंकि जिन जिन किसान के खेत बीच में आते थे वोह झगड़ते थे। कानूगो पटवारी निशान लगाते थे, पंचायत साथ होती थी। खेतों के किसान, उनकी औरतें बच्चे बूढ़े रोते और काम को रोकते। पंचायत उन को समझाती कि उन को मुआवज़ा जरूर मिलेगा। कुछ तो मान जाते लेकिन कुछ रोते हुए वहीँ जमीन पर लेट जाते। पंचायत के लिए भी यह बहुत मुश्किल था। कुछ महीने बाद यह काम पूरा हो गिया और इस फिरनी पर आवा जाइ शुरू हो गई। बेशक मैं छोटा था लेकिन जो मैंने देखा है, गाँव के बहुत कम लोगों को पता है जो मेरी आयु के होंगे। आज यह फिरनी बहुत शानदार सड़क है जिस पर कारें बसें ट्रक्क चलते हैं और जगह जगह बस स्टॉप हैं और एक छोटा सा बस्स अड्डा बना दिया गिया है जिस से हर तरफ को बसें जाती हैं और सब से बड़ी बात जो है वोह है जो फिरनी गाँव के बहुत दूर होती थी उस में बड़े बड़े मकान बन गए हैं और इस फिरनी या रिंग रोड के बाहिर दूर दूर तक इतने मकान और दुकाने बन गई हैं कि पुराना राणी पुर और नया राणी पुर ऐसे है जैसे नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली।

चलता…

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.

8 thoughts on “मेरी कहानी – 29

  1. वाह बहुत खूब आदरणीय बहुत बढ़िया यथार्त कहानी के लिए आभार

  2. बढ़िया, भाई साहब ! आपने अपने स्कूल का अच्छा वर्णन किया है. पढ़कर मजा आया.

    1. विजय भाई , बहुत बहुत धन्यवाद . बस यह भूली विसरी यादें ही हैं जिन को लिख कर बताना अच्छा लगता है और पड़ने में भी अच्छा लगता है .

  3. आज की कड़ी में वर्णित सभी बातों को पढ़ा। अपने बचपन में फुटबॉल के रबर के ब्लाडर में हवा भरने की बात याद आ गई। मेरा प्रिय खेल फूटबाल ही रहा। बचपन व युवावस्था में फुटबॉल मैच देखने जाता था। जे सी टी मिल फगवाड़ा, मफतलाल, ईस्ट बंगाल, गोरखा ब्रिगेड, सिख रेजिमेंट आदि टीमें देहरादून में आती थी। कुश्तिया भी अच्छी लगती थी। दारा सिंह, रंधावा व किंगकांग भी देहरादून आते थे। सरकस भी देखने का शौक था। आज की क़िस्त बहुत पसंद आयी। हार्दिक धन्यवाद।

    1. मनमोहन भाई , वोह दिन वापिस तो नहीं आ सकते लेकिन यह मीठी यादें ही हैं . दारा सिंह और रंधावा यहाँ भी आया करते थे , यह शाएद १९६३ ६४ की बात होगी . यहाँ के सिविक हाल में फ्रीस्टाइल कुचती एक गोरे के साथ दारा सिंह की हुई थी . दारा सिंह ने उस को नौक आऊट कर दिया था , इंडियन इतने थे और ऊंची ऊंची बोल रहे थे ,ओ चक दे दारा सिंघा . रंधावा और जोगिन्दर सिंह टाइगर भी आता जाता रहता था . अब तो कुश्तिआन ख़तम हो गई हैं लेकिन उन दिनों हर शनिवार को रेसलिंग टीवी पर देखते थे . फ़ुटबाल में उन दिनों ब्लैडर ही होते थे और पम्प से हवा भरते थे .

      1. धन्यवाद आदरणीय श्री गुरमेल सिंह जी। आपकी आज की कहानी एवं प्रतिक्रिया का उत्तर पढ़कर मन प्रसन्न है। मैंने दारा सिंह की बहुत सी फिल्मे बचपन में देखी थी। उन दिनों दारा सिंह मुझे बहुत भाते थे। श्री रामानंद सागर की रामायण में दारासिंह ने हनुमान जी की भूमिका बहुत संजीदगी से निभाई थी। एक पहलवान इतनी बढ़िया एक्टिंग भी कर सकता है, यह कमाल दारा सिंह जी ने किया था। आपकी बातें मन में ख़ुशी और आनंद पैदा करती हैं। बहुत बहुत धन्यवाद।

        1. मनमोहन भाई , हम भी डरा सिंह की फ़िल्में बहुत देखा करते थे , ख़ास कर उस का रोल जो हनुमान का होता था , इस से बिहतर किसी का हो ही नहीं सकता था किओंकि उन की बौडी बहुत सूटेबल थी इस रोल के लिए .

          1. धन्यवाद महोदय। दारा सिंह जी का हिंदी बोलने का लहजा कुछ भिन्न था। उनकी हिंदी सुनने में अपना ही विशेष आनंद आता था। आपकी बात पूरी तरह ठीक है कि उनका व्यक्तित्व हनुमान जी के अभिनय के लिए सर्वथा उपयुक्त था और उन्होंने अच्छा अभिनय किया था। इस अभिनय के लिए निदेशक रामानंद सागर जी की भी सराहना की जानी चाहिए। हार्दिक धन्यवाद।

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